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समाज की विभिन्न जरुरतों व समस्यायों को उभारता और समाधान तलाशता ब्लॉग

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स्त्री-विमर्श का सच

Posted On: 14 Jan, 2012  
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मातृत्व से वंचित रख सकता है लिव-इन रिलेशनशिप!!

Posted On: 13 Jan, 2012  
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क्या गीता चरमपंथी साहित्य है?

Posted On: 3 Jan, 2012  
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राजनीति के कारण जातिवाद का वजूद है

Posted On: 31 Dec, 2011  
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क्या दंड के बिना सुधार संभव है?

Posted On: 29 Dec, 2011  
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सोशल इश्यू में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

महिला पर बात करने से पहले हमें यह नही भूलना चाहिए कि पुरुष को किस तरह की संस्कृति से पोषित किया जाता है .....पुरुष का जन्म खुद महिला के लिए गौरव का प्रतीक होता है और इस गौरव को पुरुष के लालन पालन में भी देखा जा सकता है ..पियाजे के नैतिकता के सिद्धांत के अनुसार बच्चा ५ वर्ष की उम्र तक जो भी देखता या सुनता है .वो प्रभाव उसके जीवन पर्यंत बना रहता है ...अब जब एक पुरुष ने जन्म से ही माँ को अपने लिए तुलनात्मक पाया है ........और उसे बहन से ज्यादा अवसर और प्राथमिकता दी गई है तो वो कैसे समझ पाए कि माँ बहन जैसे रिश्तो में सर्वोच्चता पाने वाले को अपने महिला बॉस को अपने से बड़ा समझना चाहिए .और यही कारण है कि पुरुष महिला को स्वीकार नही कर पते ..पर यह सिर्फ एक और सबसे महत्व पूर्ण कारक हो सकता है ...इसके अलावा यह कहावत आम है कि औरतो कि अक्ल घुटनों में होती है ...और उसके हर कार्य में यह मुहावरा जरुर धयान में रखा जाता है .................इस के अलावा औरत को सिर्फ घर में रखने की परंपरा ने भी पुरुषो में यह पूर्वाग्रह भर दिया कि औरत घर के बाहर का काम कर ही नही सकती ..........इन सब से इतर आनुवंसिक कारणों को भी उपेक्षित नही किया जाना चाहिए .......पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्राणियो में नर को ज्यादा शक्ति प्राप्त है और वह शक्ति के द्वारा मादा पर कब्ज़ा करता है ...संस्कृति बन जाने के बाद नर द्वारा शक्ति का माध्यम बदल गया और पुरुष अपनी योग्यता से मादा को दबाना चाहता है और इसी लिए यह युद्ध बराबर चलता रहता है कि श्रेष्ठ कौन है ......शायद यही वह कारण है जिसके कारण पुरुष एक महिला को अपना बॉस नही मान पता ..............एक बहुत ही हास्यास्पद बात भी प्रचलित है कि प्रजनन के लिए महिला को पुरुष नीचे रहती है इस लिए हर जगह महिला को पुरुष के नीचे ही रहना चाहिए .यही नही समाज में औरत के नीचे काम करने वाले को कम आँका जाता है .उसे मेहरा जैसे शब्द सुन ने पड़ते है .इन सब कारणों से भी पुरुष महिला को बॉस नही मान पता ...अखिल भारतीय अधिकार संगठन इस तथ्य को जानता है पन्नो पर महिला और यथार्थ में महिला दोनों पूरब पश्चिम की तरह है और अखिल भारतीय अधिकार संगठन इस गलत धर्नाओ को बदलने के लिए कटि बद्ध है ....डॉ आलोक चान्टिया

के द्वारा: alok chantia

[ठीक नहीं है मायके का दखल] परिवर्तन महिला सेवा संस्थान के निदेशक शिवबीर सिंह कहते हैं, ''वर्ष 2008 में हमारे पास तलाक की घटनाओं के 152 मामले आये थे, जिनमें अधिकतर मामले ऐसे थे, जो छोटी-छोटी गलत फहमियों से शुरू हुये और नतीजा तलाक तक पहुंचा। इन सब के पीछे मूल कारण जो प्रकाश में आया वह था लड़की के मायके का इनके शुरुआती मतभेदों में अत्यधिक दखल। लड़की वालों की परेशानी यह है कि वे बात-बात पर दखल करने लगते हैं और हर घरेलू परेशानी को लड़की की प्रताड़ना से जोड़ते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे में लड़के का पक्ष इसे सम्मान से जोड़ने लगता है। यही शुरुआती विवाद का कारण बनता है। बेहतर हो कि लड़की वाले किसी भी प्रारंभिक शिकायत को यह सोचकर नजरअंदाज करें कि यह उसकी व्यक्तिगत समस्या है। पति-पत्नी की थोड़ी सी नाराजगी को मायके वाले दहेज और बड़े विवाद के रूप में देखते हैं, जो तलाक का कारण बनता है।

के द्वारा: Jaii

मैंने अपने ३८ साल की सीनियर नौकरी मैं अनेकों पुरुषों व महिलाओं के साथ काम किया है . आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व जब चौधरी चरण सिंह , जो उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्या मंत्री थे, महिला आईएस अफसर न देने की मांग की थी तो उन्हें यह भान भी न था की किसी दिन उस उत्तर प्रदेश की मुख्या मंत्री दो बार महिला होगी. इस लिए बात काबलियत की नहीं है .परन्तु उप्लाभ्दियों की है . पुरुषों व महिलाओं का अंतर पचास साल मैं डोक्टोरी मैं देखा जा सकता है या दरजी या डांस या किसी अन्य ऐसे पेशे मैं ले लें जिस मैं बहूत महिलाएं होती हों .  महिलाओं की विशिष्ट उपलब्धि नगण्य होती है . वो काम चला तो लेती हैं पर किसी पेशे मैं उच्च उपलब्धि नहीं पा पाती हैं .  मेरे से आज कोई पूछे की किसी नए काम के लिए क्या मैं सीनियर महिला कर्मी चाहूँगा मेरा तुरंत उत्तर होगा नहीं .  यह किसी पूर्वाग्रह से पीड़ित हो कर नहीं होगा. किन्तु जब प्रतिस्पर्धा कठिन हो तो जीतने वाले घोड़े पर ही बैठा जाता है . अधिकाँश महिलाओं की जीतने की शक्ति कम होती है. कुछ झाँसी की रानियाँ इसका अपवाद अवश्य होती हैं .किन्तु वे नारी रूप मैं पुरुष होती हैं . राजीव  उपाध्याय

के द्वारा: rajivupadhyay

के द्वारा: kahu

ऐसा क्यों होता है की हर जगह हिन्दू धर्मो को ही निशाना बनाया जाता है इसका मुख्या कारन ये है की हिन्दू अपने धर्मं के प्रति ही jagruk नहीं है , वह केवल अपने में ही मस्त रहता है, वास्तव में हिन्दुओ में अपने धर्म के प्रति एक गैर जिमेदाराना नजरिया है , के जो हो रहा है होनेदो उसका क्या बिगड़ता है , इस गैर्जिमेदाराना हरकतों के कारन ही हिन्दुओं के धर्म का अपमान हर जगह होता है , चाहे वह मकबूल फ़िदा हुसैन की बनाई हुई नग्न देविओं की पेंटिंग्स हो या दुनिया के देशो में हिन्दू देवो-देविओ के नाम और फोटोस का अंडर गारमेंट्स और फूत्वेअर पर इस्तेमाल होना है. वास्तव में जब तक एक आम हिन्दू अपने धर्मं को गंभीरता से नहीं लेगा तब तक हिन्दू धर्मं ग्रंथो का इस्सी तरह अपमान होता रहेगा.

