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समाज की विभिन्न जरुरतों व समस्यायों को उभारता और समाधान तलाशता ब्लॉग

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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मै जनता हू ये शर्मनाक हरकत लोगोने की है .. पर आप लोगोने ये भी समाज ने को होणा की उस लाडकी ने कपडे कैसे पाहणे ... पर बात कापडोंकी नही बात है हमारे सम्मान की हम वो कपडे कहा ओर कैसी जगा पैने वो माईने मे रायता है मेरे ख्याल से उस आटो वाले ने सही बात बताने की कोशीस की है. बस उसे असकी लँग्वेज पर ध्यान नही दिया... उसने तो बस असका काम किया है बात लडकी की है. हम लोग ही मानते है अजकल लडकियोनपे रेप छेडछाड होती है. कारण वोही है हमारे कपडे हमरा रवईया... मै इन कपडोंको अवॉइड नही कररहा हू बस जहा हम पैनसके वही पहेणे .... हमारा देश तो ऐसाही है जो इन चिजोंसे सुधर नही शकता चाहे लाख कोशिश करलो लाडकीयोंकी छेडखानी होतीच है .. मैने खुद ने ही एक दो बार छेडा है .. बात हमारे रवईया की है जो लोग हमारे आसपास रायते है हमे ऊनके जैसे रयना पडता.. हमारी इंडियन मेंटालिटी लडकी की के बारेमे एसी बणी है जैसे कोई लडकी छोटे कपडे पहनके आई की उस लडकी ने कुच गलत किया है उसे हीन भावना या गलत नजर से ही देखेंगे .... मेरी राय ये है की आप येसे कपडे उसी जगा पाहेणे जहा ऊनको अवॉइड ना करे....

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के द्वारा: mukulrastogi mukulrastogi

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Baba world famous astrologar baba ji क्या आप के बनते हुए कार्यो मे रुकावट आ रही है ? बहुत परिश्रम करने के बाद भी सफ़लता नही मिल रही है ? पढाई मे रुकावट व्यापार मे नुकशान हो रहा है शादी विवाह मे कोई रुकावट आ रही है ? विदेश जाने के योग नही बन रहे है ? घर मे पहले जैसी सुख शांति नही रही ? +91-8239010000 पति पत्नी के रिश्ते मे अनबन हो रही है ? पारिवारिक समस्या का 100% समाधान किसी भी प्रकार कि समस्या जो आपके रास्ते मे आ रही है का पक्का समाधान एक बार संपर्क करो आपका जीवन ही बदल जायेगा call now +91-8239010000 Aghori TANTRIK Babaji is a very renowned ?love Vashikaran Specialist BABAJI? v a s h i k a r a n ,love vashikaran specialist aghori baba ji,get my love back by black magic vashikaran mantra for love ,baglamukhi shabar mantr,kamakhya vashikaran mantra,love spell,vodoo spell,make money spell,lottery no satta no kamdev vashikaran mantra in hindi +91-8239010000 does vashikaran mantra really works,mantra for bringing fdaughter home,parents approvel,kala jadu in hindi ,vashikaran sadna bu guruji vashikaran specialist baba ,black magic specialist,love marrige ,vashikaran guru +91 8239010000 to bring love back, solve love problems, bring your love back by tantra and ilam, powerful vashikaran mantra to win the the about black magic specialist aghori baba ji love back, indian hindu black magic | white magic |kalajadu | tantrik baba | indian astrology, real black magic spells and tips to bring lost love, cure black magic. solution girl vashikaran specialist by aghori baba ji one call in sikar and chane your life only few seconds by baba ji tantrik siddi sadna best astrological service in all +91-8239010000 best black magic specialist baba love vashikaran specialist|black magic specialist |get your love back by vashikaran |aghoti baba ji |online love solution |online black magic|the vashikaran specialit|hasband wife problem solution|vashikaran baba ji |all problem solution here +91-8239010000 aghoribabaji SOLUTION WITH 100 % GUARANTEEEXPERT IN YANTRA-LOVE AND BLACK MAGIC vashikaranexpert HYPNOTISM. aghori baba ful aghod sadna will solve any problems.lovemarrige Problems are solved by some are following GET U R LOVE BACK by vashikaran WANT BACK UR OLD LOVE ANY TYPE OF HYPNOTISM AND BLACK MAG? voodoo love spell by aghori baba ji Chat Conversation End

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भोग ग्रसित मानसिकता के कारण पुरुष अब ना सिर्फ महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं, बल्कि स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे या फिर दूधमुंही बच्चियां भी उनकी विक्षिप्त मानसिकता का शिकार बन जाती हैं. सेक्स की भूख मिटाने के लिए पुरुष स्कूल में पढ़ने वाले या अट्ठारह वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं. लचर कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के कारण ऐसे अपराधों को और अधिक बढ़ावा मिलता था लेकिन अब शायद ऐसे हालातों पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है. क्योंकि अब केन्द्रीय कैबिनेट एक ऐसा बिल लाने की सोच रही है जिसके अनुसार नाबालिग बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले या उनके साथ किसी भी प्रकार की यौन छेड़छड़ करने वाले दरिंदों को उम्रकैद की सजा दी जा सकेगी. शादी के बाद किसी और से प्यार!! बच्चों के खिलाफ यौन अपराध बिल के अंतर्गत नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न, यौन अपराध के दोषी व्यक्ति को 3 साल से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है. देश में यह पहला मौका है जब बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के लिए अलग से एक कानून लाया जा रहा है. इस बिल के अंतर्गत बच्चों की तस्करी और बाल पोर्नोग्राफी को भी शामिल किया जाएगा. बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से संसदीय समिति ने प्रोटेक्‍शन ऑफ चिल्‍ड्रन फ्रॉम सेक्‍सुअल आफेंस बिल 2011 में यह संशोधन करने की सिफारिश की है कि शारीरिक संबंधों की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया जाए. अर्थात अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के साथ संबंध बनाता है जिसकी उम्र 18 से कम है, तो भले ही यह आपसी सहमति से ही क्यों ना हुआ हो, इसे बलात्कार की श्रेणी में ही रखा जाएगा. भारतीय समाज में स्त्रियों और युवतियों का शोषण तथा उनका दमन होना कोई नई बात नहीं है. इन सब कुव्यवस्थाओं से निजात पाने के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए. इन प्रयत्नों के बावजूद ऐसे हालातों पर काबू तो नहीं पाया गया बल्कि ऐसे मनोविकार और अधिक बढ़ते गए जिसके परिणामस्वरूप आज मानव के नैतिक मूल्य निरंतर गिरते जा रहे हैं. निश्चित ही बच्चों के साथ यौन अपराध जैसी अत्यंत घृणित वारदातों को अंजाम देने वाले लोग मानसिक रूप से सामान्य नहीं हो सकते. इसीलिए अगर हम उन्हें समझाकर सही रास्ते पर लाने जैसा विचार रखते भी हैं तो यह हमारी ही नासमझी होगी. ऐसे में हो सकता है कि शारीरिक संबंधों की आयु बढ़ाने जैसे प्रावधान द्वारा इन अमानवीय कृत्यों पर लगाम लगाई जा सके. खेल, खिलाड़ी और सेक्स

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इन चैनेल वालो को क्या सौराष्ट्र की परम्परा का जरा भी ज्ञान नही है ? ये नोयडा के कोठो में बैठे अपने लोकल चिंटू, पिंटू, राजू, सोनू, मोनू, टाइप के संवाददाताओ से क्यों नही जानकारी लेते कि ये परम्परा आखिर क्या है ? मित्रो, कई सौ साल पहले से गुजरात में कच्छ और सौराष्ट्र में हर साल गर्मी में बहुत सुखा पड़ता था. . तब लोग गायो, जानवरों आदि के चारे के लिए गाँव के चौबारे पर लोकसंगीत का आयोजन करते थे. . जिसे "डायरो" कहते है | जिसमे लोग अपनी हैसियत के अनुसार पैसे देते थे | इसमें पैसे लुटाकर देने की परम्परा है ताकि दुसरे देखकर भी प्रेरित होकर पैसे दे | फिर उस पैसे से जानवरों के लिए पानी चारा आदि का इंतजाम किया जाता था | सबसे अच्छी बात ये की गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ में ये परम्परा आज भी बदस्तूर चली आ रही है | आज भी सौराष्ट्र में जब भी कही डायरा होता है तो लोग उसमे उमड़ पड़ते है और खूब पैसे देते है | ये पैसे आज भी गाँवों में मन्दिर बनाने, जानवरों के लिए चारा आदि पवित्र कार्यों के लिए ही इस्तेमाल होता है |

