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बच्चियों के रेप से पैदा हुए बच्चे कहां जाएं? न्याय में देरी भी एक सजा

Posted On: 29 Aug, 2017 Social Issues में

Pratima Jaiswal

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साल 2002 में एक फिल्म रिलीज हुई थी ‘कर्ज’. जिसमें किरण खेर ने एक ऐसी लड़की का किरदार निभाया था, जिसमें वो रेप का शिकार हो जाती है. सीरियल रेपिस्ट का किरदार आशुतोष राणा ने अदा किया है. रेप विक्टिम लड़की गर्भवती हो जाती है और गहरे सदमे में डूबकर दिन-रात अदालतों के चक्कर काटती है लेकिन उसे इंसाफ नहीं मिलता. अंत में वो एक बच्चे को जन्म देती है लेकिन उसे जिंदगी भर नहीं अपना पाती. उस बच्चे में उसे अपना रेपिस्ट दिखाई देता है. दोनों की जिंदगी सामान्य नहीं हो पाती. बच्चे को अपनी मां का कभी प्यार नहीं मिल पाता और रेप का शिकार हुई लड़की कभी बच्चे को स्वीकार नहीं कर पाती.


rape victim

जबर्दस्ती से पनपे हुए रिश्ते जिंदगी को किस तरह बर्बाद कर सकते हैं, इस फिल्म को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है. फिल्म जुल्म का शिकार हुई एक औरत की मनोस्थिति, रेप से जन्मे बच्चे का बचपन और कानून व्यवस्था को दर्शाती है. फिल्मों से परे असल जिंदगी में भी ऐसी त्रासदी देखने को मिल रही है. जिसमें 10-12 साल की छोटी बच्चियां रेप का शिकार हो रही हैं और उन्हें अनचाहे बच्चे को जन्म देने तक की नौबत तक आ जाती है. चंडीगढ़ के बाद मुंबई की 13 साल की बच्ची के माता-पिता ने अदालत में गर्भपात के लिए गुहार लगाई है. बच्ची 30 हफ्तों से गर्भवती है. जबकि कानून के मुताबिक 20 हफ्तों के भीतर ही गर्भपात करवाने की इजाजत है.


rape protest 1

ऐसे में अपनी जान को खतरे में डालते हुए बच्ची अपने पेट में बच्चे को ढोने के लिए मजबूर है.चंडीगढ़ मामले में तो अबॉर्शन का फैसला आने में इतनी देर लगी कि बच्ची को गर्भधारण किए कई महीने बीत गए, तब अदालत ने देरी का हवाला देते हुए गर्भपात पर रोक लगा दी. अब 10 साल की बच्ची 10-12 दिन के बच्चे की मां बन चुकी है. ऐसे में स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन बच्चों के पैदा होने पर घर में खुशियों का नहीं बल्कि मातम का माहौल होता है.


इन बच्चियों को पता भी नहीं चलता कि हुआ क्या है?

एक एनजीओ के सर्वे से सबसे पहले ये बात सामने आई थी कि करीब 50 फीसदी मामलों में घरवाले या परिचित लोग ही बच्चों का यौन शोषण करते हैं. कई मामलों में तो बच्चियों की उम्र इतनी छोटी होती है कि उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं होता कि उनके साथ हुआ क्या है. घरवालों को वक्त के साथ उनकी बिगड़ती तबियत और बढ़े हुए वजन को देखकर मामला समझ आता है, इसके बाद अगर वो अदालत का दरवाजा खटखटाते भी हैं, तो फैसला आने में बहुत देर हो जाती है.


rape protest 2


दोषी को सजा लेकिन उसके बच्चे की कौन करे परवरिश

कई मामले ऐसे देखे गए हैं जब अदालत में रेपिस्ट का गुनाह तो साबित हो जाता है लेकिन देरी से फैसला होने की वजह से रेप का शिकार हुई बच्ची नवजात को जन्म देती है. ऐसे में बच्चे की परवरिश और उसे स्वीकार करना कितना मुश्किल होता है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. वहीं हमारे देश में जहां रेप के मामलों में फैसले आने में इतने साल लग जाते हो, वहां रेप से पनपे अनचाहे गर्भ पर फैसला देरी से आने का अंदाजा लगाया जा सकता है.


rape protest


आप खुद सोचिए, आज हम उस समाज में रह रहे हैं, जहां रेप के हादसे से गुजर चुकी लड़की को समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता, वहां रेप से जन्मे बच्चे को लेकर समाज का नजरिया कैसा होगा? पूरी उम्र विक्टिम के साथ बच्चा भी बिना अपराध किए ही सजा भोगते रहेगा. ऐसे में देरी से मिला हुआ न्याय, अन्याय बन जाता है. …Next





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