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सरोगेसी की आंच में तपती ममता

Posted On: 17 Jul, 2013 में

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कहते हैं माता पिता भगवान का रूप होते हैं क्योंकि उन्होंने आपको हाड़-मांस का जिंदा शरीर देकर आपको एक जिंदगी दी है. किसी को जीवन देने की परिकल्पना केवल भगवान के साथ की जाती है. अत: माता-पिता की तुलना हमेशा भगवान से की जाती है, पर हाल के वर्षों में विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि इस परिकल्पना पर दुबारा सोचने की जरूरत पड़ने वाली है. मां को हमेशा सर्वाधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि मां ही त्याग की मूर्ति है जो अपनी जान पर खेलकर अपने भीतर आपकी सांसों की संरचना को पूरा होने तक पालती है. अगर उस त्याग की मूर्ति ने ऐसा न किया तो किसी भी नए जीवन की कल्पना संभव नहीं. पर बात हो रही थी विज्ञान की. विज्ञान, जिसके लिए अब लगभग हर चीज संभव है, अब वह सृष्टि के रचयिता भगवान की खोज में जुटा है. उसके लिए भगवान भी एक प्रकार का उच्च कोटि का वैज्ञानिक है. यहां तक कि उन्होंने धरती के भगवान मां-बाप का स्वरूप भी बदल दिया.

विज्ञान द्वारा भगवान बनने की चाह का ही यह नतीजा है आज का सरोगेट मदर का कॉंसेप्ट. सरोगेसी यानी वास्तविक मां की जगह एक दूसरी महिला बच्चे को जन्म देने के लिए अपनी कोख का इस्तेमाल करे. सरोगेसी को वह महिलाएं अपनाती हैं, जो बच्चे को जन्म देने में असमर्थ होती हैं. मतलब जो दपंत्ति संतान के सुख से विहीन थे उनके लिए सरोगेसी मदर की यह संकल्पना उनके जीन के साथ उन्हें बच्चा दिला सकता है. पर आखिर क्यों और किस तरह भारत में ममता बिकाऊ हो गई?

सरोगेसी का कॉंसेप्ट

सरोगेसी का शाब्दिक अर्थ होता है किसी और को अपने काम के लिए नियुक्‍त करना. इस प्रकिया में वास्तविक मां की जगह एक दूसरी महिला बच्चे को जन्म देने के लिए अपनी कोख देती है. सरोगेसी को वह महिलाएं अपनाती हैं, जो बच्चे को जन्म देने में असमर्थ होती हैं. शुक्राणु और अंडाणु को निषेचित करा कर भ्रूण को उस महिला की कोख में डाल दिया जाता है. इसमें एक प्रतिशत अंश भी सरोगेट मदर का नहीं होता है. इस प्रक्रिया से बच्चों के साथ उनका जेनेटिक संबंध बरकरार रहता है, जिसमें जन्में बच्चे का रंग, लंबाई, बालों का रंग और प्रकृति, आनुवांशिक गुण आदि सभी जेनेटिक मां-बाप के होते हैं.

सरोगेसी के प्रकार

ट्रेडिशनल सरोगेसी: इस प्रकिया  में दंपत्ति में से पिता के शुक्राणुओं को एक स्‍वस्‍थ महिला के अंडाणु के साथ प्राकृतिक रूप से निषेचित किया जाता है. शुक्राणुओं को सरोगेट मदर के नेचुरल ओव्यूलेशन के समय डाला जाता है. इसमें जेनेटिक संबंध सिर्फ पिता से होता है.

गेस्‍टेशनल सरोगेसी: इस पद्धति में माता-पिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्‍चेदानी में प्रत्‍यारोपित कर दिया जाता है. इसमें बच्‍चे का जेनेटिक संबंध मां और पिता दोनों से होता है. इस पद्धति में सरोगेट मदर को ओरल पिल्‍स खिलाकर अंडाणु विहीन चक्र में रखना पड़ता है जिससे बच्‍चा होने तक उसके अपने अंडाणु न बन सकें.

