blogid : 316 postid : 589590

समाज के चेहरे पर धब्बा है ‘बलात्कार’

Posted On: 31 Aug, 2013 social issues में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

महिलाओं के प्रति होने वाली वारदातों में आए दिन वृद्धि हो रही है लेकिन हमारा सामना उनमें से सिर्फ दो-चार से ही हो पाता है. कुछ को परिवार वाले इसीलिए सामने नहीं लाते क्योंकि अगर बेटी के साथ बलात्कार की बात सामने आई तो उनकी बहुत बदनामी होगी, वहीं कुछ इसीलिए बाहर नहीं आतीं क्योंकि पुलिस और अपराधियों की सांठ-गांठ के बीच पीड़िता की आवाज ही दब जाती है. कुछ ऐसी घटनाएं भी होती हैं जब पैसों का लालच देकर अपराधी और पीड़िता के बीच समझौता हो जाता है.


लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के अनुसार बलात्कार जैसे जघन्य अपराध से पीड़ित महिला और अपराधी के बीच हुए समझौते को दोषी की सजा कम करने का आधार नहीं बनाया जा सकता. अदालत का कहना है कि अगर ऐसा किया जाता है तो यह बलात्कार जैसे बेहद अमानवीय अपराध के प्रति समाज और न्यायप्रणाली की असंवेदनशीलता को दर्शाने वाला है.


पीटीआई की तरफ से आ रही खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और उनकी तीन सदस्यी खंडपीठ ने सामूहिक दुष्कर्म के दो दोषियों, हरियाणा के शिंभू और बालू राम, की सजा कम करने की मांग को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा करना समाज हित में नहीं है. अपने इस निर्णय को सही दिशा देने के साथ-साथ और अधिक व्यापक करते हुए देश की सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना था कि बलात्कार के मामले में दोषी या पीड़ित के धर्म, जाति, आर्थिक या सामाजिक हैसियत, सुनवाई में हुई देरी या दोषी द्वारा विवाह का प्रस्ताव दिए जाने जैसी बातों को कानून और सजा का आधार नहीं बनाया जा सकता क्योंकि बलात्कार कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसे व्यक्तिगत ठहराकर नजरअंदाज कर दिया जाए बल्कि यह एक ऐसा जुर्म है जो पूरे समाज को प्रभावित करता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अगर पीड़िता अपने अपराधी के साथ समझौता कर भी लेती है तो भी अपराध का दंश कम नहीं होता. हालांकि कुछ अपवादों में जरूर इस फैसले में संशोधन किया जा सकता है लेकिन फिर भी बलात्कार पूरे समाज को प्रभावित करता है जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता.


सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत के वर्तमान सामाजिक हालातों के अनुकूल तो है लेकिन जैसा कि हमने पहले आपको बताया कि भारत में बलात्कार को पीड़ित की इज्जत पर एक दाग की तरह देखा जाता है और अपराधी, जिसे निंदा और घृणा का पात्र समझा जाना चाहिए, वह खुलेआम घूमता है. यही वजह है कि कोई भी महिला अपने ऊपर हुए इस अपराध को सार्वजनिक करना ही नहीं चाहती. कुछेक नृशंस वारदातें जरूर मीडिया की नजर में आ जाती हैं लेकिन जो कड़वी सच्चाइयां समाज के भय के कारण छिप जाती हैं उन्हें उजागर करने और पीड़िता को सही न्याय दिलवाने का रास्ता तब तक साफ नहीं हो सकता जब तक ऐसी वारदातों के प्रति हमारा समाज अपना नजरिया नहीं बदलता.




Tags:               

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 1.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

gopaljeesingh के द्वारा
September 1, 2013

हमारा और आपका सम्मिलित प्रयास ही इस बुराई को मिटा सकता हैं।


topic of the week



अन्य ब्लॉग

latest from jagran