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सगे भाई की दरिंदगी से हार गई वो मासूम

Posted On: 17 Jan, 2014 social issues में

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निर्भया कह लीजिए या दामिनी, एक स्त्री के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म जैसी बेहद अमानवीय घटना के सबसे बड़े दोषी, जो कथित तौर पर नाबालिग है, को बाल न्यायालय द्वारा नामात्र की सजा प्रदान की गई. निश्चित तौर पर इस नामात्र की सजा का खामियाजा अन्य महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है जिसका ज्वलंत उदाहरण हाल ही में रांची की घटना है जिसमें एक मासूम के साथ 10 लोगों ने मिलकर बलात्कार किया. सबसे हिलाकर रख देने वाली बात यह है कि इन दस लोगों में जिन सात लोगों को नाबालिग की श्रेणी में रखा गया है उनमें से दो पीड़िता के सगे भाई हैं और अन्य तीन आरोपी विवाहित हैं, जिनमें से एक व्यक्ति तीन बच्चों का पिता भी है. हाल ही में हुई इस घटना के वयस्क आरोपियों को जेल भेज दिया गया है और बाकी के सात ‘नाबालिग’ आरोपियों को बाल सुधार गृह भेजा जा चुका है.


वैसे तो पहले से ही यह मुद्दा एक बहस का विषय है कि क्या बलात्कार जैसे आरोप में गिरफ्तार हुए व्यक्ति के नाबालिग होने की वजह से उसे बाल न्यायालय के अंतर्गत सजा दी जानी चाहिए या फिर नाबालिग कहलवाने की उम्र को कम कर दिया जाना चाहिए? निर्भया सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद यह उम्र कम करने के लिए ड्राफ्ट तैयार भी किया गया था लेकिन यह कानून का रूप नहीं ले पाया था.


मर्दवादी समाज नहीं समझ पाएगा बलात्कार का दंश


ईश्वर के बाद अगर किसी को जन्म देने का अधिकार है तो वह है स्त्री, स्त्री शरीर को भगवान का एक अनमोल तोहफा भी माना गया है लेकिन अफसोस औरत का अपना शरीर दुनिया के लिए तो एक वर्दान है लेकिन स्वयं उसके लिए यह एक श्राप बनकर रह गया है और इसका एकमात्र कारण वे नरभक्षी पुरुष हैं जो उसे और उसके शरीर को अपने भोग-विलास का मात्र एक साधन समझकर उसका मनचाहे तरीके से उपयोग करना चाहते हैं और बेधड़क करते भी हैं. हद तो तब हो जाती है जब हम बलात्कार, यौन शोषण और महिलाओं के प्रति होने वाले अन्य गंभीर और झकझोर कर रख देने वाले अपराधों को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. कभी नाबालिग बताकर तो कभी विक्लांग या बुजुर्ग होने का बहाना देकर हर बार हम पुरुष को बचने का एक मौका दे देते हैं. न्याय व्यवस्था और हमारे समाज की इसी कमजोरी का फायदा पुरुषों को मिलता है जिसके बाद वे अपने मनमाफिक तरीके से स्त्री के शरीर और उसकी भावनाओं का शोषण करते हैं. सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि अगर कोई स्त्री अपने प्रति होने वाले ऐसे अपराधों का वर्णन किसी के सामने करती है, अपनी व्यथा किसी को बताती है तो वह खुद ही दोषी समझे जाने लगती है क्योंकि हमारे समाज की धारणा ही यही है कि कोई पुरुष बिना स्त्री की इच्छा या उसकी अनुमति के उसे हाथ तक नहीं लगा सकता इसलिए अगर किसी महिला के साथ कोई अपराध होता है तो वह स्वयं इसके लिए दोषी समझे जाने लगती है.


लड़की औरत कब बने?


अगर वह बिना अपने पिता, भाई या पति के साथ के घर से बाहर निकलती है, किसी पराए पुरुष से दोस्ती करती है तो उसे चरित्रहीन समझ लिया जाता है, वह अकेले घर से बाहर कदम निकाले तो उसपर फब्तियां कसने वाले हजार लोग मिल जाते हैं. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या वह अपने घर, अपने परिवार और परिवार के ही पुरुषों के साथ खुद को सुरक्षित महसूस कर सकती है? क्योंकि कई बार ऐसे उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं जब पिता, पति या रिश्तेदारों द्वारा महिला का शोषण किया जाता है. अब भारत में मैरिटल रेप की अवधारणा का तो कोई अर्थ है नहीं इसलिए पति द्वारा जबरन शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जाता. लेकिन सगे भाई-बहनों के पाक रिश्ते को झकझोरकर रख देने वाली इस घटना के बारे में आप क्या कहेंगे?


सीधी और स्पष्ट बात यह है कि पुरुष मानसिकता का भरोसा कभी नहीं किया जा सकता और इस बात का इस घटना से बड़ा और सटीक उदाहरण और हो भी क्या सकता है जहां दो सगे भाइयों ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर अपनी ही नाबालिग बहन की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर दिया और शायद उन्हें इस बात का पछतावा भी नहीं है. हो सकता है इस बार भी गलती इस मासूम पीड़िता की ही रही हो….


जब कमजोरी ही ताकत बन जाए तो कोई हरा नहीं सकता

बस बोझ को ‘जिम्मेदारी’ का नाम दे दिया

वो क्यों बलात्कारी के घर दुल्हन बनकर जाए?


Web Title : rape cases in india minor raped his sister



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