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आजादी हर भारतीय को नहीं मिली

Posted On: 15 Aug, 2013 में

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images (1)एक बार फिर वह दिन आ गया जब सारे बैर-द्वेष भूलकर हम बस गले मिलते हैं, एक दूसरे को बधाइयां देते हैं. हिंदुओं की होली और मुस्लिम समुदाय के पर्व ईद के बाद शायद यह अकेला ऐसा पर्व है जिस पर लोग कम से कम एक दिन के लिए ही सही लेकिन अपने सारे गिले-शिकवे भुलाकर सौहार्द्रपूर्ण भावनाएं एक-दूसरे से व्यक्त करते हैं. उससे भी बड़ी बात यह है कि यह एक ऐसा पर्व है जो हर वर्ग, हर समुदाय, हर धर्म के लिए समान रूप से मायने रखता है. बधाइयां देते हुए भी हम यह नहीं सोचते कि मेरे सामने खड़ा इंसान मेरे धर्म का है या नहीं. यही बात इस पर्व को सबसे खास बनाती है.


आजादी! आजादी हर किसी को प्यारी होती है. हर किसी को इसकी खुमारी होती है, आजादी पर्व भी हर किसी के लिए सबसे ज्यादा प्यारी होती है. क्या पंछी, क्या इंसान, आजादी से ज्यादा बड़ी, ज्यादा महत्वपूर्ण चीज किसी के लिए कुछ नहीं होता. हम हिंदुस्तानियों के लिए भी इससे बड़ी चीज और कुछ नहीं है. हमने तो इसके लिए जाने कितनी जानें गंवाई, जाने कितनी लाठियां खाईं, जाने कितने खून बहाए, तब जाकर कहीं हमें आजादी का जश्न मनाने, आजादी के गीत गुनगुनाने का मौका मिला. आजादी की यह खुशी तो हर हिन्दुस्तानी के दिल में हमेशा रहेगी और होना भी चाहिए. पर आजादी के जो मायने नजर आते हैं, वह कहीं निराश करते हैं.


हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को हम स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस की खुशियां मनाते हैं. लाल किले पर बड़े गर्व से झंडा फहराते हुए हम आजादी की उद्घोषणा करते हैं. हर गली, हर मुहल्ला, हर चौक-चौराहा तिरंगा फहराते हुए स्वतंत्रता दिवस के नारों से गुलजार होता है. जलेबियां खाते हुए, लाल किले पर जवानों की सलामी परेड देखते हुए, हर बात पर कहीं न कहीं हमारी जुबान पर होता है, “आज तो मत टोको…आजादी का दिन है आज, हर कोई आजाद है आज”! सच है, हर कोई आजाद है, पर दुख इस बात का होता है कि आजादी की खुशी बस इसी दो दिन दिखती है. जिस भारतीयता या हिंदुस्तानियत की हम बात करते हैं, वह बस इसी दिन दिखती है. उस लोकोक्ति की तरह, “चार दिनों की चांदनी, बाकी अंधेरी रात….” जाने अन्य दिनों में यह भावना कहां गुम हो जाती है. जाने क्यों अन्य दिनों में जाति, धर्म और राज्यों के नाम पर हम लड़ते हैं.


