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हुनर और मेहनत को नहीं रोक सकता कोई, गोतिपुआ से जुड़े किशोर हैं एक नई मिसाल

Posted On: 10 Nov, 2015 social issues में

Pratima Jaiswal

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भारत की संस्कृति और विरासत की चर्चा पूरी दुनिया में हमेशा से होती रही है. विविधताओं से भरे हमारे देश में हर राज्य में कुछ न कुछ ऐसा ख़ास है जो उस राज्य की अलग पहचान पेश करता है. आज के बदलते परिवेश में हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं लेकिन हम सब में कुछ ऐसा अनोखा एहसास छुपा हुआ है जिससे हम अपनी जड़ों से जुड़े हुए रहते हैं. वहीं अपने बड़ों से मिली विरासत को संजोकर रखने की जिम्मेदारी भी हम सब पर है.


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ओडिशा की ऐसी ही अनोखी धरोहर ‘गोतिपुआ नृत्य शैली ‘ ख़ास होकर भी अपने अस्तित्व के लिए जूझती हुई दिखाई दे रही रही है. ऐसा कहा जाता है कि गोतीपुआ नृत्यशैली की शुरुआत 16वीं सदी में हुई थी. उस दौरान इस कला को इतना पसंद किया जाता था कि पूरे भारतवर्ष  में इस नृत्यशैली की एक अलग पहचान थी. लेकिन बदलाव की बयार में जिस तरह से हर क्षेत्र और पहलुओं में बदलाव हुआ उस तरह शास्त्रीय नृत्यकलाओं में गोतीपुआ का नाम कहीं गुम-सा हो गया.


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लेकिन इस कला को चाहने वाले लोगों की आज भी कमी नहीं है इसलिए शास्त्रीय कला से जुड़ाव रखने वाले लोग इस कला को अपनी वाली पीढ़ी के लिए संजोकर रखना चाहते हैं. इस कला को लोगों तक पहुंचाने और पुनर्जीवित करने के लिए 13 साल से कम आयु तक के किशोर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि गोतिपुआ नृत्य कला को पेश कर रहे लड़के, लड़कियों की वेशभूषा में सजे रहते हैं. इस नृत्यशैली में कई दिलचस्प मुद्राओं और् हैरतअंगेज करतबों  के साथ कृष्ण-राधा से जुड़ी कोई कहानी पेश की जाती है. साथ ही भगवान जगन्नाथ की उपासना भी इस खास कला के द्वारा प्रस्तुत की जाती है.


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गोतिपुआ एक उड़िया भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है अकेला लड़का. जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि इस कला में कम उम्र के लड़के हिस्सा लेते हैं. इस कला को सीखने के लिए किशोर बेहद कम उम्र से ही खास करतबों और मुद्राओं का अभ्यास शुरू कर देते हैं. ओडिशा के एक गांव रघुराजपुर में इस कला से अधिकतर लोग जुड़े हुए हैं. बल्कि ये कहना गलत नहीं होगा कि इस गांव को गोतिपुआ नृत्य कला के लिए एक खास तरह का दर्जा हासिल है.


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लेकिन इसका दूसरा पहलू ये है कि इस कला को आगे बढ़ा रहे बच्चे आर्थिक रूप से इतने मजबूत नहीं है. जिसकी वजह से इन्हें अपनी मौलिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. वे बेशक स्कूल जाते हैं लेकिन फिर भी आगे का रास्ता इन प्रतिभाशाली किशोरों के लिए आसान नहीं है. गोतिपुआ को सीखने और अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर इस कला को एक नई पहचान दिलाने के लिए ये बच्चे पूरे जुनून के साथ जुड़े हुए हैं. इस कला के प्रति इन हुनरमन्द बच्चों के समपर्ण को समझते हुए ‘आरोहण’ संस्था ने इनका हाथ थामा है. संस्था न सिर्फ इन्हें इस कला के प्रसार-प्रचार के लिए मंच उपलब्ध करवा रही है बल्कि इन किशोरों को देश की इस अनोखी विरासत को संजोकर रखने के लिए प्रोत्साहित भी कर रही है.


हाल ही में संस्था के अर्थक प्रयास से, गोतिपुआ से जुड़े प्रतिभावान किशोरों को सेलेक्ट सिटी, प्रेस क्लब और इजराइली दूतावास के राजनयिक ‘डेनियल टॉब’ के घर में परफॉर्म करने का अवसर मिला था. जिसे देखकर लोग इस नृत्य शैली और इन किशोरों से बेहद प्रभावित हुए थे. वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जिन्होंने पहली बार इस कला को देखा था. इस बेहतरीन प्रस्तुति को देखकर, उन लोगों में इस कला और इससे जुड़े हुए प्रतिभाशाली बच्चों के बारे में जानने की जिज्ञासा और भी बढ़ गई थी. साथ ही लड़कियों की वेशभूषा में सजे इन लड़कों के दिलचस्प नृत्यमुद्राओं की तारीफ भी सभी ने दिल खोलकर की…Next


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