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राम रहीम पर इतना अंधा विश्वास कि इनके घरों में चूल्हे तक नहीं जले!

Posted On: 31 Aug, 2017 Social Issues में

Pratima Jaiswal

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जब कोई प्यार में होता है तो ज्ञानी से ज्ञानी व्यक्ति भी पागल हो जाता है. उसके सोचने-समझने की शक्ति खत्म होने लगती है. वो प्यार में कब ठग लिया जाता है उसे अंदाजा तक नहीं होता. वो हर रोज प्यार का हवाला देकर बेवकूफ बनाया जाता है लेकिन उसकी बुद्धि जैसे सील हो जाती है. वो किसी का समझाया हुआ नहीं समझता और इस बात पर यकीन ही नहीं करता कि उसके साथ जो भी हो रहा है वो छलावा है.


ram rahim supporter

अब इस ‘प्यार’ शब्द को ‘विश्वास’ के साथ रिप्लेस कर दीजिए, यानि ऐसा तब भी होता है जब कोई किसी पर गहरा विश्वास रखता है, लेकिन ये विश्वास कब अंधविश्वास बन जाता है, पता ही नहीं चलता. ऐसे में सवाल उठता है कि क्यों किसी को इतना विश्वास होने लगता है? हम किसी को इस हद तक पसंद करने लगते हैं कि उसे नायक या भगवान बना देते हैं.


ram rahim 1

डेरा में अपने भक्तों से बात करता राम रहीम

गुरमीत राम रहीम मामले में भी यही हुआ. राम रहीम के समर्थकों को अब तक यकीन नहीं हो पा रहा है कि उनके भगवान किसी का रेप कैसे कर सकते हैं? राम रहीम पर फैसला आने पर करीब 1.5 लाख समर्थक इस फैसले का विरोध कर रहे थे. इस विरोध की वजह था, उनका विश्वास. उनका विश्वास कहता था कि बाबा कुछ गलत कर ही नहीं सकते.



बाबा के गम में नहीं जले कई घरों में चूल्हें

ग्रीन वेलफेयर फोर्स की एक सदस्य सुषमा भी राम रहीम के समर्थकों में से एक है. उनका कहना है कि ‘विश्वास हिलता है तो दुख तो होता है लेकिन रेप और मर्डर की बात अभी भी गले से नीचे से उतर रही. हमारे यहां 100 से ज्यादा डेरा प्रेमी रहते हैं. उनमें से कुछ तो इतने दुखी हैं जिनके घरों में चूल्हा भी नहीं जला.’



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राम रहीम के समर्थक फैसला आने से पहले


‘हम बाबा को हमेशा सलाम करते रहेंगे’

राम रहीम के एक और समर्थक का कहना था ‘मुझे कभी डेरा में कुछ गड़बड़ नजर नहीं आई. हमें बाबा के जाने के बाद अनाथों जैसा महसूस हो रहा है. हम सब बाबा को हमेशा सलाम करते रहेंगे.’ वहीं समर्थकों की इस भीड़ में कई लोग ऐसे भी दिखे, जो ना सिर्फ रोते हुए दिखे बल्कि ये कहते हुए पाए गए कि उनका मन ये मानने को कतई तैयार नहीं है कि बाबा ने रेप किया होगा या किसी की हत्या भी की होगी.

अदालत का फैसला आने के बाद भी ये लोग काफी सुबूत होने पर भी बाबा को दोषी मानने को तैयार ही नहीं हैं. ऐसे में इसे अंधविश्वास ना कहा जाए तो फिर क्या कहा जाए?…Next


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