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इनकी मौत पर नहीं था कोई रोने वाला, पैसे देकर बुलाई जाती थी 'रुदाली'

Posted On: 3 Feb, 2016 social issues में

Pratima Jaiswal

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‘हम रुदाली है और रोना हमारा पेशा है. लेकिन इस नई पीढ़ी से तो रोया भी नहीं जाता.’ इन दिनों रेडियो मिर्ची का ये विज्ञापन टी.वी पर खूब दिखाया जा रहा है. जिसमें मिर्ची सुनने वाले लोगों को हर हाल में खुश रहने की आदत को, बेहद मजाकिया अंदाज में बयां किया गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं असल में जिदंगी में किसी के मरने पर रुदाली नाम के पुराने पेशे से जुड़ी महिलाओं को बाकायदा पैसे देकर रोने के लिए बुलाया जाता था. कुछ लोग ‘रुदाली’ शब्द से वाकिफ है लेकिन ये बात कम लोग ही जानते होंगे कि एक सामाजिक बुराई या फिर यूं कहें कि संकीर्ण मानसिकता की वजह से ‘रुदाली’ नाम का पेशा चलन में आया.


indian village women

मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी द्वारा लिखी गई ‘रुदाली’ नाम की बंगाली कहानी पर 1993 में फिल्म भी बनाई जा चुकी है. जिसे न सिर्फ दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया बल्कि कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया था. जिसमें कहानी की नायिका शनिचरी का किरदार डिंपल कपाडिया ने निभाया था. इस किरदार के लिए उन्हें नेशनल फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. रील लाइफ से रीयल लाइफ की बात करें तो रुदाली पेशे की शुरूआत राजस्थान के ग्रामीण इलाकों से मानी जा सकती है. जब देश में खासकर ग्रामीण इलाकों में जातिगत भेदभाव अपने चरम पर था.


इस कारण से हुई शुरूआत

आधुनिक युग में आज भी लोग रोने को कमजोरी की निशानी के रूप में लेते हैं. ऐसे में न रोने को असली मर्दों की पहचान से जोड़कर देखा जाता है. कुछ ऐसी ही सोच उन दिनों राजस्थान के अधिकतर इलाकों में भी थी. जिसमें अगड़ी जातियों और जमींदारों के घर किसी मर्द के मरने पर आंसू बहाना उनकी कमजोरी और शान के खिलाफ बात समझी जाती थी, इसलिए बचपन से ही इन्हें अपनी भावनाओं को मारकर कभी न रोने की सख्त हिदायत दी जाती थी. वहीं दूसरी ओर इनके घरों की महिलाओं को इतना दबाकर रखा जाता था. कि वो खुलकर अपनी वेदना या दुख नहीं जता सकती थी.


rudali

वहीं दूसरी ओर एक अन्य धारणा के अनुसार, पुरानी मान्यताओं को मानने वाले कुछ जमींदार अपनी पत्नी और परिवार की महिलाओं को दबाकर रखते थे साथ ही उन पर जुल्म करने से भी नहीं चूकते थे. इस कारण से भी उन महिलाओं को अपने परिवार के पुरूषों से किसी प्रकार का भावानात्मक जुड़ाव नहीं हो पाता था. इसलिए उनकी मौत पर उन्हें आजादी का एहसास होता था. ऐसे में आप उस स्थिति की कल्पना कर सकते हैं इन घरों में किसी परिजन के मर जाने पर रोने वाला कौन बचता होगा. दूसरी ओर हिन्दू मान्यता के अनुसार किसी व्यक्ति के मर जाने पर उसकी मौत पर आंसू बहाने से, आत्मा को मिलने वाली शांति की बात कही गई है इसलिए कठोर या बुरे व्यक्ति के मरने के बाद दो आंसू बहाने को परम्परा से जोड़कर देखा जाता है.

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बदहाल स्थिति में रहती हैं ‘रुदाली’

हालांकि, बदलते समय के साथ रुदाली नाम के पेशे से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या में कमी हुई है लेकिन इनका अस्तित्व अभी भी है. इनके साथ अछूतों-सा व्यवहार किया जाता है. कुछ इलाकों में तो इनके लिए गांव के आखिरी छोर या किसी निर्जन स्थान पर छोटा-सा मकान बनाकर उन्हें रहने की इजाजत दी जाती थी. वो गांव के किसी उत्सव में भाग नहीं ले सकती थी. इस पेशे से जुड़ने वाली ज्यादातर महिलाएं समाज के उन तबकों से होती थी जो समाज के द्वारा किसी न किसी रूप में प्रताडित हुई हो.

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