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200 महिलाओं की भीड़ ने एक सीरियल रेपिस्ट की हत्या कर छोड़े कई सवाल

Posted On: 6 Dec, 2015 social issues में

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क्या कानूनों में संशोधनों से बलात्कार की घटनायें रूक जाती है? क्या ऐसी घटनाओं पर रोकथाम के लिये केवल कानूनों का सहारा जरूरी है या समाज को अपने स्तर से इस पर पहल करनी चाहिये? क्या बलात्कार की घटना पर लगाम लगायी जा सकती है? ये सारे सवाल भारतीय समाज के सामने बीते कई दशकों से सिर उठाते रहे हैं जिसका ठोस जवाब अब तक नहीं मिला है. समय-समय पर ये सवाल किसी घटना के माध्यम से हमारे समाने जीवंत हो उठते हैं. पर ठोस जवाब हम आज तक खोज नहीं पाये हैं. कहीं न कहीं चूक है, सच्चाई यह है कि यह चूक समाज के स्तर से हो.


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बीते दशक की एक घटना जेहन में आती है. एक घटना जिसका उद्देश्य सबक सिखाना था. इस घटना में करीब 200 महिलाओं के एक समूह ने अदालत परिसर के सामने एक सीरीयल रेपिस्ट को मिलकर पीट दिया था. उस आरोपी को इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गयी. मामला पुलिस सुरक्षा में रहे एक आरोपी की हत्या का था. इसलिये कानूनी मामला बना. आरोपी को पीटने वाली सभी औरतों ने उस हत्या की सामूहिक जिम्मेदारी ली.


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हालांकि, अभियुक्त एक ऊषा नारायणे ही बनायी गयी. यह घटना 13 अगस्त, 2004 को घटी जब एक सीरियल रेपिस्ट अक्कू यादव को पुलिस की सुरक्षा में ही पीटा गया. इस भीड़ ने यह दावा किया कि छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराते समय पुलिसवाले उन पर हँसते हैं. उससे पहले अक्कू यादव के खिलाफ साक्ष्य होने के बावजूद पुलिस उसे बिना ठोस कार्रवाई के छोड़ देती थी.


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इस घटना ने समाज और कानून के पहरेदारों के सामने कई प्रश्नों को फिर से परिभाषित करने की कोशिश की. यह सवाल अब भी है जिसका जवाब आपसे अपेक्षित है.Next….


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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
June 8, 2016

रपिष्ट समन्धित केसों का जल्दी से निपटारा हो जाना चाहिए, जल्दी से जल्दी फांसी या आजन्म कैद की सजा हो जानी चाहिए ! जो पुलिस अधिकारी इन केसों में एफ आई आर दर्ज करने में आनाकानी करते हैं उन्हें बी हेड काल कोठरी में दाल दिया जाना चाहिए ! अगर क़ानून ऐसे जघन्य ाफराधियों को भी सजा नहीं देती है तो जनता को कौन रोक पाएगा !


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