सरोगेसी आखिर आई कहां से? सरोगेसी मदर की संकल्पना हालांकि विज्ञान ने की है, वस्तुत: इसे आधार हमने दिया है. इसका कोई एक कारण नहीं है. हां, अपनी हर जरूरत को किसी भी कीमत पर पाने की हमारी चाहत इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण हो सकता है. इसके साथ इसकी दो मुख्य वजहें हैं:

बांझपन: भारतीय समाज में औरत को मां बनकर ही पूरा बनने का कॉसेप्ट प्रचलित है. मां का मतलब सिर्फ ममता नहीं होता, बल्कि अपनी कोख में कम से कम एक बच्चे को पालना भी होता है. पर जो महिलाएं शारीरिक कमियों से मां बनने में अक्षम होती हैं, उन्हें हमारा समाज बांझ कहकर उलाहना देता है. बांझपन का यह उलाहना कोई भी औरत सहना नहीं चाहती. हालांकि एक शादीशुदा जोड़े का माता-पिता बनने का सपना किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर भी पूरा होता है, पर हमारे देश में खून का रिश्ता सबसे बड़ा रिश्ता माना जाता. अत: पारंपरिक ढांचे में गोद लेकर मां-बाप बनना फिट नहीं बैठ पाता. वस्तुत: यही वजह होती है कि आज जब विज्ञान ने किराए की कोख पर खुद की जेनेटिक विशेषताओं के साथ मां-बाप बनने का विकल्प दिलाया है, तो ऐसे जोड़े इसे अपने लिए ज्यादा मुफीद समझते हैं. विश्व की तो बात ही नहीं सिर्फ भारत में ही हर वर्ष जितनी शादियां होती है उसमें से  10 %  महिलाएं बांझपन से ग्रस्त होती हैं.

हाइटेक बच्चों की चाहत: विदेशों में हालांकि बांझपन का यह कॉंसेप्ट हद तक लागू नहीं होता, पर उनके लिए भी यहां एक अति आकर्षण का कारण है अपनी चाहत के अनुकूल अपने बच्चे को बना सकना. आम बच्चे (यहां इसके प्राकृतिक बच्चे उपयोग करना बहुत सही होगा) जहां भगवान की देन माने जाते हैं, वह अपाहिज है, दिमाग से कमजोर है, शारीरिक रूप से कमजोर है, या आइंस्टीन-न्यूटन जैसा उसका दिमाग है, गोरा है या काला है, नाटा है या लम्बा है, यह सब भगवान की देन मानी जती है. इसपर माता पिता का कोई वश नहीं होता. पर इस वैज्ञानिक विधि से माता-पिता बनने में ये सारी चीजें वे अपनी चाहत अनुकूल निर्धारित कर सकते हैं. आज के हाइटेक और आधुनिक युग में लोग बच्चे भी हाइटेक ही ढूंढ़ते हैं. अत: विदेशों में सरोगेसी का चलन बढ़ रहा है.

किराए की कोख का सवाल

क्योंकि इसके लिए माता-पिता की चाह रखने वाले जोड़े के अतिरिक्त एक अन्य औरत भी चाहिए जो उधार स्वरूप इस कृत्रिम बच्चे को 9 महीने तक अपनी कोख में पाल सके, अत: इसके लिए डॉक्टर की सलाह से अखबारों, इंटरनेट पर विज्ञापन दिए जाते हैं. महिला की पूरी मेडिकल जांच की जाती है कि कहीं उसे कोई रोग तो नहीं. सरोगेट मां की उम्र अमूमन 18 साल से 35 साल के बीच होती है. रहा सवाल किसी इसके लिए किसी महिला के तैयार होने का, तो गरीबी और पसे की चाह इसके केंद्र में होता है. गरीब महिलाओं की  पैसों की चाहत उन्हें इस काम के लिए राजी करवा देती है. जब पुरुष गरीबी की वजह से अपना खून और किडनी  बेचने को तैयार हो जाता है ताकि उनके घर में चूल्हा जल सके तो ठीक वैसे ही महिलाएं भी गरीबी के कारण अपनी कोख में दूसरे के बच्चे को पाल लेती हैं.

एक कोख की कीमत

सरोगेट मां का सारा खर्च वही लोग उठाते हैं जिन्हें बच्चा चाहिए. किराए पर कोख लेने का खर्च भारत में जहां तीन-चार लाख तक होता है वहीं दूसरे देशों में कम से कम 35-40 लाख रुपए तक खर्च आता है. खर्च ज्यादा होने के कारण अब विदेश से भी लोग भारत की तरफ रुख करने लगे हैं और देखते ही देखते यह कारोबार पूरे हिंदुस्तान में फैल चुका है खासकर दक्षिण भारत में.

भारत में इसका फैलाव

सेरोगेसी भारत के कुछ खास स्थानों में सबसे ज्यादा फैली है जैसे उड़ीसा, भोपाल, केरल, तमिलनाडु, मुंबई आदि. एक चीज जो ध्यान देने योग्य है वह है सेरोगेसी ऐसे राज्यों में ज्यादा देखने को मिली जहां पर्यटक ज्यादा आते हैं यानी भारत विदेशियों के लिए एक ऐसी जगह बन चुका है जहां सेरोगेट मदर्स आसानी से मिल जाती हैं. और अब तो सरोगेसी ने पर्यटन का रूप ले लिया है. इच्छुक पैरेंट्स को टूर ऑपरेटर पूरा पैकेज ऑफर करते हैं. भारत के नर्सिंग होम्स से उनका संपर्क रहता है.

