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गे एक्टिविटी पर सुप्रीम कोर्ट का तमाचा

Posted On: 11 Dec, 2013 social issues में

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दिनोंदिन आधुनिकता की भेंट चढ़ते जा रहे भारतीय समाज में समलैंगिकों के लिए अधिकार मांगने का सिलसिला भी शुरू हो गया था. गे राइट्स एक्टिविस्ट सड़कों पर उतरकर सरकार, न्यायालय और समाज से अपने अधिकार मांग रहे थे. मानवाधिकारों की आड़ में स्वयंसेवी संगठन भी समलैंगिकों को समान अधिकार दिए जाने की पुरजोर कोशिशों में लगे रहे लेकिन इस बीच सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने सबकी उम्मीदें तोड़ते हुए सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के साथ ही मानवता को बचाने का काम किया है.


homosexualsउल्लेखनीय है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों के बीच स्थापित होने वाले किसी भी प्रकार के शारीरिक संबंधों को अवैध बताकर उन्हें अपराध के दायरे में ला खड़ा किया है. इतना ही नहीं अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि वयस्क समलैंगिकों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध भी पूरी तरह गैर-कानूनी हैं. आपको बता दें कि इससे पहले दिल्ली हाइकोर्ट ने वयस्क समलैंगिकों के बीच स्थापित होने वाले संबंधों को कानूनी रूप से वैध घोषित करने जैसा फैसला सुनाया था लेकिन हाइकोर्ट के इस फैसले को ‘कानूनी रूप से गलत’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक क्रांतिकारी निर्णय सुनाया है.




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आपको बता दें कि 3 जुलाई,  2009 को समलैंगिक संबंधों पर दिए गए अपने फैसले में हाइकोर्ट का कहना था कि संविधान की धारा 377 के उस प्रावधान में,  जिसमें समलैंगिकों के बीच सेक्स को अपराध करार दिया गया है, से मूलभूत मानवाधिकारों का हनन होता है. हाइकोर्ट के इस निर्णय का तीखा विरोध करते हुए कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने समलैंगिक अधिकारों जैसे फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और अब सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय स्पष्ट कर दिया है जिसके अनुसार संविधान की धारा 377 के अंतर्गत किसी भी महिला या पुरुष के साथ बनाए जाने वाले अप्राकृतिक यौन संबंध या फिर किसी जानवर के साथ स्थापित शारीरिक संबंध अपराध के दायरे में आएंगे और दोषी व्यक्ति को कम से कम 10 वर्ष और अधिकतम उम्रकैद तक की सजा हो सकती है.




यूं तो भारत में समलैंगिक संबंधों का अस्तित्व शायद पाषाण काल से ही मौजूद है लेकिन ब्रिटिश राज में ही धारा 377 जैसा प्रावधान लागू कर अंग्रेजों ने ऐसे अप्राकृतिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में ला दिया था. परंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया समलैंगिकों का खुलकर अपने अधिकारों की मांग करने का सिलसिला शुरू हो गया और देखते ही देखते विदेशी तर्ज पर भारत में भी सड़कों पर समलैंगिक जमात दिखाई देने लगी. जहां पहले समलैंगिक अपने संबंधों को लेकर शर्मिंदगी महसूस किया करते थे वहीं अब वे अपने अधिकारों की मांग भी उठाने लगे हैं.




हाइकोर्ट तो धारा 377 को मानवाधिकार हनन करार दे ही चुका था लेकिन इसे बरकरार रख पहली बार सुप्रीम कोर्ट भारतीय परंपरा के संरक्षक के रूप में उभरकर सामने आया है. शारीरिक संबंध भले ही व्यक्ति का निजी मसला हो, साथी का चयन उसकी अपनी पसंद हो लेकिन जब बात अप्राकृतिक सेक्स की आती है तो इसका संबंध सिर्फ और सिर्फ इंसानी शरीर पर अत्याचार करने तक ही सीमित होता है. बात यहां सिर्फ समलैंगिकों को अधिकार देने की नहीं है क्योंकि अगर समलैंगिक संबंधों को कानून का संरक्षण प्राप्त हो जाएगा तो ऐसे अमानवीय संबंधों का दायरा दिनोंदिन विस्तृत होता जाएगा, जिसका शिकार बनेंगे वे मासूम बच्चे जिन्हें शायद शारीरिक संबंधों का अर्थ भी नहीं पता, वे पत्नियां या प्रेमिकाएं जिनका साथी सिर्फ अपने आनंद के लिए उनके शरीर के साथ अत्याचार करेगा. कोई कैसे यह कल्पना कर सकता है कि प्रकृति ने जिस स्थान को शरीर की गंदगी बाहर निकालने का जरिया बनाया है उसका उपयोग आनंद और मौज-मस्ती के लिए किया जाए.



जब कमजोरी ही ताकत बन जाए तो कोई हरा नहीं सकता


खुद को खुले विचारों वाला करार देने वाले ऐसे बहुत से लोग हैं जो समलैंगिकों को समर्थन देने के पीछे उनके वैयक्तिक जीवन जैसी दुहाई देते हैं. उन्हें यह सोचना चाहिए कि भारत जहां संबंधों का दायरा काफी बड़ा होता है वहां निजी संबंधों के मसले को व्यक्तिगत कहना किसी समस्या का समाधान नहीं है. इसके विपरीत हमें समाज, संस्कृति और स्वास्थ्य पर घोर आघात कर रहे ऐसे संबंधों को कम से कम भारत में तो समर्थन नहीं देना चाहिए. समलैंगिकता पूरी तरह एक अनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अपराध है, जिसका पुरजोर विरोध होना ही चाहिए. क्योंकि शायद कोई भी भारतीय यह नहीं चाहेगा कि ऐसी घृणित रवायत कभी भारत में अपने पैर पसारे.



जहां मर्द होंगे वहां बलात्कार तो होगा ही

इस नई चुनौती का सामना समाज को एक साथ करना होगा



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ashok Shankaram के द्वारा
December 15, 2013

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एकदम सही है .

December 13, 2013

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एकदम सही है .


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