के द्वारा: ek aam aadmi

के द्वारा: hemendra

ये सच है कि भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी महिलाएं शोषण का शिकार होती रही है और होती रहेंगी लेकिन शिक्षा से उसकी विचारधारा और खुद के प्रति अधिकारों से अवगत होना जरूरी है. वह अवगत हो रही है और अपने खिलाफ हो रहे व्यवहार का वह विरोध भी कर रही है. घर टूट रहे हें , विवाह और परिवार संस्था के अस्तित्व पर संकट गहराने लगा है और इसके लिए जब वर्णन किया जाता है तो औरत ही दोषी दिखलाई देती है लेकिन नहीं उसके द्वारा ली गयी शिक्षा उसे परिपक्व और सहनशील भी बना रही है. शिक्षा सिर्फ एक औरत की नहीं बल्कि शिक्षा हमारी सोच को भी मिलनी चाहिए जो परिवार के हर सदस्य के लिए होगी कि महिला भी इंसान है और उसके अधिकारों और दायित्वों में जब संतुलन होगा तभी सबकी शिक्षा सार्थक होगी.

के द्वारा: Rekha Srivastava

बिल्कुल तथ्यपरक लेख है लेकिन क्या ऐसा होना कभी समाप्त हो पाएगा,शायद नहीं क्योंंकि शायद कई समास्यायों का समाधान एक साथ चाहा जा रहा है ।औरत ईश्वर की एक बेहतर संरचना है,इस कारण उसकी तरफ़ आकर्षित होना स्वाभाविक है ।इसी प्रकार नियोजन में किसी से पीछे न रहना या फिर दूसरे से आगे बढ़ना और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार होना भी स्वाभाविक है ।इसे केवल दोनो स्तरों पर सुधार करने से ही सुधारा जा सकता है ।शैक्षिक स्तर में सुधार होने से आधा सुधार हो जाएगा लेकिन पीछे न रहने या फिर आगे बढ़ ने की ईच्छा को कभी रोका नहीं जा सकेगा और ऐसी स्थिति में और विशेष रूप से इस उद्देश्य से दी जाने वाली स्वीकार्यता की स्थिति में आधा शोषण तो होता ही रहेगा ।क्या ऐसे आधे शोषण के सम्बन्ध में विचार किया जाना या फिर चिन्ता किया जाना अवशेष नहीं रह जाएगा,फिर क्या तब भी पुरूष समाज दोषी कहा जाएगा ।मेरे विचार से यह संक्रमण काल चल रहा है,थोडंे दिन में सब ठीक हो जाएगा । विश्लेषक

के द्वारा: vishleshak

बहुत ही अच्छा प्रस्तुत किया गया है।केवल सुख संशाधन की उपलब्धता से औरतों के साथ हो रहा अन्याय नहीं रूकेगा ।जब तक समाज के सारे लोग समान ढ़ग से सुशिक्षित नहीं हो जाएंगे साथ ही साथ उन सभी में समान जीवन। मूल्य भी नहीं होंगे तब तक शायद ही न केवल औरतों के साथ बल्कि ग़रीबों और मज़दूरों के साथ अन्याय रूक नहीं सकता ।अतः आवश्यकता है सभी लोगों को एक साथ समान रूप से सही मकानों में शिक्षित करने की ।यह तभी और केवल तभी हो सकता हैै जब न केवल सरकार गम्भीरता से सभी को शिक्षित करने को संकल्पित हो,जो शायद है नहीं,औरत जब समाज के भी सभी लोग अच्छा बनना चाहें ।सच्चाई तो यह है कि हम सभी लोग अलग अलग समय और मौकों पर अलग अलग व्यवहार करते हैं और दूसरे से हर समय अच्छा करते रहने की उम्मीद करते हैं । विश्लेषक

के द्वारा: vishleshak

यह परिस्थितियां केवल भारत जैसे भावना और संबंध प्रधान देश में ही देखी जा सकती हैं. पाश्चात्य देश जो भोग-विलास और भौतिकवाद से पूरी तरह ग्रस्त हो चुके हैं, वहां जीवन भर और हर परिस्थिति में अपने जीवन साथी से प्रतिबद्धिता और समर्पित प्रेम संबंध निभाने जैसी चीज कोई मायने नहीं रखती. पाश्चात्य देशो में संस्कृति नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह गयी है वहा रहना ऐसा मानों जैसे कि मरने के बाद नरक मिलना, ऐसे वहा जीने पर यह हाल है ! वह तो ये भी नहीं देखते कि कौन माँ है और कौन बहिन है उनके लिए तो बस सब भोग बिलास है, में तो बस भगवान् से बस ये ही प्रार्थना करूँगा कि हे प्रभु पाश्चात्य देशो कि संस्कृति मेरे देश को प्रभवित न करे ....यह देश हमेशा अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है और हमेसा ही जाना जायेगा..

के द्वारा: Pawan Kumar (YIS)

इसमे बुरे क्या है. भारतीय समाज हमेशा बदलता रहा है. पहले खुलापण था. कामसूत्र और कह्जुराहो भारत की ही दें है. मुग़ल काल मैं पर्दा प्रथा आया. पहले नगरवधू भी हुआ करती थी. मुजे नहीं लगता की बिग्ग बॉस कार्यक्रम मैं कुछ गलत है. यह दस बजे बाद आता है. आपको देखना है थो देखो नहीं थो सो जाओ. रही ब्लू फिल्म की बात थो व्हो भी भारत मैं आसानी से उपलब्ध है और आप सब ने देखा होगा. झूट मूठ का सम्माज और संस्कृति के नाम पे बखेड़ा खड़ा करने की जरूरत नहीं है. कोई प्रोग्राम और कोई किरदार किसी का आदर्श नहीं बना सकता. हर दसक मैं संस्कृती बदलती है. हर काल मैं युवा वर्घ को दोष दिया जाता है. आज जो बुजुर्ग हैं वो युवा थे और उनके समय मैं भी युवा और संस्कृति के नाम के आरोप लगते थे. पहले ३० वर्ष पूर्व हेलेन के डांस को गन्दा कहा जाता था और आज वो क्लास्सिक legend .

