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लेखक जिनकी मौत के बाद छपी उनकी पहली कविता, साईकिल पर बेचते थे अखबार

Posted On: 13 Nov, 2017 Social Issues में

Pratima Jaiswal

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विचार आते हैं, लिखते समय नहीं

बोझ ढोते वक्त पीठ पर, सिर पर उठाते समय भार

परिश्रम करते समय, विचार आते हैं

ऐसे ही अनगिनत विचार गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ की कविताओं और कहानियों में दिखते हैं. मुक्तिबोध के बाद भी किसी ने उस तरह के शिल्प में कविता लिखने की कोशिश नहीं की, क्योंकि लेखक अच्छा लिख सकते थे या फिर बुरा लेकिन उन जैसा लिख पाना वैसे भी संभव नहीं था. आज उनका जन्मदिन है. आइए, जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.


muktibodh


उनकी भाषा में वो हर जगह मिसफिट थे

1948 की बात है. मुक्तिबोध जबलपुर में थे. जबलपुर आए उन्हें दो साल हो रहे थे. वहां डीएन जैन हाइस्कूल में मास्टरी करते थे. मास्टरी करना उनके लिए बहुत ही बोझिल काम था. तनख्वाह बहुत कम थी, वो भी समय पर नहीं मिलती. उनके मुताबिक वो साहित्यिक वातावरण में वो खुद को मिसफिट मानते थे. खाने-कमाने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी. वो बहुत कुछ करना चाहते थे.


muktibodh with wife


साईकिल पर बांटा करते थे अखबार

मुक्तिबोध अपनी टूटी हुई साईकिल उठाते और अखबार बांटने के लिए निकल पड़ते. साईकिल की हालत भी उन दिनों के मुक्तिबोध जैसी ही थी. बैठने की सीट फटी हुई, पैडल के नाम पर लोहे का ढांचा. मास्टरी करके खर्चे पूरी नहीं होते थे, इसलिए अखबार बेचकर ऊपरी कमाई हो जाती थी. रोजाना रास्ते में उन्हें कॉलेज प्रोफेसर अंचलजी मिला करते थे, जो उनकी ऐसी हालत देखकर तंज कसते हुए कहते थे ‘ये देखो, हिंदी का एजरा पाउंड जा रहा है’ ये उन दिनों की बात है जब मुक्तिबोध ‘तार सप्तक’ के पहले कवि बन चुके थे, लेकिन अंचलजी उन्हें कोई दर्जा देने को तैयार ही नहीं थे.


muktibodh1


जिंदा रहते नहीं छप सकी कोई रचना

दिन बीतते गए और मुक्तिबोध एक अदद नौकरी की तलाश में आवेदन पर आवेदन भेजते रहे, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलता. मुक्तिबोध के पास न ही पूंजी थी और न ही प्रकाशकों से अच्छे सम्बध. उनकी अपनी कविता पुस्तक भी उनके जीवनकाल में नहीं निकल पाई. वे ‘नर्मदा की सुबह’ निकालना चाहते थे, पर चाहने भर से ही तो हर काम नहीं बनता. मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल ‘एक साहित्यिक की डायरी’ प्रकाशि‍त की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशि‍त हुआ. ज्ञानपीठ ने ही ‘चांद का मुँह टेढ़ा है’ प्रकाशि‍त किया. इस तरह मरने के बाद ही उनकी कोई रचना छप सकी. कहा जाता है कि ज्ञानपीठ के साथ हुए अनुबंध (contract) पर साइन करने के दौरान मुक्तिबोध की तबियत बेहद खराब हो गई. वो पूरे दिन बिस्तर पर लेटे-लेटे आधी-आधी सिगरेट पीते रहते थे. 11 सितम्बर 1964 को वो जिंदगी के हर तरह के अनुबंधों से आजाद हो गए…Next


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