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मुझे लगता है बात मे दम है, पार एक बात समझ मे नहीं आई की यदि वही लड़की अपने घर मे छोटे कपड़ों मे होती है तो उसके भाई की नियत नहीं बदलती पार दूसरी लड़कियों को देख कर क्यों बदलती है.... मे ने इस बात पार काफी चिंतन करने के बात समझ मे आई की, ये सब लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साइड इफेक्ट है| क्यों के अभी से यदि १० साल पीछे देखते है तो पता चलता है की जैसे जैसे टेक्नोलॉजी जैसे मल्टी मीडिया मोबाइल और एडल्ट मूवीज और TV पार आने वाले एड्स जहां पार सेनेटरी पैड या अंडरगार्मेंट्स या बॉडी DO के ऐड जिसमे लड़कियों को एक सेक्स सिंबल की तरह से प्रस्तुत क्या जाता है उसे देख कर छोटे-२ बच्चे बड़े हो रहे है उनके मान मे हर दूसरी औरतों और लड़कियों के लिए वही छवि बना देता है, हाला की वो इसी बातों के साथ बड़े होते है जिस कारन उनके दिल se नारी के पति सम्मान नहीं आ पता| उन्हें bachpan से यही सीख मिलती है की डी ओ लगाओ और लड़की पटाओ| आजकल की मूवीज मे लव स्टोरी के साथ साथ सेक्स प्रदर्सन भी होता है जो और भी मन पार बुरा प्रभो डालता है. और इसे सही ठहरा देताहै| जब भी आप पुरे परिवार के साथ टेलीविज़न देख रहे होते है तो कंडोम का ऐड या सेनेटरी पद के ऐड या अंडरगार्मेंट्स का ऐड इस तरह आता है जैसे की के नागे होने से किसी को कोई प्रभाओ नहीं परता | तो आप कैसे किसी बलात्कारी को फँसी देने के बाद ये सोंच सकते है अब समाज सुधर जाएगा मुझे तो लगता है ऐसे एक दिन पुरे देश मे हर कोई फँसी की इंतजार करता हुआ जय मे नजर आएगा | मुझे लगता है हमें मीडिया मे आरही पोर्न वीडियोस को बांड करना होगा और आज के हर बच्चे को ये बताना होगा की नारी का सम्मान करो वो कोई हवस की मशीन नहीं बल्कि माँ और बेहेन बनने की अधिकारिणी है | ये मेरी पर्सनल विचार है जो मे पिछले कुछ दिनों से अनुभव कर रहा हूँ... कृपया यदि मेरे विचरों मे कोई कमी है तो सुझु दें | धन्यवाद.

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"बकाया राशि उगाही के नाम पर विद्युत आपूर्ति विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार" बिजली विभाग बकाया बिल वसुलने के लिये आजकल एक प्रकार का अभियान चलाये हुआ है। इस अभियान में विभागीय पदाधिकारी ऐसे-ऐसे हथकण्डे अपना रहे हैं जिसकी आमजन कल्पना भी नही कर सकते। बिजली विभाग के भ्रष्टाचार का शिकार सबसे अधिक अनपढ़, किसान और ग्रामिण क्षेत्र के गरीब जनता हो रहे हैं। इन लोगों को न संविधान का ज्ञान है न अपने अधिकार का। इन अनपढ़-अज्ञानी, असहाय-निसपृह, दरीद्र जनता को "इल लीगल नोटिस को आफिसियल लीगल नोटिस" के तरह प्रस्तुत करते हैं। "LOW" का भय दिखाते हैं। जेल भेजने की धमकी या कुर्की-जपती की धमकी तक देते हैं। ऐसे हथकण्डो को अभेद्य अमोघ अस्त्र के रुप में प्रयोग करते हैं। विद्युत विभाग के कर्मचारियों की इन अनैतिक व असंवैधानिक धमकियों से डरकर कर्ज लेकर या अपना जीवन भर की जमा पूँजी गिरवी रखकर भी बिजली विभाग के 'लीगल नोटिस' (वास्तव में इललीगल नोटिस) पर अंकीत असंवैधानिक राशि चुकाने को विवश हैं। आमजन को आसानी से मुर्ख बनाया जा रहा है। ॥बिजली कंपनी को "दो वर्ष से अधिक की अवधि वाली बकाया राशि वसुलने का कोई अधिकार नही है॥ किन्तु बिजली विभाग के अधिकारी बीसो वर्ष पुराने बिलों की उगाही इस एक 'लीगल नोटिस' के माध्यम से बिना सपोर्टिंग पेपर के असानी से कर ले रहे हैं। बिना किसी विभागीय आदेश-पत्र मीटर जप्त कर लेते हैं। विद्युत आपूर्ति बन्द कर देते हैं। और शिघ्र अतिशिघ्र "इल लीगल नोटिस" पर अंकीत बकाया राशि का भुगतान करवाकर ही दम लेते हैं। अन्यथा वो भिन्न-भिन्न तरीको को अपनाकर मानसिक प्रताड़ना देते रहते हैं। डर और अत्यधिक दबाव के कारण कमजोड़ दिल के कई उपभोक्ता सदमें में चला गया या हृदय-गति रुकने से इनमे से कई की अकाल मृत्यु तक हो चुकी है।

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किस बेबकूफ ने यह ब्लॉग लिखा है !! ये सदियों पुरानी सामजिक जड़ताओं को किस बेबकूफी से महान बताने की कोशिश कर रहा है। आत्म निर्भर न होने की स्थिति में ही स्त्रियों को पति की मृत्यु के बाद विवशताओं भरा जीवन जीना पड़ता रहा है ,ये तथ्य सब जानते हैं। ये बेबकूफ लेखक/लेखिका स्त्रियों की आत्मनिर्भरता को ही निशाना बना रहा/रही है। सारे बंधन सिर्फ विधवा महिलाओं को इसलिए ही सहन करने पड़े क्यूंकि वो आत्मनिर्भर नहीं थीं। शास्त्रों में एक विधुर को क्यों नहीं लंगोट कस कर एक समय ही भोजन करके रहने का निर्देश दिया गया ? जाहिर है शास्त्र प्रणेता पुरुष ही थे और समाज भी पुरुष प्रधान ही रहा। इसलिए सारी जड़ताएं सिर्फ स्त्रियों पर लाद दी गयी। आज २१वी सदी में भी जब कोई जड़बुद्धि इस तरह के लेख या ब्लॉग लिखता है तो सचमुच उस पर तरस आता है और मन करता है की इसे शिक्षा के लिए फिर से कक्षा १ के बच्चों के साथ बिठा दिया जाए जिससे ये सही मायने में आज के समाज के हिसाब से शिक्षा ग्रहण कर सके , कुछ अच्छा सोच सके, कुछ अच्छा लिख सके। इस तरह का कूड़ा न डाले ब्लॉग में।

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मुझे लगता है की लेखक को किन्नरों से कुछ अधिक हमदर्दी है जमाना बदल गया है आजकल तो लोग जानबूझकर किन्नर बनते हैं. अपना लिंग कटवा देते हैं. क्योंकि इस धंधे मैं ब्लैकमेलिंग के साथ कमाई भी तो है किसी की शादी मैं जाकर 5 से 10 हजार मांगना बच्चे की जनम पे २००० मांगना तीज त्योहारो पर १०० २०० रुपये से काम न लेना इनका काम है एक बार मैंने एक किन्नर से पूछा की तुम लोग इतने पैसे का क्या करते हो तो वो बोला बिंदास लाइफ जीते हैं न आगे कोई न पीछे कोई ढाबे में खाते हैं २००० की सदी पहनते हैं जेवर पहनते हैं गाड़ी में घूमते हैं तुम लोगो का क्या है जिंदगी भर घर बहार की झंझटो में उलझे रहते हो पैसा कमाने के लिए बाहर के शहरों में नौकरी करते हो हमारी लाइन में बहुत पैसा है और सुकून बी बड़े शहर वाले किन्नर तो करोड़पति तक हैं किसी को नहीं पता न कोई टैक्स न लफड़ा न कोई केस वो बोला की दिल्ली बम्बई जैसी सिटी में तो हमारी लाइन वाले जिस्म का धंधा बी करते हैं मर्डर के ठेके भी लेते हैं. अब बताइये की ये लोग हमदर्दी के लायक हैं. इसलिए इनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है सरकार को इनकी पढाई और रोजगार पर ध्यान देना चाहिए इनको समाज में शामिल करके इनको पूरे अधिकार देना चाहिए जिससे ये इललीगल ट्रेनों में घरो में बाजारों में पैसा वसूली को बंद किया जा सके