के द्वारा: rudra

के द्वारा: Doctor Jyot

वर्तमान समय में अधिकतर पुरुषो की यही धारणा होती है की उनकी होने वाली भावी पत्नी पूर्ण रूप से उन्ही के लिए समर्पित हो या उसके पहले कोई अफयेर न रहे हो, तलाकशुदा और विधवा होने की स्तिथि में पहले किसी अन्य पुरुष के साथ सम्बन्ध होने के कारण कही न कही असुरक्षा की भावना के कारण पुरुष उन्हें स्वीकार करने में असमंजस की स्थिति में रहते है. महिलाओ और पुरुषो के रहन सहन और चरित्र को लेकर भी पुरुष की डबल थिंकिंग के कारण वह महिलाओ की स्वतंत्रता को लेकर तरह तरह के प्रश्न उठाता रहता है. इस समस्या के निदान हेतु पुरुषो को पुरानी धारणाओ को तोड़कर एक नयी सोच का विकास करना होगा. तब कही जाकर पुरुष और महिलाओ के मध्य टकराव की स्थिति को रोका जा सकता है. http://singh.jagranjunction.com

के द्वारा: Amar Singh

कुदरत ने हर प्राणी मे नारी जाती को नर के मुकबले शारिरीक रूप से कमजोर बनाया है । ईस मे कुदरत का एक ही स्वार्थ था, प्राणी की जनरेशन आगे बढती रहे । ईसके लिये नारी नरके काबू मे जल्दी आ जाए । आदमी को भी कुदरत ने प्राणी ही बनाया है । सब नियम वही है । प्रारम्भ मे पाशाण युग मे आदमी कुदरत के यही नियम से जीता था । समय जाते आदमी अपनी बुध्धीबल पर सुधरता गया । अपने जीनेके नियम सेट करता गया जो आज हमारे समने रीती रीवाज या धर्म के रूप मे है । अपने आप को दुसरे प्राणी से अलग कर लिया । रीती रीवाज का विरोध याने फिरसे पाशाण युग का जीवन जेनेकी तैयारी । पढ लेने से या पैसे कमानेसे नारी बलवान नही बन जाती । अभीमानी बनती है । कन्धे कन्धा मिलाने की बात करने वली नारी एक बलात्कारी का समना नही कर सकती । सच और आदर्शवाद तो ये केहता है के कोइ व्यक्ती दसरी व्यक्ती के आधीन क्यो ? शादी का बन्धन क्यो ? कोइ भी बन्धन व्य्क्ती के स्वातन्त्र पर नियन्त्रण है । मुल सच और जीवन का सच अलग होता है । जीवन का सच ये ह की आदमी को शादी करनी पडती है और अपनी आजादी छोडनी पडती है । नाम मे क्या रख्खा है । नाम बदल जाये तो किसी की भावना को ठेस पहुन्चती हो वो आज जाना । शादी तन, मन और धन के साथ होती है । तन दे दिया , रीवाज हो तो धन भी दे दिया लेकिन मन नही दिया तो ऐसी शादी कबतक चलेगी । आत्मसम्मान की बातो मे अभिमान झलकता है । जब की शादी मे पूरे समर्पन की भावना होती है । लडकी का बाप खूद कहता है उसे अपने बाप का घर ,मा-बाप सब कुछ भुलना है ताकी वो अपने ससुराल मे बराबर सेट हो जाए । नाम तो एक छोटी सी चीज है ।

के द्वारा: bharodiya

डियर आपका लेख वाकई बहुत अच्छा है लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे की महिलाओं को जब भी स्वतंत्र छोड़ा गया है उनका सिर्फ शोषण ही हुआ है. वैदिक काल में सती अनुसुइया,गार्गी आदि तमाम विदुषी स्त्रियाँ हुई थी जो बड़े बड़े ऋषियों के साथ राज दरबार में बैठ कर शास्त्रार्थ किया करती थीं.लेकिन कालांतर में कही न कही उनका यौन शोषण ही हुआ है . जिसका खामियाजा उन्होंने भुगता है.कई तरह के एमएमएस स्कैंडल्स बात के गवाह हैं. शायद इसी सब को ध्यान में रख कर मध्य काल में जब इस्लाम का उदय हुआ तो महिलाओं को परदे के पीछे रखा गया ताकि उनपर किसी की बुरी नज़र ना पड़ने पाए. ये अलग बात है की इस्लाम के कुछ सिद्धांतो का लोगों ने अपने स्वार्थों के लिए भी इस्तेमाल किया है. कहा जाता है की इतिहास स्वयं को दोहराता है शायद उसी की वजह से पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करते हुए महिलाओं को पुनः सशक्त किया जा रहा और जिसके कुछ गंभीर परिणाम अक्सर सामने आते ही रहते हैं जिनमें यौन शोषण प्रमुख है यदि ऐसा न होता तो सरकार को The Protection of Women Against Sexual Harassment at Work Place Bill, 2010 पास करने की कोई ज़रुरत न पड़ती. रही बात बाल विवाह की तो पहले लड़कियां और लड़के जवान होते ही अपने जीवनसाथी के साथ हो जाते थे जिससे लड़के और लडकियों दोनों के चरित्रहीन होने की संभावना कम से कम होती थी. सरकार ने बाल विवाह पर रोक तो लगा दिया है लेकिन वो रोक कितनी कारगर साबित हो रही क्या ये किसी ने सोचा है. लड़कियां कालेज पढने जाती है वहां के शिक्षकों के साथ यौन सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ अच्छे नम्बरों के लिए, कार्य स्थल पर प्रमोशन पाने के लिए स्थापित कर लेती हैं . क्या ये बाल विवाह पर रोक का परिणाम नहीं कहा जा सकता इससे तो कही अच्छा होता की उस लड़की की शादी करा दी जाती कम से कम उसके पति पति को एक कुंवारी लड़की तो मिलती.खैर,यही हाल लडको का भी है उनका भी एक से पेट थोड़े न भरता है एक एक लड़के के पास कई कई गर्ल फ्रेंड होती है. बाल विवाह के होने से कम से कम ये सब तो न होता.अभी कुछ दिन पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा था आज के शिक्षित युवाओं को पत्नी के रूप में कुंवारी लड़की की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. अगर ऐसा ही है तो क्यों न हर युवा एक वेश्या से विवाह कर ले कम से कम उसके दिल में ये उलझन तो नहीं रहेगी की कही उसकी वो पत्नी जिसे वो इतना प्यार करता है चरित्रहीन ना हो. रही बात इतिहास दोहराने की तो जब मनुष्य आदि मानव का जीवन बिता रहा था तब वो वस्त्र विहीन था,आज के समाज में लड़कियां कैपरी जींस बिकनी पहन रही हैं हो सकता है की निकट भविष्य में ये फिर से आदि मानव की तरह नंगे ही रहने लगे. सवाल सरनेम बदलने का है तो ये बात भी स्वीकारने योग्य है की कई घरों में महिलाओं का उत्पीडन किया जाता है, उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है साड़ी सुविधाएं ऐसी महिलायों को दिया जाना चाहिये ना की अपने शौक पूरे करने वाली महिलाओं को क्योंकि आज के शहरी समाज में कई ऐसी महिलाएं है जो पति के आफिस जाते ही अपने किसी आशिक को घर में बुला के मौज मस्ती करती हैं चाहे उनके बच्चे कितने ही बड़े क्यों ना हों.इस श्रेणी की महिलाओं में कुछ डाक्टरों की पत्नियाँ,कुछ नेता प्रकार की महिलाएं आदि शामिल हैं. क्या वो कभी ये बात सोच पाती है की उनके बारे में सब कुछ जानता हुआ पति उन्हें कभी कुछ क्यों नहीं कहता क्योंकि वो जानता है किसी से अपनी पत्नी की बात कहने पर उसका मजाक ही बनेगा और कुछ हासिल नहीं होगा. फिर वक़्त के साथ वो पति शराब में डूबने लग जाता है तो वही पत्नियाँ उनपे शराबी होने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकती.

