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‘मैडम...ये तो धंधेवाली की बेटी है!’ बंद कमरों की कहानियों को मिला एक मंच

Posted On: 30 Aug, 2017 Social Issues में

Pratima Jaiswal

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मुझे दूसरे बच्चों के साथ खेलने की मनाही नहीं थी लेकिन मैंने धीरे-धीरे खुद ही बाहर खेलना छोड़ दिया. मुझे बाहर खेलना हमेशा से अच्छा लगता था. खेलते-खेलते मैं थोड़ी दूर निकल जाती थी. वहां पार्क में बड़े घरों के बच्चे आते थे. जिनके कपड़ों से हमेशा महक आती थी. वो फूलों की खूशबू मुझे बहुत पसंद थी. शुरूआत में, मैं 2-3 दिन उनके साथ खेला भी करती थी, लेकिन एक रोज किसी ने मुझे चिल्लाकर वहां से भगा दिया. ‘मैडम…जी ये तो धंधेवाली की बेटी है. आप इसे छोटे बाबा के साथ मत खेलने दीजिएगा’.


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ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंज रहे हैं. मैंने घर आकर अपनी मां से पूछा ‘मां धंधेवाली क्या होता है? क्या आप धंधा करती हैं? मेरा सवाल सुनकर उनकी आंखों में आसूं आ गए, जिन्हें संभालते हुए वो मुस्कुराकर बोली ‘काम-धंधा तो हम सभी करते हैं, कोई अपना शरीर बेचता है तो कोई अपनी आत्मा’.

ये कहानी रेड लाइट में काम करने वाली महिलाओं के उन बच्चों की हो सकती है, जिनका जन्म लेना एक दुर्घटना है. उन्हें कोई पहचान नहीं मिलती और अपनी असली पहचान बताने पर समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता लेकिन अंधेरी जिंदगी की इन कहानियों को एक मंच मिला विदेश में. लंदन में एक आर्ट फेयर लगने जा रहा है, जिसमें मुंबई के मशहूर रेड लाइट एरिया कमाटीपुरा की सेक्स वर्कर की बेटियां अपनी जिंदगी के अनुभव नाटक के रूप में सबके सामने बयां करेगी.


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हम भी इंसान है…आपकी तरह

इन लड़कियों को इस स्टेज तक पहुंचाने का का काम किया है कमाटीपुरा रेडलाइट एरिया में काम करने वाले एनजीओ ‘क्रांति’ ने. ये लड़कियां फ्रिंज सहित ब्रिटेन में 9 प्ले करेंगी. ‘लालबत्ती एक्सप्रेस’ ने फ्रिंज जाने से पहले लंदन में अपने शो का प्रीमियर किया, जिसमें उन लड़कियों की कहानी को दिखाया गया जो ट्रैफिकिंग का शिकार हुईं. यूके में ये लड़कियां सेक्स वर्कर्स के यहां ही रुकीं थीं.

ग्रुप की एक कलाकार कहती हैं ‘मुझे बहुत अच्छा लगा कि लोग हमें सुन रहे थे, कई लोग तो हमारी कहानियों से इतने भावुक हो गए थे कि हमारे सामने ही रो दिए. हम किसी से सहानुभूति तो नहीं लेना चाहते लेकिन बस ये बताना चाहते हैं कि हम भी इंसान हैं, बिल्कुल आपकी तरह’.


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समाज अपनाएगा तो जीना आसान होगा

इन लड़कियों की जिंदादिली की तारीफ करनी होगी, जो बचपन में इतने कड़वे अनुभवों से गुजरने के बाद भी माफ करने को एक शुरूआत के रूप में देखती हैं. उनका कहना है कि वो अपनी पहचान नहीं छुपाना चाहती. अगर समाज हमें इसी सच के साथ अपनाएगा तो हमारा जीना और भी आसान हो जाएगा.


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जरा ये भी तो सोचिए

कहते हैं हमारा जन्म हमारे हाथों में नहीं है और ना ही हम किसी क्षेत्र विशेष आदि को चुनकर वहीं जन्म लेते हैं. हमारे हाथ में हमारी मेहनत और जिंदगी के प्रति नजरिया होता है, जिससे हम अपनी किस्मत खुद बदल सकते हैं.

हम सभी के लिए ‘माफ करना जरूरी है’ ये नजरिया उस वक्त और भी अहम हो जाता है, जब हम अपने कड़वे अनुभव को बदल नहीं सकते….Next


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