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जंगल में रहने वाले इस व्यक्ति ने जो किया शायद ही कोई कर पाए, मिल चुके है कई पुरस्कार

Posted On: 24 Jan, 2017 Social Issues में

Pratima Jaiswal

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जंगल को काटकर आधुनिक बनने की दौड़ और फिर जीने के लिए जंगल बचाने की चिंता से उपजे आंदोलन और सम्मेलन. आधुनिकता की मार झेल रहे हम इंसानों और जंगल की बीच सिर्फ इतना ही रिश्ता है. जरूरत का रिश्ता. इसके अलावा हमें हरियाली या वन से कोई खास लगाव नहीं है, लेकिन जरा, देश के आदिवासी इलाकों के बारे में सोचिए, जिनके लिए जंगल सिर्फ जरूरत नहीं बल्कि जीवन है. जंगल से उन्हें इतना प्रेम होता है कि एक पेड़ काटने पर इन्हें किसी अपने का खोने सा दुख होता है.

जंगल और जीवन से जुड़ी ऐसी ही कहानी है जादव पायेंग की. आइए, करीब से जानते हैं ‘जंगलमैन’ नाम से जाने जाने वाले पायेंग की.


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बाढ़ के वक्त अपनी जरूरतें नहीं इन्हें दिखा जंगल

पायेंग की उम्र आज करीब 55 साल है, लेकिन 24 साल की उम्र में उनकी जिंदगी में एक रोमांचक मोड़ उस वक्त आया जब असम में बाढ़ आ गई थी. बाढ़ की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि असम में घर पूरी तरह तबाह हो गए थे. वहीं इंसान और जंगली जानवर भी काल का ग्रास बन चुके थे. ऐसे में हर कोई सरकार से मदद पाने के लिए राहत समाग्री पर आश्रित हो चुका था, लेकिन पायेंग को अपने खाने-पीने की चिंता से ज्यादा जंगल और पारिस्थितिकी तंत्र की थी. पायेंग ये अच्छी तरह जानते थे कि हालात सामान्य होने के बाद असम के लोगों को जंगल की ओर ही लौटना पड़ेगा. तब सरकार की ओर से कोई मदद नहीं आएगी.


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हालातों से लड़ते हुए नदियों के पास लगाए पेड़

पायेंग ने सबसे पहले अपने घर के पास मौजूद ब्रह्मापुत्र नदी के पास बंजर पड़ी जमीन पर पौधे लगाने शुरू किए. देखते ही देखते उन्होंने कई इलाके कवर कर लिए. करीब 30 साल की मेहनत के दौरान वो बंजर पड़ी जमीन पर 550 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बना चुके हैं. पायेंग के बसाए हुए जंगलों में आज कई जंगली जानवर रहते हैं, जो पायेंग के दोस्त बन चुके हैं. उनके नाम पर इन जंगलों का नाम रखा गया है.


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गांव वालों ने शुरू कर दिया था विरोध

ये 30 साल इस जंगलमैन के लिए आसान नहीं रहे. गांववालों की भलाई के लिए किए जा रहे काम के बदले उन्हें काफी अपमान भी सहना पड़ा, क्योंकि वो जिस जंगल को बना रहे थे, इस दौरान हरियाली देखकर कई जंगली जानवर गांवो में घुस आते थे और गांववालों के पालतू जानवरों को उठाकर ले जाते थे. इस वजह से गांव में दहशत फैल गई थी, लेकिन धीरे-धीरे हालात सामान्य होते गए. पायेंग ने गांव वालों को मनाकर अपना साथ देने के लिए कहा. गांववाले भी इस बात के लिए तैयार हो गए और फिर देखते ही देखते बंजर जमीन हरी हो गई.


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ऐसे बन गए भारत के पहले ‘फोरेस्टमैन’

उनके इस काम से प्रभावित होकर साल 2012 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने उन्हें भारत का पहला फोरेस्टमैन की संज्ञा देने के साथ उन्हें, कई पुरस्कारों से नवाजा. सबसे खास बात ये कि तत्कालीन असम सरकार के अलावा राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी कई मंचों पर उनकी सराहना की थी. साल 2015 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.


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असम में भगवान हैं जंगलमैन

असम में जंगल से जुड़ी हुई काफी समस्या हैं. कई इलाकों में तो नदियों के आसपास मिट्टी की समस्या भी गंभीर रूप ले चुकी थी. ऐसे में पायेंग का ये कदम किसी फरिश्ते से कम नहीं है. उन्होंने असम के लोगों की रोजगार से जुड़ी हुई समस्या को काफी हद तक कम कर दिया है. राज्य में उन्हें भगवान की तरह सम्मान दिया जाता है.

एक मशहूर कहावत है ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. जबकि जादव पायेंग की इस कहानी को सुनकर हकीकत कहावतों से अलग ही नजर आती है…Next


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