के द्वारा: AJAY KUMAR

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के द्वारा: jffhvjwj

के द्वारा: सुमित प्रताप सिंह

एक बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि परिवर्तन एकांगी ना होकर बहुस्तरीय हों और व्यवस्थागत खामियां दूर करने के साथ व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर व्याप्त बुराइयों पर भी लगाम लगाने की कवायद हो. नैतिक शिक्षा को दृढ़ता से लागू किया जाए ताकि बचपन से ही बुराइयों लड़ने की प्रेरणा मिल सके. विषय व्यापक है इसलिए उपचार भी व्यापक होना चाहिए जिससे इंसानी मन को ही बुरी प्रवृत्तियों में संलग्न होने से बचाया जा सके. आपके अंतिम पाराग्राफ में ही उत्तर है, अगर द्रीढ़ इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी संभव है. पर यह विरोधभास क्यों? संसाधन कम हैं, महत्वाकांक्षाएं असीमित तो स्वाभाविक है कि सबकी सारी ख्वाहिशें पूरी नहीं हो सकतीं. भारतीय विचारधारा संतोष और धैर्य को प्रश्रय देती है लेकिन आज की पीढ़ी सब कुछ एक झटके में पा लेना चाहती है. परिणामस्वरूप अनैतिक रास्तों को अपनाना वक्ती जरूरत बन गया है. अनैतिक रास्तों से ख्वाहिशें पूरी करना वक्ता की जरूरत नहीं हो सकती. यह मृग मरीचिका जरूर बन सकती है. संतोषम परम सुखम हमारे आदर्श होने चाहिए.

के द्वारा: J L SINGH

के द्वारा: subhash

के द्वारा: omprakash pareek

के द्वारा: Doctor Jyot

के द्वारा: subhash

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ। जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है! मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है। भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है! अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है। थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा। http://umraquaidi.blogspot.com/ उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक “उम्र कैदी”

के द्वारा: उम्र कैदी

के द्वारा: Mohammad Yusuf

बहुत सही विषय पर विस्तारपूर्वक चर्चा … बधाई । विज्ञापनों में दोअर्थी सम्वाद या दृश्य जबतक साधारण माँडलों द्वारा दिखाया जाता था, तब तक तो फ़िर भी लगता था कि पेशेवर हैं, इन्हें करना ही पड़ता है । लेकिन जब कैटरीना जैसी हिट स्टार्स ऐसे दृश्य देना मंज़ूर कर लेती हैं, तो समाज पर सचमुच असर पड़ता है । एक मैंगो ड्रिंक के विज्ञापन में गाढ़े रस की बूंद जिस तरह कैटरीना के होठों के ठीक बीच में टपकती है, और नेपथ्य से जैसे कामुक गीत की आवाज़ आती है, वह युवाओं के लिये अत्यन्त भटकाव पैदा करने वाली है । फ़िर भी यही कहा जा सकता है कि जब फ़िल्में ही ऐसे दृश्यों से भरी हुई हैं, तो ये तो मात्र एक विज्ञापन है ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

पहले जी के घर मी पड़ी लिखी बहु आती थी उसका सम्मान होता था पैर उसको ससुराल मी आकर घर घरास्थी का काम देखना पड़ता द्क्य्नुशी सास सुसर बहु की padai लिखी को नान्दाज़ kardey ठे और कहते को उसको उलहना देदिय kya हमने ज़म्नाही देखा पैर आज जब बहु आती सास सुसर उसको अपनी बेटी का दर्जा दिया उनको maano सब कुछ मिलगया बहु का आदर करने वालो जीवन भर का सुख मिल जाता है महंगाई के इस समय मी बहु को बेटी समझा जो गया वोही बहु अपने पति का कदम कदम मिला कर हात बट्टा रही सास सुसर को माँ-बाप का जो दर्जा दिया इंडो बातो को मिल कर घर स्वर्ग बन्न गया और घर ही मंदिर बाण गया यह आज padey लिखे vichronki deyn है- जब से पडे ल्किही बहु मिली है उसने नौकरी के साथ घ्रास्थी काम संभल लिया घर मी कलह का नाम नहीं अब उनके सास ससुअर के मनन मी बहु के परती कोई गलत बात बोले उसको नकार देते हैं यह पडे ल्किहेय घ्रस्थ चानले आचे विचोर्ण के सास सुसर हैं जो समाज मी एशिया कर के अपना अपने बहु बेटे का सुखी संसार बनना कर आचे गुरु बन्न गए एशिया नहीं है बहु यह सोचे की मी पड़ी लिखी हूँ अब मेरे सम्मन होगा नहीं उसकी पड़ी लिखी baaton के कारन उसके ससुअल मी कोई भी दिकत/कानूनी अड़चन किसी बात पैर तब उसकी समझदारी से सब सम्सयें हल हो सकती हैं इस लिए आज के ज़माने मी कुछ ही परिवारों को अलग कर दिया जाए जो दहेज़ के लोभी हैं पदिलिखी बहु को बेटी का दर्ज़ा दिया यह एक सुखद परम्परा है. परन्तु कुछ जयादा उच्च सिक्षा पेयी हुयी लड़कियां अपने स्वर्ग जैसे घर को नरक भी बनना देती यह उनके आस-पड़ोस की लगयुई आग है इस्सलिये उनको सोच समझ कर कदम उठाना चहिये मनन के अन्दर अगर कोई कुंठा है तब उससे दूर्कार्लेयेंसमाज मी बदला हुआ ही परवर्तन आज एक अच विचार ही अपने घर हो स्वर्ग बनना सकता है कल की बात है बहु जिसका विवाह हुए करीं दोसाल भी नहीं हुए घर मी पति की अचानक देअथ से उसका घर दुखोंओ मी आया और उस पड़ी लिखी नारी ने अपने पति आखरी सलामी देकर अपनी नौकरी का kartvye पुराकिया और फिर एक पत्नी बन्न के अपने सास सुसर के साथ अपने उपर पडे कष्ट ओ संभला पूरे समाज meay एक misaal कायम कर्दियेह आज की भृत्य नारी असी नारी/बहु/बेटी बन्न कर देश और समज का नाम ऊँचा करती जो नारी हो आदर्श पासे करे उनकी बात ही आलग है हम सब को चहिये बहु का सम्मान करें तब ही वोह भी हमारे साथ समय कत्पएगी गलत रास्ते पैर जाती बहु को सम्ह्जा जाये बेटी की तरह उसको मार्गदर्शन दिया जाये यही आज समाज का बोल-बाला हईस्सेय आज का समाज एक उच्च आदर्श पैदा करता है वकुत के साथ पलटना होगा समाज मी फलिगालत कुरार्तियों को दूर करना होगा एक लम्भी बहस अक्रनी होगी बहु और बेटियों का अंतर भी समाजह meay dikhna होगा इस बहस को सब के साथ बेत्थ करन ही ज़रूरी hai