भारत में सरोगेसी इसलिए भी आसान है क्योंकि हमारे यहां अधिक कानून नहीं हैं और जो हैं उनकी नजर में यह मान्यता प्राप्त है. हालांकि इसके कुछ नियम हैं, जैसे सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे पर जेनेटिक माता-पिता का हक होगा; गोद लेने वाले मामलों की तरह इसमें किसी घोषणा की जरूरत नहीं होती; बच्चे के जन्म-प्रमाण पत्र में केवल जेनेटिक माता-पिता का ही नाम होना चाहिए; सरोगेसी कांट्रेक्ट में सरोगेट मां के जीवन बीमा का उल्लेख निश्चित रूप से किया जाना चाहिए, यदि सरोगेट बच्चे की डिलीवरी से पहले जेनेटिक माता-पिता की मृत्यु हो जाती है, उनके बीच तलाक हो जाता है या उनमें से कोई भी बच्चे को लेने से मना कर दे, तो बच्चे के लिए आर्थिक सहयोग की व्यवस्था की जाए आदि.

बहस का मुद्दा

आज सरोगेसी एक विवादास्‍पद मुद्दा बनता जा रहा है. ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें सरोगेट मदर ने बच्‍चा पैदा होने के बाद भावनाओं के आवेश में आकर बच्‍चे को उसके कानूनी मां-पिता को देने से इंकार कर दिया. ऐसे मामले तो सबसे ज्यादा गंभीर हैं जबकि बच्‍चा विकलांग पैदा हो जाए या फिर करार एक बच्‍चे का हो और जुड़वा बच्‍चे हो जाएं तो जेनेटिक माता-पिता बच्‍चे को अपनाने से इंकार करने लगते हैं.

सरोगेट मां के अधिकारों का सवाल

अब सवाल यह उठता है कि क्या नौ महीने तक पेट में रखने और जन्म देने  वाली सरोगेट मदर का बच्‍चे के प्रति भावनात्‍मक प्रेम क्‍या कानूनी कागजों में दस्‍तखत कराने के बाद खत्‍म किया जा सकता है? और क्या जन्म से पहले उसे पता होता है कि बच्चा विकंलाग होगा या जुड़वा?

सरोगेट मां तो सिर्फ अपने कोख में दूसरे के भ्रूण को पालती है यह कुछ ऐसा होता है जैसे आपने सब्जी दूसरे के घर से ली और पकाया अपने ऑवन में. अब सब्जी कैसी होगी आप कैसे जान सकते हैं. अगर बच्चा विकलांग है या जुड़वा है तो इसमें दोष तो जेनेटिक मां-बाप का हुआ. सेरोगेट मां तो पैसों के लालच में आकर अपनी कोख उधार देती है अब चाहे उसमें से कुछ भी जन्में. एक गरीब मां अपनी गरीबी में आकर नौ महीने तक अपनी, समाज और परिवार के नजरों के तीखे तीरे झेल कर एक बच्चे को जन्म देती है और अगर बच्चे में कुछ दोष होने पर लेने वाला मना कर दे तो ऐसे में उस गरीब मां पर क्या बीतेगी. आखिर कैसे कोई अपनी ही औलाद को लेने से मना कर सकता है.

किराए की कोख से शाहरुख बनेंगे पिता

आज जहां सब बिकता है हमने मां और ममता को भी बेच दिया. भगवान की भी जरुरत नहीं. ममता जिस शब्द पर भगवान भी नतमस्तक हो जाते है आज बिकने लगी. आज भारत जैसे गरीब और विकासशील देश में यह प्रकिया एक धंधे की भांति हो गयी है. संपूर्ण दुनिया में प्रतिवर्ष 500 बच्चे सरोगेसी के जरिए पैदा होते हैं और उनमें से 200 बच्चों का जन्म भारत में होता है. इसकी कुछ विशेष वजहें भी हैं जैसे कानूनी मान्यता, कम खर्च आदि. यह विषय आज के समाज का सबसे बडा सवाल है क्योंकि हमारा आने वाला कल इससे प्रभावित होने वाला है जहां जीवन में सफलता और कैरियर की भाग-दौड  में महिलाएं बच्चा पैदा करने से बचेंगी, तब ऐसे मामले भी बढ़ सकते हैं. अगर समय रहते इस विषय पर कानून नहीं बना तो भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है.





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