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मेरा कोर्ट से गुज़ारिश है की आप कुछ और कानून के बारे मे १ बार फिर से सोचे क्यूंकि सोच, समय, हालत और लोग काफी बदल गए है १. लडकिया अपनी मर्ज़ी से समबनध बना रही है, उन्हें शादी की परवाह नहीं २. आमिर शादी शुदा मर्दो और लड़को को फंसाया जा रहा है कोर्ट से मिलने वाले हर्जाने क चलते ३. बिना शादी के वायदे के भी लडकिया सेक्स कर रही है ४. कुछ लड़कियों के घर वाले बॉयफ्रेंड होने से ऐतराज़ नहीं रखते और लड़कियों को पूरी छूट मिल रही है घर वालो की तरफ से और बाद मे जब लड़का शादी के लिए न कर दे तो वोई घर वाले कोर्ट जाने की दमकी दे रहे है ५. और अगर बॉयफ्रेंड आमिर है तो घर वाले अनदेखा करते है सब कुछ और लड़की को फुल सपोर्ट मिल जाता है बाद मे जब लड़का न करे तो घरवाले आँख खोल लेते है और बोलते है "हमे कुछ पता ही नहीं था इतना सब कुछ हो गया अब शादी नहीं हुई तो कोर्ट जायंगे अनरोध: आपसी सहमति से बनाये हुए यौन सम्बन्ध चाहें कोई भी लालच या कोई भी वायदा दिया गया हो या ना दिया गया हो लड़को को मुज़रिम ना साबित करे क्यूंकि १ लड़की जब संबंध बनाते हुए लड़के की मंशा समज़ नहीं पायी तो कोर्ट को वो लड़की कैसे बोल सकती है की लड़के ने गलत मंशा से यौन संबंध बनाये.... वायदे तोड़ने वाला कानूनन कोई मुज़रिम नहीं तो कानून किसी को दोषी करार नहीं दे सकता १ लड़का अगर १० लड़कियु से समबनध बनाता है तो लड़का दोषी और वो १० लडकिया निर्दोष?...१ लड़का १ ही समय मे १० समबनध बनाता है तो वो लड़का गलत हो सकता है क्यूंकि उसकी शादी की मंशा नहीं हो सकती लेकिन उन १० लड़कियु का चरित्र का प्रमाण पेश होगा कोर्ट मे तब ही लड़के को दोषी करार दिया जाना चाइये....और अगर लड़का १ के बाद १ समबनध बना रहा है तो फिर वो दोषी नहीं होना चाइये....

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as per one of her friend-  Kaye Jordon For everyone believing that the baby riding on the back of her mother's wedding train, please take a look at the above painting by the great Annie Lee. This action has significant historical value and indicates the dedication of her mother (and father) toward caring for her child and family. We, throughout history have worked hard to do whatever necessary to take care of our own. A GOOD mother takes her child wherever she goes, even down the aisle. Oh, and by the way, the event was the couple's SECOND wedding, not the first. This was simply the culmination of a dream deferred! Find the individuals blowing smoke into the face of an infant or those allowing children to hold weapons, and, let us not forget the child arguing with his mother while calling her by her first name! Most of the comments are from individuals who do not know, nor will ever meet this couple. I happen to know them both. In fact, for the gentleman who believed that the coordinator needs her butt beat, I was the coordinator and I remain intact! The wedding was beautiful, the decorations both beautiful and unique (I did those too). and the entire event and day was flawless! Too bad those with negative comments have so little to do that they indulge in making disparaging comments about people you don't know! Could it be that you have nothing in your lives to occupy your time and space? Taking a picture from a beautiful, God sanctified event and turning it into a media circus is despicable. Why not find another activity to waste your time on? Leave these two alone, and THAT was directly from my heart! Bullshit it is...she should be ashamed on her self

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हमारा समाज भावना प्रधान है और यहाँ ज़िन्दगी से जुड़े हर फैसले में भावनाएं हावी होती हैं फिर वो चाहें जैसे हों और हमारी अदालतें भी टी इसी समाज का हिस्सा हैं और उनके लिए भी व्यवहारिक हो के फैसला देना आसान तो नहीं ही है और परिजन भी तो अपने मरीज को तिल तिल करके मरते तो नहीं ही देख सकते तो इसमें बहुत ही कड़े दिल से प्रक्टिकली डिसिशन लेने कि जरूरत है क्योंकि परिजन ही तो इम्पोर्टेंट हैं अगर वही चाहतें हैं तो शेष लोगों को भी ये सोचना चाहिए कि सिचुएशनस कितने डिफिकल्ट रहीं होंगे और परिजनों को कितनी तकलीफ हुई होगी इच्छा -मृत्यु का डिसिशन लेने में पर ये भी तय करना होगा कि कहीं इसका मिसयूज न होने लगे कि लोग जबर्दस्ती किसी लालच में ये काम कमजोर लोगों से छल -बल से ना करवा सके

के द्वारा: lopa69 lopa69

इक्षा मृत्यु जिजीविषा --जीने की इक्षा ,किसी भी जीवित प्राणी की फर्स्ट इंस्टिंक्ट -येन केन प्रकारेण -साँसों की डोर को थामे रहने की जद्दो जहद -इसने सदियों से हमें ऐसे- ऐसे करिश्मे दिखाए हैं, जिन्हे देख और सुन कर मानव सभ्यता ने दांतो तले उंगलियां दबा ली है और न चाहते हुए भी जीवित रहने के उन प्रयासों को सलामी जरूर दी है जो सामान्य परिस्थितियों में भयंकरतम अपराधों की श्रेणी में आते -यहाँ प्रश्न जीवन का नहीं मरण का है इक्षा जीने की नहीं मरने की है --नितांत अनैसर्गिक कामना ,जीवन छोड़ कर मृत्यु का वरन -कैसे कर सकता है कोई ,कैसे करने दे सकते हैं हम -समाज, धर्म -दुनिया ,देश सरकारें -हम ही तो हैं ठेकेदार, आदमी की ज़िंदगी के --मरने का अधिकार कैसे दे सकते हैं किसी को --सोचना पड़ेगा -सोचना तो पड़ेगा ही, क्यों कोई व्यक्ति जीवन छोड़ मृत्यु का अधिकार मांग रहा है नैसर्गिक जिजीविषा को छोड़ -इक्षा मृत्यु की तरफ भाग रहा है -! ऐसा होता है कभी -कभी कि जब हम उलझनो से निकलने का रास्ता नहीं तलाश पाते या किसी किस्म के मानसिक या शारीरिक आघात से दो -चार होते हैं तो क्षणिक आवेग में कुछ आत्म घाती कदम उठा लेते हैं या उठाने का प्रयास करते हैं ,जो निंदनीय है और अक्सर क्षणिक आवेश का ही परिणाम होता है और किसी भी धर्म या कानून में वर्जित है तथा अपराध की श्रेणी में आता है परन्तु प्रश्न यहाँ इसका नहीं है ,प्रश्न है यहाँ ,उन ज़िंदगियों का जिन्हे जीवित कहना शायद जिंदगी का अपमान है -सांसें चल रही हैं क्यसिर्फ इसे ज़िंदा रहना कहा जा सकता है ? सालों साल मशीनो के सहारे जीते जाने को क्या कहेंगे आप ?आज के युग में कोई दुर्घटना हुई ,सबकी सहानुभूति आप के साथ है, आप लाचार हो गए, अपाहिज हो गए ,दो आंसू बहा लेंगे आप के साथ और अपने रास्ते चलेंगे ,अपना काम देखेंगे ,ज़िंदगी है; कोई किसी के लिए नहीं रुकता, रुक सकता भी नहीं -और अगर आप इस अवस्था में आ गए कि सालों साल अचेत हैं, मशीनो के सहारे हैं अथवा असमर्थ हैं हिलने डुलने से भी ;डिक्लेयर्ड है कि अब आप कभी ठीक नहीं हो सकते ;कौन साथ दे सकता है अनंत काल तक, अगर आप कोमा में हैं तो शायद फिर भी आप उस अकेलेपन को महसूस नहीं कर सकते ;मगर आपे में हैं ,सब समझते और महसूस करते हैं तो सोचिये --और अपने को उन परिस्थितियों में रख कर सोचिये -क्या चाहेंगे आप जीवन या मृत्यु? मेरी समझ में तो यहाँ मृत्यु ही जीवनदायी है ;मोक्ष शायद यही होगा --- इतना आसान नहीं है ये फैसला कर पाना ;जानती हूँ ;सिर्फ भावना का क़ानून में कोई स्थान भी नहीं मगर मर्सी प्ली तो उसमें भी है. ऐसे कानूनो का अक्सर गलत इस्तेमाल का खतरा हो सकता है खास तौर पर मिलकियत वाले केसेस में ;परन्तु ऐसा तो लगभग हर क़ानून के साथ है मेरी समझ से इक्षा मृत्यु का अधिकार होना ही चाहिए . सख्त कानून बनाएं ,डॉक्टर्स की ,मनोचिकित्सकों की, राय लें और सबसे बड़ी बात ये कि सहानुभूति से कुछ उसकी तरफ से भी सोचें ,जिस पर ये सब बीत रही है .