के द्वारा: bkkhandelwal

issbarey meie zayada kya kahoon kyunki lekhak ne itna kah diya hai ki unke shaan meie zayada khana sahi nahi yeh puri duniya ki mahilon ki kahani iss say mahilaion ki kis parkar bachna ek bahut hi badi baat hai unke jeevan ka marik karya hai asia karney wale yeh nahi sochtey jo kaam woh kar rahe dusre sthan unki maa/bahan or wife ke saath dura koi bhi kar sakta hai aur jab baat khuleygi tabhi unko ahish hoga, kanoon ko bhi skhat hona padega, issko lageney ka main udeshy to surkasha hai per ab issko sex ke liye isteymaal karna ek bahut hi ghighona karya hai per hotelon ke baath room ke main gate aur room ke gate ke pass hi lagya jaye aur baki hissey meie sound proof mike laga kar unki baaton ki security bator upyog karajaye aur yeh to ladie hi vastav meie honey pahaley jaha woh susaan room meie ain charon taraf nighein karkake apni jaanmaal ki saftey karskati hain agar koi shaque hai tab turant police ko bulayien aur unko badnam karney ale ko kanoon ke hawlaey karvayen darey nahi agar darr gayi tab asia karney wale unki sharaft ka phayda utha kar unko badnam karsaktey aur ek baar badnami ka daag lagyaphir kitna chikho koi apko sahi nahi maaneyga issliye apne jeevan per koi daag na lagey himmat se soch samjh kar dushman se muqbla karey jeet sachai ki hogi hogiेab samay khul kar muqabale ka modern yug ko warning dena hi zaroori hai tab hi sex ke bhookey bhaidyon ko saza dilwa sakti hain govt.ko bhi asia karney walo ko sakhat saza ka kanoon asia banna chaiye ki 2/3months meie saza miley tab hi doshi galat kaam karney se rook payeyngey vanra hidden kamera chalta rahega aur mahilon ki asmat se yeh kheltey rheyngey aur inka runka na zaroori hai hoshiri se iko pakdo kyunki yeh log zurm karney se pahale bachney ka rasta banna leyety hain usko govt.ko rokna zaroori haoga tabhi mahilo ki izaat bach sakti hai

के द्वारा: bkkhandelwal

भारत एक ऐसा देश है जहा पैसा कमाने के लिए कोई कुछ भी कर सकता है और प्रेम में किसी को अपने जाल मॆ6 फंसा कर तो आप पैसा और मजा दोनों लूट सकते है,, यही गंदा काम कुछ असामाजिक तत्व करते है और प्यार को बदनाम करते है. नकली एमएमएस और फोटो बना कर जब भी बलैकमेलिंग की जाती है तो लडकियां पहले तो कुछ बोलती नही और अगर मामला सामने आता हओ तो समाज की गंदी और प्र्श्न पुछती निगाहें उन्हें जीने नही देती. महिलाओ6 और लडकियों को समझना होगा कि इज्जत के खातिर चुप रहना समझदारी नही बल्कि दब्बुपना है और नारी अगर प्रेम की देवी है तो भारत में काली का रुप भी नारी ही है. आखिर चाहे हमारा सिस्टम कितना ही भ्रष्ट हो लेकिन वह भी एक जगह आकर अपनी औकात में आ ही जाता है. सिस्टम को ब्दलने के कई तरीके है मीडिया उनमें से एक है.

के द्वारा: Manoj

khel,khiladi aur sex, yeh kaisa sanyog ki sex ko kewal khelo se joda jata sex ki baatein har jagah surru ho jati issmey yeh kahana bhi syad galat na hoga kuch participairn apne ko sab se aagey janney ke liye sab kuch aaj ke zamaney meie bhul jati hain per kabhi kisi ko shaque ho jata hai baat khul jaatiphir iss per rajniti chalu ho jaati hockey meie isslliey yah baat kuch khas yunhi hai ki issmeie ladkiyan jayada bhag leyti hain per kochvan sex ko aagey ragey rakhkar kisi ladki ko yonn shoshan karta hai bahut hi galat hai ladkiyon ka aur kochvan ka jabki guru chela, baap beti ka rishta hota hai agar woh iss thereyy ki koi harqut karta hai vastab meie hi zalalt bhara kaam karta hai aur jab uski iss adat ka govt.ko pata chaley enquiry baad meie ho pahaley ussko iss jagh se nikaldeyna chiye ki uski iss harqat se jo khel premiyon ka dil tutey kisi ki zindagi barbad ho ussey gandey kaam karney wale ko saza milni chhaiye na ki govt.enquiry karkeney ka vachan dey kar apna pichha chudey jab ek baar asia ho jaye tab kisi ki himmat na padey per zamana platchuka hai kisi ko kuch kahney se pahley bahut si aisi baateiney hoti hain jinper dhayan dena zaroori hota haimann ki bhavnaeiey koi kisi nahin rok pata ladka ladki ho tab premvivaha meie plat jata hai per agar yahi baat guru karey tab kis per vishwas karey sochna padta hai kasia zamana aagya per ab rajniti meie aajata hai tab aisa honey lagata hai ab sachai ammney aani muskil jis per doshi ko nahi blki bugbogi ko ki saza miljati jismey samaj bhi kabhi kabhi usko hi doshi banna deyta hai jo ki galat hai khelon ke anadr sex jasey aarop ko badotri miley yeh sahi nahi hai issmey guru chela ke rishtey per jo kalnk lagta hai woh sahi mayno meie sharmnak baat hai

