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महीने के ‘वो’ दिन किसी श्राप से कम नहीं हैं.....

Posted On: 14 Mar, 2014 social issues में

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नहीं, मेरी बेटी चौपदी के लिए नहीं जाएगी. मैं उसे उस नर्क में नहीं भेज सकती जहां से वापस आने की कोई गारंटी नहीं है, ये उसका भाग्य नहीं है, इसमें उसकी कोई गलती नहीं है………


नेपाल के छोटे से गांव में चौपदी की बेहद दर्दनाक और अमानवीय प्रथा सदियों से विद्यमान रही है. लेकिन शायद आप या नेपाल के बाहर के लोग इस प्रथा के बारे में नहीं जानते होंगे, शायद उन्होंने कभी उस दर्द को महसूस नहीं किया होगा जो नेपाल के लेगुड्सेन अछम की पहाड़ियों के बीच बसे एक गांव की हर वो लड़की करती है जिसका मासिक धर्म चक्र शुरू हो चुका है.


यूं तो भारत के परंपरागत समाज में मासिक धर्म के दौरान महिला को अपवित्र समझा जाता है, उसे पूजा-पाठ से दूर रखा जाता है, किसी पवित्र काम में उसका होना अशुभ माना जाता है, लेकिन महिलाओं पर होने वाला यह उत्पीड़न शायद कुछ कम था जिसकी कसर नेपाल के गांव देहातों में पूरी कर ली जाती है. नेपाली स्त्रियों की पीड़ा की शुरुआत तभी से हो जाती है जब उन्हें मासिक धर्म होने लगता है और हर माह उनके साथ कुछ इस तरह अछूतों की तरह बर्ताव किया जाता है जैसे उन्हीं की किसी गलती की वजह से उन्हें हर माह मासिक धर्म होता है. यकीन मानिए उनके लिए तो यह किसी श्राप से कम नहीं है.



chaupadi


चौपदी के बारे में सुनकर शायद किसी भी स्त्री के रोंगटे खड़े हो जाएंगे और वे पुरुष जिनके अंदर मानवीय भाव अभी भी जीवित हैं वह भी इस प्रथा के खिलाफ अपना रोष प्रकट करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे. नेपाल के लेगुड्सेन जैसे इलाकों में माहवारी के दौरान महिलाओं को अपने ही घरों में जाने की इजाजत नहीं मिलती क्योंकि उन्हें पूरी तरह अछूत समझा जाता है. मंदिरों और पूजा-पाठ के कार्यक्रमों से तो उन्हें दूर रखा ही जाता है, साथ ही पानी के सार्वजनिक स्त्रोतों का प्रयोग करना भी उनके लिए निषेध होता है. इतना ही नहीं किसी सामाजिक उत्सवों में भी उनका शरीक होना अशुभ समझा जाता है. स्कूल जाने वाली बच्चियों को माहवारी के दौरान अपना स्कूल तक छोड़ना पड़ता है.

chaupadi

महिलाओं के उत्पीडन की दास्तां सिर्फ यही समाप्त नहीं होती क्योंकि माहवारी के दौरान उन्हें जिस जगह रखा जाता है उसे आप आम भाषा में नर्क कह सकते हैं क्योंकि उस छोटी सी कुटिया में ना तो कोई खिड़की होती है और ना ही किसी तरह की कोई सुरक्षा. यहां तक कि उन्हें खाना भी ऐसे पकड़ाया जाता है ताकि खाना देने वाले का हाथ उस महिला को छू ना पाए.




पहाड़ी के बीचो-बीच बसे इस गांव में कभी भी जंगली जानवर हमला कर देते हैं ऐसे में जिन झोपड़ियों में वे महिलाएं रहती हैं उनमें कोई दरवाजा ना होने की वजह से उनकी सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है. ऐसे हालातों की वजह से कई महिलाओं ने अपनी जान भी गंवाई है, किसी को सांप ने काट लिया तो कोई जंगली जानवर के हमले की शिकार हो गई. इससे भी अधिक दर्दनाक बात यह है कि कई लड़कियों को ऐसी अवस्था के बावजूद बलात्कार तक का शिकार होना पड़ा है.


पोर्न के काले बाजार पर रोक की पहल

लड़कियों की सुरक्षा, उनके साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं के मद्देनजर नेपाल सरकार ने वर्ष 2005 में ही इस प्रथा पर रोक लगा दी थी लेकिन दूरदराज के इलाकों में आज भी इस प्रथा को एक रिवाज के तौर पर मनाया जाता है, ऐसा रिवाज जो बिना किसी अपराध के महिलाओं को उनके महिला होने की सजा देता है, वह घुट-घुटकर जीती हैं लेकिन अपनी आवाज उठा नहीं पातीं. कुछ ने तो दिल से इस प्रथा को अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया तो कुछ बस इसी इंतजार में हैं कि कोई इस प्रथा को अस्वीकार करे तो उन्हें भी जिन्दा रहने, खुली हवा में सांस लेने और एक सम्मानजनक जीवन जीने का मौका मिले.


लेकिन शायद यह सब इतना भी आसान नहीं है……

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sandeep upadhyay के द्वारा
March 15, 2014

veri bad

sunil के द्वारा
March 15, 2014

painfull

swaminth maurys के द्वारा
March 15, 2014

akhir manav ko akal kab ayegi

suraj के द्वारा
March 14, 2014

अब जागो भारत जागो ,देर हो ना जाय जागो वन पवन का सुबेरा या हो रातो का अंधेरा हो तुफानो का भी घेरा , निंद हो या राति का सफेरा कर खुद से ये वादे ,जयेंगे तो पायेंगे कितनी कठीन हो ये राहे


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