के द्वारा: kavita1980 kavita1980

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

या अल्लाह रहम फरमा इस भयानक तूफ़ान से मेरे मुल्क के रहने वाले लोगो की और उनकी हिफाज़त फरमा... या अल्लाह पिछली बार भी 1999 उडीसा में ऐसा ही तूफान आया था जिसमे 10000 से ज्यादा लोग मारे गए गए....लाखो लोग बेघर हो गए थे....करोडो का नुकसान हो गया था या अल्लाह इस बार ये तूफान मेरे प्यारे देशवासियों को ज्यादा नुकसान न पहुचाये ऐसा कुछ कर दे मालिक...और सिर्फ मेरे देश ही नहीं कहीं भी ज्यादा तबाही न मचाये ऐसा कर दे मालिक.. या अल्लाह तुझे तेरी रहीमी, करीमी, सत्तारी, गफ्फारी का वास्ता.. ए मेरे मालिक हम जानते हैं दुनिया में तेरी नाफ़रमानी करने वालो को तू समय समय पर अपनी कुदरत के नमूने दिखाकर होशियार करता हैं...लेकिन अल्लाह हम में से जो नेक और उनके सदके में इस तूफ़ान की ताकत को कमज़ोर कर दे और होने वाले नुकसान को कम कर दे... आमीन...

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एक बेहतरीन ब्लॉग है आज के समय में बहुत सटि खासकर पिछले दिनों फेसबुक पर पोर्न पर बैन के खिलाफ उमड़ॆ युवाओं को देख सोचने लगा कि आखिर यह युवा वर्ग चाहता क्या है.. पोर्न देखेगा लेकिन इंडिया गेट पर जाकर रेप के खिलाफ प्रदर्शन भी करेंगा. वाह भी वाह.. . लेकिन जिस भावनात्कम नजरिए से इस आर्टिकल को लिखा जाना चाहिए था उस तरह नहीं लिखा गया, मसाला और तथ्य तो परोसे गए हैं लेकिन भावनात्मक दृष्टिकोण से कुछ त्रुटि है. अगर इस आर्टिकल में किसी ऐसी स्त्री की व्यथा लिखी गई होती जो वाकई इसका शिकार हुई हो तो भावन पैदा होती. ऐसी कन्याओं क़ो समाज में किस तरह से जीना पड़ता है, घर छोड़ने के बाद भी चेहरे पर दुप्ट्टा कर या कई केसों में तो लड़की को प्लासिटिक सर्जरी तक करानी प्ड़ती है.

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मेरे ख्याल से आपने इस न्यूज के आधार पर इस ब्लॉग को लिखा है लेकिन शायद आप यह भूल गए कि इसमें वकील ने तलवार दंपति पर आरोप लगाए हैं.. यह साबित नहीं हुआ है कि ऐसा हुआ होगा. माना कि ऐसा हुआ भी जो आपने लिखा है लेकिन एक सम्मानजनक पद और मंच की गरिमा का ध्यान देते हुए आपको सांकेतिक शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए था ना कि सीधे शब्दों में तलवार दंपति को दोषी करार देते हुए यह लिखना चाहिए था कि उन्होंने यह बातें कबूल की हैं. इस चीज के लिए अगर कोई शख्स चाहे तो आपपर केस भी कर सकता है. कृप्या इसे सही कीजिएं.. सामाजिक मुद्दों के लिए सेक्स को छोड़ बहुत सी चीजें हैं उन्हें देखिए, लिखिए, जनता को जागरुक बनाइएं, मसाल परोस कर चटखारे ना लीजिएं.. लोग वहीं पढेगे जो आप उन्हें पढने को देंगे. इस मंच की मैं बहुत बड़ी प्रशंसक थी लेकिन आज की घटना ने मुझे आहत किया है.

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अजीब बकवास है यह.. बिना केस की संवेदनशीलता को समझते हुए और सच्चाई जाने हुए यह क्या लिखा है आप लोगों ने. इस केस को मैने भी पूरी तरह स्टडी किया है और अभी तक आज तक किसी भी न्यूज चैनल या सीबीआई की रिपोर्ट में यह नहीं सुना कि तलवार दंपति ने अपना गुनाह कबुला है... गलत तथ्य पेश करने का हश्र जानते हैं आप.. क्या आपने जो स्टेटमेंट दी है उसका कोई सबूत है विशेषकर " जी हां, अपने बयान में डॉ. राजेश तलवार और नुपुर तलवार ने यह कबूल किया है कि रात के" सेलेकर जो सारा आपने बोल्ड किया है. माफ कीजिएं एडिटर साहब ऐसा कहीं नहीं लिखा है सनसनी के लिए आपने अपनी सीमाओं को पार करने का प्रयत्न किया है. जनता को गुमराह कर कुछेक हजार रीडिंग पाना आसान है. यह कोरी बकवास किस लेखक के मन की रचना है?????? ऐसे प्रतिष्ठित और सम्मानिय स्तर के ब्लॉगिंग मंच पर क्या ऐसी बिना प्रुफ रीडिंग वाली लेखन साम्रगियां भी लिखी जाती हैं????

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सच तो यह है की अब हर धर्म मे, धर्म के ठेकेदार अपने फायेदे और राजनीती के तहत मूल नियमो को तोड़ मरोड़ कर बनाये नियमो को धर्मसम्मत बता कर , सदियों से अपना उल्लू सीधा करते आये है और सत्ता इनके आगे सर झुकाकर अपने को धन्ये समझती है ! जो वास्तव मे , इन के साथ जुड़े वोटो को लुभाने का नाटक ही होता है | जबकि धर्म मनुस्ये के सामाजिक , मानसिक ,आध्यत्मिक और , वैयक्तिगत विकास के लिए मनोविज्ञानिक उपाए है |यूरोपीयन पुनर्जागरण पर टिप्पणी करते हुए हॉलैंड के महान विद्वान इरेस्मस ने सच ही कहा था " इश्वर है और ये बिलकुल सच है ! पर अगर नही है ,तो भी उसे बनाये रखना , मानवता के लिए जरूरी है सच तो यह है की अब हर धर्म मे, धर्म के ठेकेदार अपने फायेदे और राजनीती के तहत मूल नियमो को तोड़ मरोड़ कर बनाये नियमो को धर्मसम्मत बता कर , सदियों से अपना उल्लू सीधा करते आये है और सत्ता इनके आगे सर झुकाकर अपने को धन्ये समझती है ! जो वास्तव मे , इन के साथ जुड़े वोटो को लुभाने का नाटक ही होता है | जबकि धर्म मनुस्ये के सामाजिक , मानसिक ,आध्यत्मिक और , वैयक्तिगत विकास के लिए मनोविज्ञानिक उपाए है |यूरोपीयन पुनर्जागरण पर टिप्पणी करते हुए हॉलैंड के महान विद्वान इरेस्मस ने सच ही कहा था " इश्वर है और ये बिलकुल सच है ! पर अगर नही है ,तो भी उसे बनाये रखना , मानवता के लिए जरूरी है