के द्वारा: brijdangayach

प्रिय भाई,बहुत अच्छा लिखा आपने,लेकिन समाज उस लड़की को ही गुनाहगार मानता है इसलिए सामाजिक सोच बदलने की जरूरत है,बलात्कारी के लिए फांसी की सजा होनी चाहिए चूँकि सजा के दो पहलु हैं deterrence और गुनाह के बराबर सजा,फांसी की सजा भले ही अफजल गुरु और कसाब जैसी हो एक deterrence तो है ही, चूँकि पीडिता की जिन्दगी नरक से बदतर हो जाती है,उसकी जिन्दगी मौत से बदतर हो जाती है सामाजिक और व्यक्तिगत तौर पर,और तीसरी बात की आप हरेक कमजोर की रक्षा नहीं कर सकते उसकी रक्षा का सबसे अच्छा तरीका है उसे मजबूत बना दो वो अपनी रक्षा अपने-आप कर लेगा,आप हरेक मेमने की रक्षा भेडियों से नहीं कर सकते तो सारे मेमनों को शेर बना दो ना, लेकिन ये काम सामाजिक स्तर पर प्रयास करने और दवाब बनाने से होंगे,सरकार को इस पर प्राथमिकता से काम करने का दवाब,

के द्वारा: samta gupta kota

के द्वारा: razia mirza

आज ये ब्लोग पर मनोज जी द्वारा पहुंची हुं। देर से आने कि माफ़ी चाहती हुं। सामाजीक विषय पर लिखा जानेवाला ये शायद सब से अच्छा ब्लोग है मेरी नज़र में। मेरा वास्ता तो होस्पीटल से ही है इस लिये मुझे पता होता है कि एक इज़्जत लुटी लडकी कौन कौन सी परेशानीयों से गुज़रती है। समाज कि तेज आँख़ों से, रिश्तेदारों के टोकने से, हर तरहाँ से तन और मन से अपने आपको ख़ो चुकी होती है वो। आपके लेख में ऐसी बहोत सी बातों को इस विषय के हर पहलु पर जाकर समज़ाया है वो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ है। आपने सही कहा है कि बलात्कारी को समाज के सामने लाना चाहिए और इंसाफ की आवाज को बुलंद करना चाहिए. समाज को पीड़िता के प्रति उदार रवैया अपनाना चाहिए क्योंकि भावनात्मक सहानुभूति किसी की जिंदगी बना सकती है. लडकीयों में महिलाओं में जागरुक्ता सब से पहले लानी होगी। मेरा तो यह कहना मुझे व्याजबी लगता है कि आपकी इस पोस्ट द्वारा सही कदम उठाये जा सकते हैं। इस पोस्ट के आर्टिकल को समाजसेवी संस्थाओं द्वारा जरुर पब्लिश करना चाहिये।

के द्वारा: razia mirza

आज ये ब्लोग पर मनोज जी द्वारा पहुंची हुं। देर से आने कि माफ़ी चाहती हुं। सामाजीक विषय पर लिखा जानेवाला ये शायद सब से अच्छा ब्लोग है मेरी नज़र में। मेरा वास्ता तो होस्पीटल से ही है इस लिये मुझे पता होता है कि एक इज़्जत लुटी लडकी कौन कौन सी परेशानीयों से गुज़रती है। समाज कि तेज आँख़ों से, रिश्तेदारों के टोकने से, हर तरहाँ से तन और मन से अपने आपको ख़ो चुकी होती है वो। आपके लेख में ऐसी बहोत सी बातों को इस विषय के हर पहलु पर जाकर समज़ाया है वो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ है। आपने सही कहा है कि बलात्कारी को समाज के सामने लाना चाहिए और इंसाफ की आवाज को बुलंद करना चाहिए. समाज को पीड़िता के प्रति उदार रवैया अपनाना चाहिए क्योंकि भावनात्मक सहानुभूति किसी की जिंदगी बना सकती है. लडकीयों में महिलाओं में जागरुक्ता सब से पहले लानी होगी। मेरा तो यह कहना मुझे व्याजबी लगता है कि आपकी इस पोस्ट द्वारा सही कदम उठाये जा सकते हैं। इस पोस्ट के आर्टिकल को समाजसेवी संस्थाओं द्वारा जरुर पब्लिश करना चाहिये।

के द्वारा: razia mirza

के द्वारा: Anuradh chaudhary

सर जी आपने एक ऐसे मुद़दे पर बहस शुरू की है जिस पर बहस को आगे बढाया जाना चाहिए। बलात्‍कार के बाद समाज का व्‍यवहार ही पीडित महिला का मानसिंक उत्‍पीडन करता है। आखिर उस महिला का क्‍या दोष है जिसके साथ बलात्‍कार हुआ दोष तो उस पुरूष का है जिसने बलात्‍कार किया फिर समाज सजा उस पुरूष को देने के बजाय पीडित महिला को क्‍यों देता है। यह सही है कि समाज मे पुरूषों को वह स्‍थान प्राप्‍त है जो उसे पीडित महिला से श्रेष्‍ठ बनाता है परिणाम स्‍वरूप पुरूष दोषी होने के वावजूद समाज से सजा नही पाता और महिला पीडित होने के वावजूद समाज से तिरस्‍कार पाती है। समाज को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। रही बात जांच की तो आज डी0एन0ए0 फिंगर पिन्टिंग की ऐसी विधि उपलब्‍ध है जिसके द्वारा अपराधी का सौ प्रतिशत सही सही पता लगाया जा सकता है। आवश्‍यकता है इस तकनीकी के प्रयोग की। न्‍यायालयों को इन नवीनतम विधियों का प्रयोग कर अपराधियों को कानून के सिंकंजे से बच निकलने की राह को बन्‍द कर देना चाहिए। डी0एन0ए0 फिंगर पिन्टिंग की ऐसी विधि है जिसमे व्‍यभिचारी के शरीर की कोशिका से डी0एन0ए0 लेकर उसे पीडित के शरीर पर पाये गये बाल;नाखून मे पाये गये खाल या शरीर के अन्‍दर पाये गये पदार्थ के डी0एन0ए0 से मिलाते है और इस विधि से अपराधी का सौ प्रतशित सही सही पहचान की जा सकती है। पैटरनिटी टेस्‍ट के लिये इस विधि का लम्‍बे समय से प्रयोग होता आ रहा है। जरूरत है इसे न्‍यायालय मे साक्ष्‍य के तौर पर प्रयोग करने की अनुमति देने की है। इस विधि से अपराधियों के बचने के रास्‍ते भी बन्‍द हो जायेगें और पीडिता भी जांच के समय होने वाले मां‍सिक उत्‍पीडन से बच सकेगी। महिलाओं को भी पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता के अंधे अनुकरण से बचना होगा। रही बात जनजागरूकता पैदा करने की तो यह कार्य हो रहा है इसमे समय लगेगा व्‍यक्ति की मानसिंकता बदलने मे एक पूरी पीढी लगती है। इस बदलाव मे भी समय लगेगा।

