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इस नई चुनौती का सामना समाज को एक साथ करना होगा

Posted On: 9 Dec, 2013 social issues में

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आज जिस दौर से भारतीय समाज गुजर रहा है वह बड़े बदलाव का वक्त है. भारतीय समाज की मान्यताएं समय के साथ बदल रही हैं. इसमें महिलाओं की बदलती भूमिका ने सामाजिक व्यवस्था में बड़े बदलाव लाए हैं. पश्चिमी तर्ज पर भारतीय समाज में भी महिलाओं को लेकर सोच में खुलापन आने लगा है. महिलाएं परिवार, समाज और देश को लेकर अपनी भूमिका के लिए जागरुक हो रही हैं.


women empowerment in indiaशिक्षा से लेकर सामाजिक चिंतन, आर्थिक से लेकर अपने अधिकारों की रक्षा तक हर जगह महिला का स्वयं के लिए और समाज का इनके प्रति नजरिए में बदलाव आया है. परिवार से आगे आकर महिलाएं व्यवस्थापक की भूमिका तक भी पहुंच चुकी हैं. संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण इनकी इन नई बदलती भूमिकाओं को ही इंगित करता है. लेकिन इसके साथ ही कई अन्य नई समस्याएं भी सामने आई हैं. महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के रूप में बलात्कार, यौन शोषण जैसे मामले अब बड़ी संख्या में सामने आने लगे हैं. लेकिन महिलाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो पुरुषों का सहारा लेकर महिला होने का फायदा उठाकर आगे बढ़ना चाहता है. इसमें सामाजिक मान्यताएं और मूल्य को वह कहीं पीछे छोड़ चुकी होती हैं और अपना हित न सध पाने की स्थिति में वे इन पुरुषों को सबक सिखाने के लिए अपनी ‘महिला छवि’ का ही इस्तेमाल करती हैं. हालांकि यह वर्ग बहुत छोटा और सिमटा हुआ है लेकिन महिलाओं की अस्मिता पर प्रशनचिह्न जरूर लगा जाता है. महिलाओं के विरुद्ध यौन-शोषण, यौन हिंसा जैसे मामलों में महिलाओं की स्थिति आज संदेह की नजर से देखी जाने लगी है. पहले जहां ऐसे मामले महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर अति गंभीर माने जाते थे, आज स्थिति यह है कि उन मामलों में महिलाओं की सुरक्षा की बात से पहले उनके चरित्र की बात आ जाती है.


गत दिनों महिलाओं को लेकर फारुख अब्दुल्ला का एक बयान खासा विवादित रहा. फारुख का कहना था कि उन्हें अब महिलाओं के नाम से ही डर लगता है. इसलिए अब वे महिला सेक्रेटरी रखने से डरने लगे हैं कि क्या जाने कब वे शोषण का इल्जाम लगा दें और उनकी छवि खराब हो जाए. कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुला के पिता के रूप में भी कश्मीर की राजनीति में एक उल्लेखनीय स्थान रखने वाले फारुख अब्दुला का यह बयान निश्चय ही महिलाओं के लिए उनकी सोच को इंगित करता है. भले ही यह उनकी व्यक्तिगत सोच हो लेकिन कानून बनाने की भूमिका निभाने वाले की सोच सिर्फ व्यक्तिगत नहीं कही जा सकती. कहीं न कहीं यह व्यवस्था की धारा तय करती है. समाज में इन्हें व्यवस्थापक के साथ विश्लेषक की नजर से भी देखा जाता है. इनका बयान कई जगह समाज में पुरुषों की सोच का परिचायक बन सकता है.

लड़की औरत कब बने?