के द्वारा: aman kumar aman kumar

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संपादक महोदय आपकी ये बात सही है की अधिक कमाने या कमाने वाली महिलाओ को हमारे भारतीय समाज में अच्छा नहीं समझा जाता है पर इस बात को समग्रता से देखना होगा।आपने कहा की अधिक कमाने वाली औरतो को पति इज्जत नहीं देते और उनके घर आने पर सेवा नहीं करते या कम में हाथ नहीं बताते ।आप एक बात सोचकर बताओ की कितनी कमाने वाली औरते है जो बेरोजगार लडको या गरीब लडको से शादी करती है ।कितनी औरते है जो अपनी कमाई को अपने पति की इच्छा से खर्च करती है या अपने गरीब और बेरोजगार पति को इज्जत से अपनी सोसाइटी में ले जाती है और उनसे वैसा प्यार करती है जैसा एक कमाने वाला पति अपनी गरीब बेरोजगार पत्नी से करता है ।संपादक जी बाते केवल वाह वही बटोरने और अपने आप को प्रोग्रेस्सिव दिखने के लिए नहीं होनी चाहिए । हमारे समाज में चल रही व्यवस्था सदियों से इस समाज को यहाँ तक लायी है जिसको समाज के प्रोग्रेसिव लोग पानी पी पी कर गली देते है पर आज हम जिस व्यस्था को फॉलो कर रहे है उसने हमें क्या दिया ? रिश्ते नाते ख़त्म हो गए, बड़े छोटो का लिहाज ख़त्म हो गया ,औरत सम्मान की जगह भोग की बस्तु बन गयी ।क्या आप हम यही चाहते है?औरतो को फैशन के नाम और स्वंत्रता के नाम पर नंगा देख रहे है और इससे समाज में अपराधो पर बृद्धि होने पर कहा जाता है की औरते सुरक्षित नहीं है ?क्या औरतो की कोई जिम्मेदारी नहीं है? समाज जब ऐसी औरतो के बारे में कुछ कहता है तब लोग पानी पी पी के गली देते है की ऐसे लोगो को समाज का ठेकेदार कौन बनाया? जब ऐसी गलत हरकते होती है तब यही प्रोग्रेसिव लोग कहेंगे की समाज का स्तर गिर गया है और कोई इन औरतो की रक्षा के लिए आगे नहीं आया ? क्या समाज रोबोट है क्या जो इन लोगो की समझ से जैसा चाहेंगे वैसा चलेगा ।इन बुरइयो को हटाने के लिए हमें अपनी सनातन व्यस्था की तरफ जाना पड़ेगा और अगर आज के आवश्यकता के अनुसार कुछ बदलाव चाहिय तो करना पड़ेगा परन्तु यह केवल पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ न हो। हमें नैतिकता का पाठ और महापुरुषों के बारे में अपनी आने वाली पीढ़ी को बताना होगा न की मिचेल जैक्सन के बारे में ।

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आपका पोस्ट बहुत ही घटिया है, सबसे पहले तो मै आपको ये बतला दूँ की आज कल की महिलाएं और लड़कियां उतनी बेचारी नहीं रह गयी हैं jitna aap unko dikhane की koshish karte हैं. kabhi आपलोग कहते हैं की आजकल की महिलाएं और लड़कियां वि समाज में पुरुष के साथ साथ कंधे से कन्धा मिला क बराबरी में चल रही है, वही दूसरी तरफ ये भी कहते हैं की महिलाओं और लड़कियों पे अत्याचार बढ़ता जा रहा है. आपके पोस्ट ने रही सही कसर भी puri kar di. आज कल की महिलाएं तो kanoon ka upyog purushon ko blackmail karne में karti हैं, jiska jeeta jagta udahran aapne ही prastut kar diya है. pati भी insaan ही hota है, wo भी apni patni से utna ही bhawnaatmak roop से juda hota है jitni की patni. agar aise में patni uspe balaatkaar ka bebuniyaad और घटिया aarop laga de तो iska koi matlab नहीं banta. iska koi sabut भी नहीं diya जा sakta है की wastav में mahila ka balaatkar hua है yaa wo aarop jhuta है. ab तो kuch din में purushon के liye sanstha banne lagenge.... और purushon की haalat kharaab hone lagegi.

के द्वारा: saroj saroj

आपका लेख 'कितना अटपटा है लिव इन संबंधों में बलात्कार का आरोप' पढ़ा. शीर्षक जितना ही अटपटा था आपका लेख . दोगलेपन का जीवंत प्रतीक. आपका यह कथन “विवाह में बलात्कार आपकी दृष्टि में दंडनीय है और लिव इन में हास्यास्पद है” बेहद सतही और पूर्वाग्रह से त्रस्त प्रतीत होता है। एक बार ये मान भी लिया जाए कि लीव इन संबंध लड़की की अपनी मर्जी से बना था और उसे किसी ने मजबूर नहीं किया था। तो क्या उस लड़की के पुरुष पार्टनर को बलात्कार का नैतिक अधिकार मिल जाता है। अगर ऐसा है तो विवाह में भी ऐसा ही हो सकता है। जब कोई लड़की लीव इन संबंध के लिए हाँ करती है तो उसका यह अर्थ कदापि नहीं होता होगा कि वह पुरुष को (हर स्थिति में चाहे लड़की चाहे न चाहे, चाहे व स्वस्थ हो या न हो) शारीरिक उत्पीड़न के लिए हाँ कह रही है। न ही उसकी कल्पना में यह होता होगा कि जो पुरुष उसके साथ रहने के लिए राजी हुआ है वह जब चाहे जैसे चाहे जहाँ चाहे अपना पुरुषत्व प्रदर्शित करने को आज़ाद है और उसके लिए किसी से शिकायत नहीं कर सकती क्योंकि यह संबंध उसका अपना चुनाव है। वैवाहिक संबंधों में आए टकराव (चाहे व बलात्कार या किसी अन्य अर्थ में क्यों न हो) को दूर करने या समझने के लिए अगर समाज/परिवार तैयार रहता है तो उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उनके मन में विवाह के लिए विशेष स्थान है बल्कि यह कारण यह होता है कि भारतीय समाज में विवाह (जो परिवार की सहमति द्वारा किया गया हो) टूट जाए तो परिवार उसमें अपनी असफलता मानता है और उसके अहम को झटका लगता है। सारा परिवार चाहने लगता है कि विवाह चले। दूसरी तरफ प्रेम विवाह या लीव इन में जब भी बाधा आती है तो परिवार का मन कुछ ऐसा होता है “हमें तो पहले ही पता था। कौन-सा हमसे पूछ कर किया था? टूटना ही था।” शायद ही समाज/परिवार अपनी मर्जी के खिलाफ हुए विवाह संबंध में आए बिखराव को संभालने के लिए रुचि रखता हो। दोस्तो मुझे माफ करना परंतु मेरा मानना है कि किसी स्त्री से उसकी मर्जी के बिना ज़बरन शारीरिक संबंध बनाना स्त्री के लिए पीड़ाजनक होता है। चाहे वह स्त्री पुरुष के साथ विवाह करके रह रही है हो या लीव इन में। केवल इसलिए कि स्त्री बिना विवाह के रह रही है पुरुष को बलात्कार का अधिकार नहीं मिलना चाहिए जो कि आपने अपने लेख में लगभग दे ही दिया है और जागरण के मित्रों ने इसे मास का सर्वोत्तम लेख भी मान लिया गया।

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कोंग्रेस के लोग मुसलमानों को गुमराह करके बहुत बड़ी भूल कर रहे है| आजादी के पहले उसीकी वजह से पाकिस्तान भी अलग हो चूका है| आरब और फारस के मुसलमान इतने जिद्दी नहीं होते, जितने भारतीय उपमहाद्वीप में बसे मुसलमान है| वे लोग हम पर हमेशा इस्लाम विरोधी होने के आरोप लगाते रहते है| लेकिन हिन्दूओ ने तो हमेशा सारे जग को अपना माना है| "वसुधैव कुटुम्बकम" और "सर्वे भवन्तु सुखिनः" का मन्त्र हिन्दुओ ने दिया है, ईरान से आए हुए पारसीओ को पनाह हिन्दुओ ने दी है| यह देश हिन्दुओ का जन्मस्थल है| उनका जन्मस्थल सऊदी अरब है| जहा का रोटी कपड़ा खाते है, जहा की जमींन पर दफन होने वाले है, उन्ही के भाइओ से गद्दारी कहा का न्याय है? यदि ऐसा ही करना है तो मिडल ईस्ट चले या फारस चले जाओ।

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यह क्या कह रहे हैं आप। जिस लड़की के साथ यह घटना हुई, उसने क्या कहा, यह नितांत अलग मसला है। लेकिन क्या आपके कहने का आशय यह है कि छेड़छाड़ को रोकने के लिए कोठे होने चाहिए या पैसे लेकर सेक्स की छूट होनी चाहिए। जागरण जंक्शन के संपादकों को सामाजिक मुद्दा उठाने की हड़बड़ी में विषय प्रवर्तन की इतनी समझ तो रखनी ही चाहिए। किसी एक निंदनीय घटना का विकल्प दूसरी घृणित घटना नहीं हो सकती। क्या कोठे पर जाने वाले कोठे से बाहर आकर बेहद शरीफ हो जाते हैं? और क्या कोठे पर पहुंचा दी जानी वाली लड़कियों की यंत्रणा, सरेराह छेड़े जाने वाली लड़की की यंत्रणा से कमतर होती है? यह किस तरह की दलील है। किस बात की वकालत कर रहे हैं आप?

