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क्‍या बच्‍चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं निजी स्‍कूल

Posted On: 12 Sep, 2017 social issues में

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एक मासूम जब स्‍कूल जाना शुरू करता है, तो उसके लिए स्‍कूल सेकेंड होम यानी दूसरा घर होता है। मगर हाल ही घटनाओं को देखें, तो यह साफ कहा जा सकता है कि एक मासूम अपने घर में माता-पिता के साथ जितना सुरक्षित होता है, उतना ही वो स्‍कूल में असुरक्षित है।


CCTV


8 सितंबर को गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्‍कूल में सात वर्षीय मासूम छात्र प्रद्युम्‍न की गला रेतकर हत्‍या कर दी गई, तो 9 सितंबर को दिल्‍ली के एक स्‍कूल में चौथी कक्षा की छात्रा से रेप हुआ। ये दोनों ही वारदात मानवता को झकझोर देने वाली हैं। इससे पहले भी नामी स्‍कूलों में ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं।


प्रद्युम्‍न मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उसके पिता की अर्जी पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, हरियाणा सरकार, CBI और सीबीएसई को नोटिस जारी किया। याचिका में मांग की गई है कि स्कूलों को बच्चों की सुरक्षा के बारे में एक गाइडलाइंस जारी की जाए। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्‍या गाइडलाइंस के बिना बच्‍चों की सुरक्षा को लेकर स्‍कूलों की कुछ जिम्‍मेदारी नहीं बनती। बच्‍चों के लिए स्‍कूल उनके दूसरे घर जैसा होता है। कितनी चिंताजनक बात है कि अपने दूसरे घर में ही बच्‍चे असुरक्षित हैं।


इन घटनाओं को देखकर आपके मन में भी न जाने कितने सवाल उठे होंगे। आपको भी अपने बच्‍चों की चिंता सताने लगी होगी। मासूम प्रद्युम्‍न और उसके बिलखते परिजनों को देखकर आपका भी गला भर आया होगा। आपके जेहन में भी सवाल उठे होंगे कि क्‍या स्‍कूल प्रबंधन का काम सिर्फ फीस लेना और कक्षाएं चलाना है या स्‍कूल में बच्‍चों को सुरक्षा देना भी उनकी जिम्‍मेदारी बनती है। आप अपनी राय, अपने विचार ‘जागरण जंक्‍शन’ मंच के माध्‍यम से लोगों तक पहुंचा सकते हैं।


नोट- अपना ब्‍लॉग लिखते समय इतना अवश्‍य ध्‍यान रखें कि आपके शब्‍द और विचार अभद्र, अश्‍लील व अशोभनीय न हों तथा किसी की भावनाओं को चोट न पहुंचाते हों।



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