के द्वारा: Anuradh chaudhary

ज़िन्दगी में अब सुख के liyejagh जगह धन के लालच mei कुछ भी खरीदो कुछ भी बेचो इस तरफ देखने की किसी को फुरसत कहांबस जिंदगी को चैन चहिये विशय्वर्ती को कुछ लोग सुख का साधन मानते और वैश्य वेरती करनेवाले उनका यह रोज़गार है जब किसी लड़की को इस देल्देल में dalal aजाता है जब उसको जहाना रखा जाता है वहां और लड़कियां उसको यह कहती रोनाधोना बेकार हैअब चुपचाप इनका कहा मानो तब hi zipaogi thakharkar woh apni aansu pounch kar ज़िन्दगी का zina इस cchakle को salam karti है ,pahale यह dhandha ek parkar के kotho के roop में tha per अब जब se govt.ne unko band kardiya तब यह colony में rahney की जगह milney lagi किसी को khabar nahi lagi kaun kya kis को फुरसत है जब asiney meiaag lagi तब sab को zankari mili dhirey dhirey इस का vistar hota gaya अब जब chhaon jahan chao dil को behla lo behaleny wali mil hi jayegi koi sharm ligah nahin govt.को malum sub है per kya kare hamre desh court se govt.को कहा है uss sya को govt.jhulta nahin sakti per inko कुछ sharm है maa bahen का sodda rkey per rock nahi paa rahe sub khula khel है kaun issko rokega यह sochney wali baat है koi batey

के द्वारा: bkkhandelwal

के द्वारा: Jack

रपे एक ऐसा swad hai जो बछा भी सुनता तब वोह माँ बाप से पूछता है क्या है rape कोई इस्सका ज़बाब दे पयेगा जो इस गन्दी हरक़त से एक नारी की भावनाओ को ख़तम करके उसको समाज में कहीं का नहीं रखते उप्पेर से कानून की किताबों में नारी से जब उसे पुचा जाता तुम्हरे सात कब कहा कैसे हुआ भरी अदलत में एक बार फिर उसका rape होरहा है उस समय सोचने वाली बात होती कैसे इसके सात किसने इजात उत्तरी और इनको क्या हके परन्तु कानून कहता है जब तक पत्ता नहीं चलेगा तब तक दोषी सजा कैसे पायेगा गुंडे खुलेबज़र में रिपे करते सब देखते डर के मारे गवाही नहीं कोई देता और कानून को गवाही चहिये यह कैसा न्याय है अब समय आगया कानून को बदलना चहिये नारी को अब अबला नहीं दुर्गा का रूप धारण करना होगा जब वोह हिम्मत करके अत्याचारी से मुकुबाला कर्गेई तब उसका साथ सब नहीं तब भवन का कोई बन्द्दा साथ देगा हमे गंदे अपराध करने वालो को इस हालत में करदेना होगा सब देखे और फिर कोई दूसरा ऐसा न कर पाए नारी हेर घर मी सब की इजात एक बर्बर होती इस्सकी लाज को बछना हम सब का फ़र्ज़ hai

के द्वारा: bkhandelwal

मैं एक समलिंगी नहीं हूँ, मगर आपके लेख से ज़रा भी सहमत नहीं| यह विकृत सोच या मानसिकता नहीं है| इस दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो विपरीत लिंग से ज़रा भी आकर्षित नहीं होते| अगर यह एक विपरीत सोच या बीमारी होती, तो आज दुनिया के बड़े से बड़े रिसर्च सेंटेर में इस "बीमारी" या "विकृत सोच" पर अनुसंधान हो रहे होते|  मेरे एक सहेली है, वह जेंटिक्स में ओस्लो से अनुसंधान कर रही है| वह एक पारंपरिक भारतीय लड़की है| मेरे उससे इस मामले में बात हुयी| उसने साफ कहा की यह एक मानसिक अवस्था है, जिसमें किसी व्यक्ति को अपने ही लिंग के व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाने में संतुष्टी मिलती है| कृपया अपने लेख में, "मेरे अनुसार" पदबंध जोड़ना न भूलें|  

के द्वारा: Sabyasachi Mishra

बिलकुल सही कहा समलैंगिकता एक बिमारी नही है बस विकृत सोच के उपज है ..इस विषय में यह नजरिया समाज को ध्यान में रखकर दिया गया है. इस लेख ने यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या स्वंतत्रता के अलावा भी इसे कानूनी पजामा पहनाने की कुछ वजह है. यह सबसे आम हिअ जब भी हम कही ऐसे समाज को दुषित करने वाली बातों के बार में सोचते है तो सरकार और न्यायालय को समाज के बारे में भी सोचना चाहिए. वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता को जब भी कानूनी मान्यता देने की बात होती है तो इसके पीछे व्यापारियों की मंशा हमेशा नजर नही आती . पहले बात करते है वेश्यावृत्ति के बारे में इसको अगर कानूनी मान्यता मिलती है तो हर गली में एक दूकान होगी जहां वासना पूर्ति का समान मिलेगा और ऐसे में क्या हमारे संस्कार बच पाएंगे. इससे फायदा होगा उन व्यापारियों का जो इस धंधे को अपने हाथों से चलएंगे . सरकार के कुछ नेता और कुछ लोग अपनी जेब भरने के लिए इसकी मांग तो कर रहे है लेकिन जब खुद उनकी मां बहन इस अधंधे में आएंगी तब उन्हें पता चलेगा. समलैंगिकता का बाजार दूनिया में कितना फैल चुका है आप सोच भी नही सकते . समलैंगिको की मांग और उनका मूल्य तो वेश्याओं से भी ज्यादा होता है ऐसे में अगर यह भारत में भी गैर कानूनी नही रहा तो हो सकता है भारत का यूवा वर्ग जो पहले से ही बेरोजगार है उसे इस धंधे में लिप्त होने में देर न ल्गे . ऐसे में मै तो चाहुंगा कि किसी भी सूरत में इसे मान्यता नही मिलनी चाहिए. जागरण जंक्शन के इस प्लेटफार्म से पाठको को बहुत फायदा हो रहा हहै .