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अपने ही देश में अपने ही लोगों से भागना पड़ रहा है क्या विडम्बना है शर्म आ रही है हमें अपने को भारतीय कहने में क्या यह वही भारत देश है जिसे स्वतन्त्रता दिलाने के लिए भारत के कोने कोने से हर सम्प्रदाय,हर जाति हर वर्ग, हर क्षेत्र के लोगों ने कुर्बानी दी. एक कहावत है पौधा जब छोटा होता है तभी झुकाया जा सकता पेड़ बन जाने के बाद झुकाना ना मुमकिन है . कई वर्ष पूर्व जब शिव सेना के द्वारा मुम्बई से दक्षिण भारतीयों को भगाया गया था उड्प्पी होटलों का खात्मा किया गया था न सरकार न जनता किसी ने कुछ नहीं किया .फिर बारी आई बिहारियों की थोड़ी हलचल हुई फिर सब शांत अब पूर्वोत्तर भारतीयों को नई तकनीकों SMS आदि के द्वारा डरा कर भगाया जा रहा है आखिर कब तक ? राजनीतिग्य तो अपना खेल खेल रहे हैं सरकार सख्ती से कुछ नहीं कर रही है और हम जनता सिर्फ तमाशा देख रहें हैं आग की लपटों को अपने पास आने का इन्तजार कर रहे हैं

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अफगानिस्तान के राज्य परवान गाँव कोई में आंतकियों ने कैसे ऐ के – ४७ चला २२ साल की एक अबला और असहाय औरत नजीबा को गोलियों से छलनी कर मार डाला | यह दरिंदगी नहीं तो क्या है | क्या इस्लाम और दुसरे मजहबों में नजीबा जैसी अबला और असहाय औरतों का यही नसीब है ? जैसे इस्लाम यशु को भी मसीहा मानता है | भगवान यशु अर्थात मसीहा यशु ने कहा था हाँ जमीन में कमर तक गाड़ी हुई बेबस औरत को पत्थर मरने का अधिकार उसको है जिसने कभी कोई पाप न किया हो | जिस आंतकी ने उस औरत से नाजायज़ सम्बन्ध बनाये औरत की जगह उसके हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना चाहिए था | परन्तु काफ़िर और कायर आंतकी खावंद ने अपनी औरत की इज्ज़त ख़राब करने का बदला नहीं लिया और बेशर्मी से जी रहा है | थू है उसके मूह पर और धिक्कार है उसकी मर्दानगी पर | करीबन दो साल पहले सहारनपुर साईड की तरफ एक ससुर ने बहु-बिटिया की इज्ज़त लूट ली | मौलवी का इन्साफ यह था की अब वोह अपने पति की माँ बन गयी है | होना तो यह चाहिए था कि अपराधी ससुर के हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना यां फिर जब्बर्दस्ती इज्ज़त लूटने के लिए कानून के हवाले कर देना चाहिए था | इसी तरह पंजाब के एक गाँव में बहुयों को रंडवा ससुर को खुश करना पड़ता था अन्यथा ससुर शादी कर जमीन – जयदाद के और हक़दार पैदा कर देता | ऐसी समस्या का कोई इलाज नहीं है परन्तु समाज और कानून की निगाहों में यह अपराध है | ऐसे रंडवा और भोग – चाहने वाली विधवाओं के लिये अलग स्थान निर्धारित कर देना चाहिए यान वोह बाँझ से शादी करले | समलैगिक सम्बन्ध बनानेवालों के लिये भी अलग स्थान जैसे कोई टाप्पू – जजीरा होना चाहिये तांकी वोह दूसरों को बहला-फुसला कर समाज में अपनी अपनी गन्दगी न फैला सकें | कोई भी मजहब बहुओं, बेटियों, बेटों, माँ सम्मान औरतों जैसे चाचा – चाची, बुआ – फूफा, मौसा- मौसी, मामा मामी , और गैर औरतों – मर्दों से नाजायज सम्बन्ध रखने कि इज़ाज़त नहीं देता | वेद तो बुदापे में वानप्रस्थ और संन्यास लेकर जन -कल्याण का आदेश देता है | यत्र नारे पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता | जहाँ बहुयों, बेटियों, बहनों – भाभियों और मातायों और सास – मातायों और रिश्तों कि दूसरी औरतों को इज्ज़त से देखा जाता है वहां देवता वास करते हैं और जहाँ औरतों को बुरी नज़र से देखा जाता है वहां सब कुछ नष्ट हो जाता है | जहाँ औरत और मर्द कुते – कुतियों कि तरह रहने लग जाते है, वहां परिवार नष्ट हो जाते हैं और बच्चे रुल जाते हैं और वह समाज – और राष्ट्र भी नष्ट हो जाता है जैसेकि पश्चिमी देशों में संस्कृति नष्ट हो रही है | इस्लाम तो औरत में आधी आत्मा मानता है, चार औरतों को रखने और पञ्च निकाह करने की इज़ाज़त देता है | औरंत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया | जब जी चाहा मसला – कुचला —

के द्वारा: ASK ASK

नजीबा का नसीब – आंतक का घिनोना चेहरा | पोस्टेड ओन: 11 Jul, 2012 Junction Forum, जनरल डब्बा, न्यूज़ बर्थ, सोशल इश्यू में Rss Feed अफगानिस्तान के राज्य परवान गाँव कोई में आंतकियों ने कैसे ऐ के – ४७ चला २२ SAl की एक अबला और असहाय औरत नजीबा को गोलियों से छलनी कर मार डाला | यह दरिंदगी नहीं तो क्या है | क्या इस्लाम और दुसरे मजहबों में नजीबा जैसी अबला और असहाय औरतों का यही नसीब है ? जैसे इस्लाम यशु को भी मसीहा मानता है | भगवान यशु अर्थात मसीहा यशु ने कहा था हाँ जमीन में कमर तक गाड़ी हुई बेबस औरत को पत्थर मरने का अधिकार उसको है जिसने कभी कोई पाप न किया हो | जिस आंतकी ने उस औरत से नाजायज़ सम्बन्ध बनाये औरत की जगह उसके हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना चाहिए था | परन्तु काफ़िर और कायर आंतकी खावंद ने अपनी औरत की इज्ज़त ख़राब करने का बदला नहीं लिया और बेशर्मी से जी रहा है | थू है उसके मूह पर और धिक्कार है उसकी मर्दानगी पर | करीबन दो साल पहले सहारनपुर साईड की तरफ एक ससुर ने बहु-बिटिया की इज्ज़त लूट ली | मौलवी का इन्साफ यह था की अब वोह अपने पति की माँ बन गयी है | होना तो यह चाहिए था कि अपराधी ससुर के हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना यां फिर जब्बर्दस्ती इज्ज़त लूटने के LIYE कानून के हवाले कर देना चाहिए था | इसी तरह पंजाब के एक गाँव में बहुयों को रंडवा ससुर को खुश करना पड़ता था अन्यथा ससुर शादी कर जमीन – जयदाद के और हक़दार पैदा कर देता | ऐसी समस्या का कोई इलाज नहीं है परन्तु SAMAJ और कानून की निगाहों में यह अपराध है | ऐसे रंडवा और भोग – चाहने वाली विधवाओं के लिये अलग स्थान निर्धारित कर देना चाहिए यान वोह बाँझ से शादी करले | समलैगिक सम्बन्ध बनानेवालों के लिये भी अलग स्थान जैसे कोई टाप्पू – जजीरा होना चाहिये तांकी वोह दूसरों को बहला-फुसला कर समाज में अपनी अपनी गन्दगी न फैला सकें | कोई भी मजहब बहुओं, बेटियों, बेटों, माँ सम्मान औरतों जैसे चाचा – चाची, बुआ – फूफा, मौसा- मौसी, मामा मामी , और गैर औरतों – मर्दों से नाजायज सम्बन्ध रखने कि इज़ाज़त नहीं देता | वेद तो बुदापे में वानप्रस्थ और संन्यास लेकर जन -कल्याण का आदेश देता है | यत्र नारे पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता | जहाँ बहुयों, बेटियों, बहनों – भाभियों और मातायों और सास – मातायों और रिश्तों कि दूसरी औरतों को इज्ज़त से देखा जाता है वहां देवता वास करते हैं और जहाँ औरतों को बुरी नज़र से देखा जाता है वहां सब कुछ नष्ट हो जाता है | जहाँ औरत और मर्द कुते – कुतियों कि तरह रहने लग जाते है, वहां परिवार नष्ट हो जाते हैं और बच्चे रुल जाते हैं और वह समाज – और राष्ट्र भी नष्ट हो जाता है | औरंत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया | जब जी चाहा मसला – कुचला —

