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साफ-सफाई करती थी ये महिला, प्रोफेसर से हुई मुलाकात ने बदल दी जिदंगी

Posted On: 10 Apr, 2016 Social Issues में

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‘मुझे लगता है कि अगर एक राइटर क्या पीछे छूट गया या क्या भूल गया, इस बात की चिंता करने लग जाएगा तो शायद वो एक शब्द भी नहीं लिख पाएंगा.’ ‘ए लाइफ लेस आर्डिनरी’ किताब की लेखिका बेबी हालदार की लिखी ये लाइन जिदंगी के सारांश को समझने के लिए काफी है. हर किसी इंसान के जीवन में ऐसे कड़वे अनुभव होते हैं जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता. लेकिन जो लोग इन सभी कड़वे अनुभवों को भूलकर आगे बढ़ते हुए अपना जीवन जिंदादिली से जीते हैं पहचान तो उन्हीं की बनती है.


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बेबी हालदार भी ऐसे ही लोगों में से हैं जो अपने बुलंद हौसलों से फर्श से अर्श तक का सफर पूरा करते हैं. बेबी हालदार पांच-छह साल पहले तक गुमनाम जरूर थी मगर आज वह इतनी चर्चित है कि लेखन की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम है हालांकि आज भी बेबी का ठिकाना वहीं है, प्रो.प्रबोध कुमार के घर- डीएलएफ सिटी गुड़गांव में. प्यार से जिस घर को वह तातुश कहती हैं. तातुश का अर्थ होता है सबसे अधिक प्रिय. बेबी साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेने हांगकांग, पेरिस से भी जा चुकी हैं. आपको बेबी की कहानी सुनकर हैरानी होगी. असल में उनकी कहानी  13 साल में शुरू हुई. जब उनकी सौतेली मां ने उनकी शादी करवा दी.


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शादी के बाद भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई. उनका पति उन्हें रोज मारता था. अपनी शादीशुदा जिंदगी में उन्हें कभी प्यार नहीं मिला. बेबी के साथ उनका पति जो भी व्यवहार करता था, उन दुखभरे अनुभवों को वो रात में पन्नों पर लिख दिया करती थी. यहां से उनकी लेखनी में धार आनी शुरू हुई, और फिर एक रोज उन्होंने अपने पति को छोड़ने का फैसला कर लिया. वो प्रो.प्रबोध कुमार के घर साफ-सफाई का काम करने लगी. इस दौरान उन्होंने शब्दों की नई दुनिया के बारे में जाना.


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उन्होंने अपने जीवन के हर लम्हें को अपनी आत्मकथा ‘आलो आंधरी’ के रूप में 2002 में उतारा. इसके बाद तो लेखन की दुनिया में वो जाना पहचाना नाम बन गई. उनकी किताब ‘ए लाइफ लेस आर्डिनरी’ का 12 भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है. इशस्त रूपांतर, घोरे फेरर पथ आदि किताबें उनकी बेस्टसेलर्स किताबों में से एक है…Next

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