जाति और धर्म के नाम पर लड़ते हुए, राज्यों के नाम पर लड़ते हुए, एक दूसरे पर तोहमत लगाते हुए यह भारतीयता कहीं नजर नहीं आती. आजादी का आधा दशक पूरा करने के बाद भी हम राज्यों के बंटवारे के लिए लड़ते हैं. जाति और धर्म के नाम पर राजनीति होती है, दंगे होते हैं, खून-खराबा होता है. यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है. नि:संदेह आजादी ने हमें विदेशियों का हुक्म मानने से आजाद किया है. नि:संदेह हमने अपनी हुकूमत से बहुत कुछ अच्छा पाया है. नि:संदेह हम अपनी हुकूमत से बहुत कुछ और पाएंगे और आगे ही आगे बढ़ते जाएंगे. संदेह आजाद भारत में भारतीयों की काबिलियत पर नहीं है, संदेह आजादी का पूरा उपयोग नहीं कर पाने पर है. एक वक्त था जब भारत सोने की चिड़िया कहा जाता था. अंग्रेजों की हुकूमत ने इस चिड़िया को ‘सोने की चिड़िया’ से ‘मिट्टी की चिड़िया’ बना दिया. गरीबी से बदहाल हम हिंदुस्तानी आजादी पाकर ही खुश थे. हमने सोचा कोई बात नहीं, लूटपाट की घटनाएं तो होती रहती हैं, धीरे-धीरे हम सारा कुछ वापस बना लेंगे. हमने नि:संदेह बहुत कुछ बनाया. पर वह नहीं बन पाए जो पहले थे-“सोने की चिड़िया”! पर क्या वास्तव में ऐसा है? क्या वास्तव में हम आज भी गरीबी के बड़े आंकड़े रखने के हकदार हैं?


हर देश की अपनी कुछ नीतिगत विवशताएं होती हैं. हमारे पास भी धन की कमी, गरीबी हमेशा एक बड़ी समस्या रही वरना प्रतिभाओं की कमी हमारे पास कभी नहीं थी. एक नजर देखने पर इंडिया आज भी गरीब देश है, पर जब भी घोटालों पर नजर जाती है, समझ नहीं आता कि इतने पैसों के बाद भी गरीब की संज्ञा हम खुद को कैसे दें! दशक हो गए किसी बड़ी सरकारी योजना को घोटालों से परे देखे. जितनी बड़ी योजनाएं, उतना बड़ा घोटाला! लाखों में नहीं, करोड़ों में जाते हैं ये घोटाले. चारा घोटाला, अलकतरा घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोयला घोटाला, टू जी घोटाला, करोड़ों के अवैध स्विस बैंक अकाउंट और न जाने क्या-क्या. इतने घोटाले अगर हुए, पैसे तो थे ही. अपनी ईमानदारी को ताक पर रखकर हमने, देश की जरूरतों, देश के हितों को ताक पर रख दिया यह और बात थी. लेकिन यह सब जानकर हम कैसे कहें कि हम गरीब हैं और कि गरीबी हमारे देश के विकास में, ‘सोने की चिड़िया’ की संज्ञा तक पहुंचने में यह गरीबी बहुत बड़ी बाधा है? नहीं, यह कहना सरासर गलत होगा. पर हां, आजादी हर भारतीय को नहीं मिली यह जरूर कही जा सकती है. आज भी फुटपाथ पर रहने वाले आजादी का जश्न तक मनाने को आजाद नहीं. जलेबियां खरीदने, तिरंगा खरीदने के पैसे वे कहां से लाएं, सफेद कपड़े पहनकर शांति का दूत सफेद कबूतर खरीदकर उसे उड़ाने के पैसे वे कहां से लाएं, आजादी की खुशी में खूबसूरत पतंग खरीदकर उसे उड़ाने के पैसे वे कहां से लाएं! तो कैसे कहें कि हर भारतीय 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया. हां, अंग्रेजों की गुलामी से वह आजाद हुआ, पर एक प्रकार से अपनी गरीबी, अपनों की गुलामी तो उसे आज भी करनी है.


यह भी सच है कि मुश्किल वक्त में एकता भारतीयों की पहचान है. अपने बीच चाहे कितनी भी तकरार रहे, मुश्किल घड़ी में हम एक दूसरे के साथ होते हैं, अच्छी बात है. लेकिन अगर यही एकता आम चुनावों में भी दिखती, यही एकता हर आम और खास मौके पर दिखती तो शायद आज भारत विकास की परिभाषा गढ चुका होता.

Web Title: Independence Day celebrations in India



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