के द्वारा: ASK ASK

अपने आस-पास की ज़िंदगी के कड़वे दुखद अनुभव से अपने बच्चों को अवश्य रु-ब-रु करवाते रहना चाहिए साथ ही उन्हें सर्वोत्तम के साथ सबसे बुरे अंजाम का चित्र भी दिमाग में रखना चाहिए और मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना चाहिए कि इन दोनों स्तिथियों का सामना हम कैसे कर सकते .हैं . मेरी बिटिया ने अभी कुछ महीनों पूर्व अपने दादाजी का मृत शरीर देखा .ऐसा कोई दृश्य उसके जीवन का प्रथम अनुभव था वह भी उसके सर्वाधिक प्रियजन का मृत शरीर देखना जिन्होंने उसके लिए कई बड़े स्वप्न देखे थे यही वक्त था जब मैंने उसे समझाया यह प्रत्येक के जीवन में होगा.तुम्हे स्वयं को सम्हालना सीखना होगा.साथ ही अपने परिवार,समाज के प्रति संवेदनशीलता के साथ मधुर सम्बन्ध रखने होंगे ताकि किसी भी मुश्किल घड़ी में तुम कमज़ोर ना पड़ो आज कल बच्चों तथा काम के दबाव झेल रहे युवाओं में किसी महापुरुष की जीवनी,दार्शनिकता,इत्यादि विषयों पर पढ़ने का शौक या आदत नहीं है उनके लिए दुनिया रंगीन है किसी परी कथा की तरह जहां कुछ भी प्रतिकूल नहीं घट सकता बस यही सोच उन्हें तब सम्हलने नहीं देती जब वे वास्तविकता के धरातल से टकराते हैं. साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: ajaykumar2623 ajaykumar2623

अच्छा लेख है. इससे यह साफ़ ज़ाहिर होता है की लडकियां चाहे जितनी ही पढ़ी लिखी क्यों न हो जाएँ उन्हें समाज में एक बोझ बन के रहना पड़ता है. चाहे यिक महिला कितनी ही स्वावलंबी क्यों न हो जाये जब तक अपने परिवार और परिवार-जनों द्वारा वोह पूरी तरह नहीं अपनाई जाती उसकी मानसिक रूप से स्वतंत्रता कैसे मिलेगी ? बचपन से ही सौतेलेपन का व्यवहार आज भी होता है बेटियों के साथ, सामाजिक रीतियों की वजह से यह एहसास दिलाया जाता है की उसका बचपन से 'कोई और' घर है जहाँ वेह अपना अस्तित्व ढूंढ पाएगी. जब दूसरे घर में जाती है और अगर वहां भी पति द्वारा या ससुराल वालों द्वारा उससे वोह इज्ज़त नहीं मिल पाए तोह वोह अपने अस्तित्व को निरर्थक समझने लगती है. इसमें लड़कियों के अभिभावकों को समझना चाहिए की असली वजूद का तोह लड़की का अपने ही घर में होना चाहिए लेकिन समाज ऐसी मानसकिता पनपने नहीं देता लड़कियों के प्रति. तब तक लड़कियां स्वतंत्र ही नहीं स्वावलंबी भी महसूस नहीं कर सकती चाहे वेह घर में अपने भाइयों से ज्यादा होनहार और चतुर और दाख ही क्यों न हो...

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ये पुराने ज़माने से चली आ रही बेहद घटिया सोच है आज जब इतना जमाना बदल गया है तो क्यों नहीं लोग अपनी इस घटिया मानसिकता को बदलते है,क्या कारण है की १ तरफ हम २१वि सदी में जीने की बात करते है और १ तरफ अपनी इस मानसिकता पर विराम नहीं लगा पाते,आज लडकिय हर जगह लडको से कन्धा से कन्धा मिलकर चल रही है,फिर क्या कारण है की हम सदियों पुराणी परम्परा को जीवित रखना चाहते है,आज उन माँ बाप से पूछिए जिनके लड़के उनको जीने लायक बनाने के बाद मुह मोड़े लेते है तब बेटिया ही माँ बाप का सहारा बनती है,तब उनके दिल्लो से पूछिए की कौन पराया है कौन अपना इसलिए इन घटिया और रुदिबदी सोच को दिल और दिमाग से निकल कर लडकियों को भी ऐसे ही गले लगाइए.मैं आज सलाम करती अपने ममी पापा और उन सभी माता पिताओ को जो १ लड़की को लड़के से ज्यादा मानकर पदाते लिखते है और समाज की इस घटिया सोच से लड़ने की हिम्मत दिलाते है.

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ये पुराने ज़माने से चली आ रही बेहद घटिया सोच है आज जब इतना जमाना बदल गया है तो क्यों नहीं लोग अपनी इस घटिया मानसिकता को बदलते है,क्या कारण है की १ तरफ हम २१वि सदी में जीने की बात करते है और १ तरफ अपनी इस मानसिकता पर विराम नहीं लगा पाते,आज लडकिय हर जगह लडको से कन्धा से कन्धा मिलकर चल रही है,फिर क्या कारण है की हम सदियों पुराणी परम्परा को जीवित रखना चाहते है,आज उन माँ बाप से पूछिए जिनके लड़के उनको जीने लायक बनाने के बाद मुह मोड़े लेते है तब बेटिया ही माँ बाप का सहारा बनती है,तब उनके दिल्लो से पूछिए की कौन पराया है कौन अपना इसलिए इन घटिया और रुदिबदी सोच को दिल और दिमाग से निकल कर लडकियों को भी ऐसे ही गले लगाइए.

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विचारणीय बिन्दु एक सामाजिक बिषय है और इस कारण स्वाभाविक रूप से इस बिषय पर विचार करते समय समाज को दृष्टि में रखना चाहिए ।मेरे बिचार से शायद ही इस विषय पर भाव संयम और सुसंगत ढ़ग से रखे गए है क्योंकि एक व्यक्ति,चाहे वह लड़की हो या फिर लड़का उसकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता या सत्ता सामाजिक मर्यादा और विकास के लिए होती है ।पुनः पराया धन का अर्थ पराधीनता नहीं लगाया जाना चाहिए ।शाब्दिक दृष्टि से भी इस शब्दावली का अर्थ एक ऐसे धन से है,जो पराए के लिए हो ।मनुष्य अपने धन को सजो कर रखता है तो दूसरे के धन को हिफाज़त से रखना मानवीयता की परिभाषा है ।अन्त में यह भी गौर करने की चीज़ है कि यह व्यवस्था हर परिवार और पूरे समाज में है,इसे असमानता और अन्याय का प्रमाण कहकर अप्राकृतिक नहीं कहा जाना चाहिए ।भारतीय समाज के कुछ मौलिक मूल्य एवं परम्पराएं है और ऐसा करके हम सभी पूरे समाज में न केवल सुख दुख बाँटते है,बल्कि एक समान व्यवस्था अपनाते है ।यह व्यवस्था सदियाें से अपनाई गयी है और सफलतापूर्वक चल रही है ।इस प्रश्न का उत्तर यही है कि बेटों और बेटियों में कोई अन्तर नहीं किया जाना चाहिए ।बेटों और बेटियों दोनो का घर वही है जहाँ वह सम्मानपूर्वक रह कर समाज का भरपूर विकास कर सकें ।विश्लेषक@याहू.इन ।