के द्वारा: Manoj

के द्वारा: piyush

पोलियो, लकवा, गंभीर पागलपन या दिमाग का बिलकुल काम नहीं करना (न बोल पाना, न सुन पाना, न समझ पाना) आदि बिमारियों से ग्रस्त लोगो की जिंदगी नरक से भी बदतर होती है | उसे देख देखकर उसके माँ-बाप तथा परिवार के अन्य लोग भी घुटते और तड़पते रहते हैं | पूरे घर का सुख-चैन नष्ट हो जाता है | ऐसे कई विकलांग बच्चों को मैंने देखा है तथा बहुतों के बारे में सुना है | इन बच्चो और इनके माँ-बाप की स्थिति दयनीय होती है | इनके माँ-बाप भी मन ही मन उस बच्चे से छुटकारा पाना चाहते हैं, पर पाप-पुण्य के अपराधबोध से ग्रस्त होकर तथा लोक निंदा के भय से सच बोलने या स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते | ऐसे विकलांग बहुत कम मामलों में ही ठीक हो पाते है और दस पंद्रह सालों में घुट घुट कर मर जाते हैं | ऐसे बच्चों का मर जाना ही खुद उसके तथा उसके परिवार के लिए राहत और शांति की बात होगी | पर पाप-पुण्य का विचार कर ऐसी कठोर किन्तु व्यवहारिक सोच व्यक्त करने वाले लोग दुनियां में बहुत कम हैं | अजन्मे बच्चों के साथ सिर्फ माँ का ही या थोडा-बहुत पिता का भावनात्मक लगाव होता है | अतः किसी अजन्मे बच्चे की मानसिक या शारीरिक विकलांगता गंभीर, असाध्य और पक्की (confirm) हो तो गर्भपात ही समझदारी है | यह उस अजन्मे बच्चे तथा उसके पूरे परिवार के हक़ में हैं | यहाँ उसकी आत्मा, जिंदगी, मानवाधिकार आदि का हवाला देकर उसे जन्म देना और तिल-तिल मरने देना एक कोरी भावुकता, गंभीर गलती और उस बच्चे व उसके माँ-बाप को अकारण (विकलांगता की यातना सहने का) कठोर दंड और अभिशाप देने के समान अपराध है | एक साल से कम आयु के बच्चों के साथ भी माँ-बाप तथा परिवार के लोग ज्यादा भावुकता के साथ जुड़े नहीं होते हैं | इनकी मौत के गम और शोक को लोग जल्द भुला देते हैं | अतः ऐसे बच्चे यदि असाध्य और गंभीर विकलांगता (पोलियो के कारण चलने या हाथ हिलाने में बिलकुल असमर्थ या बिलकुल दिमागहीन-गूँगा-बहरा) के शिकार हों, तो भी जहरीला इन्जेशन या नींद की गोली का ओवरडोज या अन्य कष्टरहित तरीके से उन्हें उनके अतिकष्टपूर्ण जीवन से मुक्ति दे देने में ही भलाई है | उसे जीवनमुक्त यानि कष्टमुक्त कर देना पाप नहीं, बलिक उस बच्चे को गंभीर विकलांगता के अभिशाप से मुक्त करने का महापुण्य होगा | आखिर उस जीवन को ढोने का क्या मतलब, जिसमें वह हर पल दुःख ही दुःख भोगेगा, पूरे परिवार को अपने दुःख से दुखी करता रहेगा और अंततः मर जायगा | अधिक आयु के बच्चे या बड़ों के साथ परिवारजनों तथा अन्य लोगों का भावनात्मक रिश्ता गहराता जाता है, अतः वे कितने ही विकलांग क्यों न हो जाएँ, परिवार, रिश्तेदार, मित्र आदि उन्हें खोने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं | अतः जिनके साथ भावनात्मक रिश्ता गहरा हो चुका है, उनकी विकलांगता को सहन करना, हर संभव इलाज करना और उनकी जीवनपर्यंत सेवा ही मानवता है |

के द्वारा: Nikhil Yadav

साबुन को हमारे साफ सुथरे कपडों की सबसे बडी जरुरत है हम कभी उसको वह मह्त्व नही देते ..वजह वह हमारी गंदगी दूर करता है और इसी तरह झाडू को भी घर के बाहर या कोने में ही रखते है. वेश्याओं के मामलें भी ही मानव यही करता है, वेश्या जहां वासना के भोखों की भूख मिटाकर समाज में गंध फैलने से रोकती है वही लोग क्या करते है... उसे अपमानित करते  है. बाहर सब गाली देते है पर मौका लगता है तो अपनी वासना मिटाते समय ध्यान नही देते. आज के समाज मे6 इस वर्ग को जरुर सामने लाना होगा तभी जाकर रेप और बलात्कार जैसे काण्ड रुकेंगे. वरना देश में हवशियों की तादाद बढती जाएगी. खेर इस बारें में सरकार को आज और आनेवाले कल दोनों को मिलाकर सोचने की जरुरत है.

के द्वारा: jack

के द्वारा: rajan

आप का लेख बहुत ही ज्ञान वर्धक और प्रेरणा देने वाला है/ आपने सही कहा है की हमें विकलांगो को घर में छुपाना नहीं चाहिए बल्कि उनको इस समाज में जीना सिखाना चाहिए/ मैं खुद भी एक विकलांग हूँ और मेरा एक पैर बचपन से ही पोलियो ग्रस्त है/ मैं सुक्र्गुजार हूँ अपने माता पिता का उन्होंने कभी मुछे मेरे भाईयों से कम नहीं समझा/ मेरे पिता एक किशान हैं और वो अकेले ही खेती करते थे इसलिए जैसे जैसे हम भाईयों ने होस संभाला हम सब भी उनका हात बटाते थे मैं भी अपने भाईयों के साथ खेत पर कम करता था जिसका परभाव मेरे ऊपर ये हुवा की मैं अपने आप को कहीं भी अपने भाईयो से कम नहीं समझता था/ खेतो में काम करने के साथ साथ मैंने पढाई भी की भले ही मुझे 6km रोज पैदल चलना पड़ता था/ आज मैं एक कंपनी मैं Mechanical डिजाईन इंजिनियर हूँ और उपर वाले की दया से सलेरी भी अछि है. मेरे पुरे कमेन्ट का सर येही है की माता पिता को अपने विकलांग बच्चे को हिन् भावना का सीकर नहीं होने देना चाहिए/ बल्कि उनको अवसर देने चाहिए ताकि वो भी एक सामान्य जीवन जी सके/

के द्वारा: Jasbir Singh Rajpoot

के द्वारा: jack




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