उल्लेखनीय है कि हाल ही में महिला यौन शोषण के दो बड़े मामले ‘जज-इंटर्न प्रकरण’ और ‘तहलका प्रकरण’ मीडिया में खासा चर्चित रहा. पहले ये दोनों घटनाएं कॉर्पोरेट जगत में (कार्यस्थल पर उच्च अधिकारियों द्वारा) महिला-शोषण की एक और कहानी के रूप में प्रचारित हुईं. फिर महिलाओं के चरित्र पर बात उठ आई. मुद्दा उठा कि दोनों ही प्रकरण में महिलाएं वर्तमान में शोषित होने की शिकायत न कर पूर्व में हुए शोषण की बात कर रही थीं, तो शिकायत में इतना लंबा वक्त क्यों? सवाल यह उठा कि कहीं यह इन महिलाओं की हित-साधने का चरित्र तो नहीं था? सवाल एक बार को सोचनीय है. हम यहां इस पर बहस नहीं कर रहे. यहां सवाल यह उठता है कि ऐसे मामलों को आधार बनाकर किसी राज्य के सम्मानित राजनीतिज्ञ का समूल महिला जाति के चरित्र पर सवाल उठाता बयान क्या उचित है?


बदलाव के साथ खूबियां और खामियां दोनों ही जुड़े होते हैं. भारतीय समाज में महिलाओं की बदलती स्थिति को लेकर भी हालात कुछ ऐसे ही हैं. खासकर यौन-शोषण आज एक ऐसा मुद्दा है जिससे सिर्फ महिला नहीं बल्कि आज पुरुष समुदाय भी पीड़ित है. बच्चों के प्रति यौन-हिंसा के मामले इसका एक अलग ही रूप है. लेकिन हर स्थिति के अपने पहलू हैं. हर एक का अपना पक्ष है. जहां तक महिलाओं द्वारा यौन-शोषण को लेकर पुरुषों का दोहन करने का सवाल है, इसके भी अपने तर्क, अपने पक्ष-विपक्ष हैं. इसका निष्पक्षता से आंकलन किया जाना चाहिए. लेकिन इसे मानक मानकर महिलाओं को मुख्य धारा से अलग नहीं किया जा सकता. फारुख अब्दुल्ला का बयान कुछ ऐसा ही है. अगर एक व्यवस्थापक महिलाओं के संबंध में ऐसे विचार रखता है निश्चय कहीं न कहीं महिलाओं की व्यवस्था में भूमिका घटाने की ओर यह एक इशारा माना जाएगा. कहीं न कहीं महिलाओं की भूमिका को निष्पक्ष मानने से भी यह इनकार करता है जो हर हाल में निंदनीय है.

केवल अहं की तुष्टि के लिए यह अमानवीयता क्यों?


किसी भी रूप में ‘शोषण’ निंदनीय है. यह समाज के मानकों के खिलाफ है. सभ्य और स्वस्थ समाज के नियमों का उल्लंघन है. इसके लिए जो भी जिम्मेदार हो समाज और कानून दोनों ही जगह उसे उचित सजा दिए जाने का प्रावधान है. महिला-यौन-शोषण और यौन-शोषण के नाम पर पुरुषों का दोहन दोनों ही अपराध की श्रेणी में आते हैं. लेकिन दोनों ही स्थितियों के लिए न समाज ने आज तक कभी पुरुषों का बहिष्कार किया है न इसके लिए कभी महिलाओं का बहिष्कार किया जा सकता है. सच तो यह है कि महिला-पुरुष से बढ़कर यह एक सामाजिक मुद्दा है, सामाजिक मूल्यों के ह्रास का मुद्दा है. महिला-पुरुष दोनों ही समाज के दो मजबूत स्तंभ हैं. इनमें अगर एक भी कमजोर होता है तो समाज का पतन निश्चित है. यह सच है कि बदलाव के बयार के साथ महिलाएं सशक्त हुई हैं. इस सशक्तिकरण के साथ ही कई जगह महिला छवि के नाम पर ये पुरुषों के दोहन से भी नहीं चूकतीं लेकिन इससे महिलाओं का समूल चरित्र चित्रण करना एक और प्रकार का शोषण और समाज के एक महत्वपूर्ण स्तंभ को गिराने की अवांछित कोशिश ही कही जाएगी. इससे बेहतर है कि इन स्थितियों से निपटने के लिए समाज का हर नागरिक (महिला और पुरुष) जागरुक और चरित्रवान हो बजाय कि हो हल्ला मचाकर एक मजबूत होते स्तंभ को गिराने की कोशिश की जाए.

Sexual Crime Against Women And Men In India

भूख से बिलखता विकासशील भारत

दोष बस यही है कि हम ‘इंसान’ हैं



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