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पति की मौत की खबर इन्हें सुकून पहुंचाती है

Posted On: 15 Mar, 2014 social issues में

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उसे नहीं पता उसका पति कहां है, एक लंबा अरसा गुजर गया जब उसने अपने पति की शक्ल देखी थी. लोग कहते हैं उसका पति मर गया, कोई कहता है उसके पति ने किसी और से शादी कर ली लेकिन 10 साल पहले उसका पति कहीं गया और लौटकर अभी तक वापस नहीं आया. वो ना तो खुद को सुहागन मान सकती है, ना विधवा. अफसोस जाते-जाते उसका पति उसे तलाक देकर भी नहीं गया इसलिए वह खुद को तलाकशुदा मानकर विवाह के बंधन से आजाद भी नहीं मान सकती.


हम हमेशा से यही सोचते आए हैं कि दक्षिण एशियाई देशों में ही महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों का आंकड़ा ज्यादा रहा है, सिर्फ यही वो देश हैं जहां भिन्न-भिन्न तरीकों से महिलाएं उत्पीड़न का शिकार होती हैं लेकिन जिस प्रथा के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं उसका वास्ता दक्षिण एशियाई देशों से नहीं बल्कि यहूदी राष्ट्र इजराइल से है.


अगुना, ये संज्ञा उस स्त्री को दी जाती है जो चाहते हुए भी खुद को शादी के बंधन से आजाद नहीं कर पाती क्योंकि उसके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिससे कि वो जबरदस्ती के बंधन को तोड़कर उससे छुटकारा पा सके. रुढ़िवादी देश, इजराइल में हजारों की संख्या में ऐसी महिलाएं हैं जिनका विवाहित जीवन समाप्ति के कगार पर है. उनका पति ना तो उनके साथ रहता है और ना ही उनसे कोई सरोकार रखता है, लेकिन ऐसे हालातों के बावजूद भी वह तलाक की अर्जी दायर नहीं कर सकतीं. इजराइल में विवाह पूरी तरह धार्मिक मसला है और तलाक के लिए उन धार्मिक दस्तावेजों को जारी करना बहुत जरूरी होता है जिनके आधार पर विवाह किया गया है. लेकिन अगर पति तलाक ना देना चाहे तो वह ऐसे किसी भी दस्तावेज को जारी नहीं करता और उसकी पत्नी उम्रभर के लिए उसकी अगुना या बंदिनी बनकर रह जाती है.


महीने के ‘वो’ दिन किसी श्राप से कम नहीं हैं…..


agunah

प्राचीन समय में अगुना स्त्रियों का स्वरूप और उनके बंधक जीवन जीने का कारण अलग होता था. ये वे स्त्रियां होती थीं जिनके पति युद्ध के लिए सीमा पर जाते थे और फिर कभी वहां से लौटकर नहीं आ पाते थे. उनकी पत्नियों को उनके जीवित या मृत रहने की कोई खबर नहीं होती थी और लापता पति के इंतजार में वे पूरा जीवन ‘अगुना’ के तौर पर जी लिया करती थीं. लेकिन आजकल ऐसे मामले बहुत कम हैं जबकि उन मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है जब पति के होते हुए भी स्त्री ‘बंदिनी’ के ही तौर पर रहती हैं क्योंकि उनका पति उन्हें तलाक नहीं देना चाहता. कोई भी अगुना अपने ऊपर थोपे गए इस बंधन से तब तक आजाद नहीं हो सकती जब तक उसका पति स्वयं उसे तलाक देने के लिए राजी ना हो जाए या फिर पति के मृत होने की खबर पुख्ता ना हो जाए.



उल्लेखनीय है कि यहूदी राष्ट्र इजराइल में किसी महिला को तलाक तभी मिलता है जब उसका पति इस तलाक के लिए राजी हो और अगर किसी भी कारण से पति तलाक देने से मना कर दे तो शारीरिक संबंध तो दूर की बात है, वह स्त्री ना तो किसी दूसरे पुरुष से शादी कर सकती है और ना ही किसी गैर मर्द से कोई संबंध रख सकती है. वह ताउम्र तनहां जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाती है. वैसे कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जो तलाक के लिए राजी ना होकर अपने पति को ‘बंधक’ जीवन जीने के लिए मजबूर कर देती हैं. लेकिन शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारे समाज में पुरुष कभी शोषित नहीं बल्कि हमेशा शोषक की ही भूमिका में रहता है. उसे आजादी सिर्फ अपने शौक पूरे करने के लिए चाहिए ना कि किसी दमन-शोषण का शिकार होने की वजह से वह अपने शादीशुदा जीवन से आजाद होना चाहता है.

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ऐसा नहीं है कि ‘अगुना’ के हितों के लिए कोई काम नहीं किया जा रहा. आपको बता दें कि महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘येद लईशा’ और ‘मावोई सतम’, जिनका दावा है कि यहूदी राष्ट्र समेत पूरी दुनिया में हजारों की संख्या में ‘अगुनाएं’ मौजूद हैं और इन्हें पहचान देने के लिए, उन्हें उनका हक दिलाने के लिए प्रतिवर्ष 13 मार्च को अगुना दिवस मनाया जाता है.


अनजाने चेहरों के बीच से – हैलो मां, कैसी हो?


अब तक भारत समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों की महिलाओं को ही पति द्वारा उत्पीड़न का शिकार माना जाता था लेकिन विश्व में अन्य कई ऐसे देश हैं जहां सदियों से महिलाओं के प्रति अत्याचार किए जा रहे हैं जिनमें मिस्र, सऊदी अरब, सीरिया आदि देशों के नाम सबसे ऊपर लिए जा सकते हैं.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Vineet Dubey के द्वारा
April 11, 2014

Thanks

ashokkumardubey के द्वारा
March 26, 2014

महिलायें पूरे विश्व में शोसित रहीं हैं रहेंगी खासकर मुस्लिम समुदाय तो महिलाओं पर इंतहा जुल्म ढाता है और उनकी धार्मिक कट्टरता ऐसी सामाजिक बुराई को बनाये रखने के लिए ही काम करती दीखती है अतः जिन देशों में अगुना स्त्रियां हैं उनको तो मृत्यु प्रयन्त अपने समाज में कायम बुरायिओं को झेलना ही है हाँ अफगानिस्तान की मलाला जैसी लड़कियां इसके खिलाफ आवाज उठा सकती हैं .हमें ऐसी सताई महिलाओं से हमदर्दी है


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