के द्वारा: vishleshak vishleshak

इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरुरत है और यह जानना जादा जरुरी है कि बलात्कार एक ऐसा शब्द है जिसे परिभाषित कर पाना शब्दों में मुश्किल है,.पर यहां यह सवाल बिलकुल सही है कि आपसी सहमती से बनाए गए संबंधो को बलात्कार का नाम देना चाहिए यह भी साही है कि कुछ गलत महिलाये इसका नाजायज फ़ायदा उठा रही है ये काफी चिंताजनक बात है क्योंकि इन औरतो कि हरकतों कि वजह से कोई भी उस महिला का बिश्वाश नहीं करेगा जिसके साथ सच में गलत होता है या हुआ है इन औरतो का काम निश्चय ही निंदनीय है परन्तु क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि 100 % में से 99% महिलाये पुरुषो के जुल्म का शिकार है जो मामला दर्ज होता है वो सब सही होता है कभी किसी केस को छोड़ कर हर रोज एक महिला बलात्कार का शिकार होती है और कभी एक दिन में एक से जादा और वो भी इतने कानून के होने के बाद भी कभी सोचा है अगर ये कानून ना हो तो क्या होगा शायद एक दिन में एक भी महिला चल ना सके सडको पर किसी को दर नहीं होगा किसी का अभी तो जुर्म करने वाले कानून पोलिसे से नहीं डरते तब क्या होगा और कौन कहता है कि जो महिला किसी पुरुष के जुल्मो का शिकार होती है उसके साथ समझ कि हमदर्दी होती है सच तो यह है कि जिसके साथ बलात्कार होता है उसे और उसके परिवार को लोग जीने नहीं देते उनकी इज्जत को अदालत में और उछाला जाता है कभी ये इंसाफ मिले या न मिले बदनामी और जिल्लत जरुर मिलती है मुफ्त में! और जो महिला छेड छाड़ का शिकार होती है उसे कहते है चुप रह कर निकल जाती तो क्या बिगड़ जाता तमाशा कर रही है खुद कि बदनामी करा रही है ! जो महिला शरीफ होती है वो ऐसा होने पर चुप होके निकल जाती है चिल्ला कर सबको बता के तमाशा नहीं करती! और जिसके साथ उसका कोई अपना ऐसा करता है और वो आदमी समझा में बदनाम न हो तो कहते है क्या औरत है बिना सोचे समझे इल्जाम लगा दिया वो भी अपने पर! और अगर किसी का पती ऐसा करता है तो कहते है क्या मिला है ऐसा करके अपने ही पती को बदनाम करके ये भी क्या जमाना है क्या पती बलात्कार कर सकता है ये तो उसका हक़ है! पर क्या सच में पती होने से उसका हक़ है कि वो उसके मर्जी के बिना सम्बन्ध बनाये क्या औरत कि कोई मर्जी नहीं हमारे समझ में शायद हर दुसरे घर में होता है पर वो औरत भी यही सोचती है कि ये उसका हक़ है और नहीं बोलती जो बोलना चाहती है वो डरती है कि लोग क्या कहेंगे! जब हमारे देश का कानून औरतो के लिए जादा कानून बनाये बैठा है तो ये हाल है अगर ये कानून ना रहे तो क्या होगा सोचा है कभी एक औरत बन कर, एक औरत के हालत में रह कर सोचे फिर कहे कि क्या होना चाहिए ! अगर कानून होना ही चाहिए तो ऐसा कानून बने जिससे सच और झूठ का पता चल जाये तो बात बने!

के द्वारा: MEENU MEENU

पराई का जो मतलब मुझे समझ में आता है वो है एक ऐसी इस्थिति में किसी व्यक्ति , वस्तु या स्थान होना जिस पर आपका अधिकार न हो पर या वास्तव में बेटी पर उसके अपनों का अधिकार नही रह जाता है | मुझे तो आज तक लगता है कि शायद ही किसी के माँ बाप या बाई ने इस लिए दहेज़ कि सती या जलाई गई लड़की के लिए लड़ाई लड़ने से मना कर दिया हो कि लड़की तो अब पराई हो चुकी है !!!!!!!!!! क्या आप को कोई ऐसा समाज पता है झा आज के दौर में लड़की को इस लिए सिर्फ चुलह काक्की में रखा जा रहा हो क्योकि उसको पराया बनना है बल्कि ससुराल में उसको कोई परेशानी न हो इस लिए लड़की को पढ़ाने पर भी धयान बढ़ा है और लोग पराया नही समझ रहे है | मई कम से कम अपने भाई और ३ ऐसे शिक्षको को जनता हूँ जिन्हों ने बेतिओ को जन्म देकर ख़ुशी जताई और लड़का पैदा करने के कोई भी उपाए नही किये यानि उनके नज़र में लड़की की भूमिका लड़के में बदलती जा रही है | लड़की पराया धन जरुर खी जाती है पर पराया धन का मतलब भारतीय संस्कृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है एक ऐसा धन जिसे धरोहर समझ कर रक्षा की जानी चाहिए यानि अपने से ज्यादा सुरखा तो फिर लड़की के अरये होने का मतलब ज्यादा धयान , प्रेम , रखन और उसे इतना देना शिक्षा मूल्य कि जो भी उसे अपनी अमानत समझ कर ले जाये उसे लगे कि वर्षो तक धरोहर के रूप में रखने के बाद उन्हें उनका हिस्सा अपेक्षा कृत ज्यादा ही मिला है और वह उस लडकी से अपने घर कि श्री वृद्धि कर सके और इसी अर्थ में एक लड़की लक्ष्मी का रूप ले लेती है पर धीरे धीरे परायापन का अर्थ इतना संकुचित हो गया कि लड़की को पराया कहकर यह प्रचारित किया जाने लगा कि या तो परायी है तो इस पर किसी भी तरह का निवेश क्यों किया जाये उर इस अर्थ में लड़की मूल्य के ज्यादा आर्थिक हो गई जो सिर्फ एक अपसंस्कृति का उदहारण भर है और इसी लिए लड़की के इस बदले अर्थ ने लड़की के जीवन कोपैसे का समानुपाती बना दिया यानि पैसा कम तो लड़की के जीवन के सुख कम औए यही से लड़की की स्थिति दयनीय हो गई | इस लिए बेटी परायी होती है , का विश्लेषण करते समय सामाजिक मूल्य से आर्थिक मूल्य की तरह होंने वाले परिवर्तन को धयन में रखना होगा | इन सबसे इतर जब आप इस अर्थ को विज्ञानं या आनुवंशिक अर्थ में देखेंगे तो पाएंगे कि एक्स गुण सूत्र के कारण एक लड़की में ज्यादा क्षमता होती है कि वह दुःख , संघर्ष , विपरीत परिस्थिति को आसानी से सहन कर सके , वह नए स्थन के साथ आसानी से सामंजस्य कर लेट है और यही कारण है कि विवाह में लड़की की विदाई को प्राथमिकता दी गई और यही वैज्ञानिक क्षमता के कारण लड़की के लए यह बाध्यता बन गई की वह पैदा होने के बाद दुसरे के घर जाये और फिर आपसे रक्त संबंधियों के बीच विवाह निषेध ने भी लड़की के लिए घर से बाहर शादी का प्रचलन कायम किया जिसके कारण लड़की के लिए जन्म के बाद से यह सोचा जाने लगा कि उसे एक न एक दिन टी जाना ही है और इसी भावना ने एक अनुवांशिक तथ्य को सांस्कृतिक परम्परा बना डाला जिसके विषम परिणाम अब देखने को मिल रहे है और जिसने लडकी के स्वतंत्र जीवन को प्रभावित भी किया है | पर लड़की को अज्ञानता के कारण परायेपन का दंश झेलना पड़ता है ............अखिल भारतीय अधिकार संगठन , डॉ आलोक चान्टिया

के द्वारा: allindianrightsorganization allindianrightsorganization

अताम्हात्या वास्तव में एक गंभीर सामाजिक मसला एक बुराई है. इससे बचने के लिए हम सबको स्वयं ही हिम्मत करनी पड़ेगी. यानि खुद अताम्हात्या करने वाले को मेरा यह मानना है. के यह जीवन जिसने हमें दिया है उस जीवन को हरने का हक़ भी केवल उसी का है इसलिए मरना है तो जीते हुए मरो और इज्त की जिंदगी जियो केवल परमात्मा को अपना माता पिता,भाई बहन अपना सब कुछ पालनहार समझ लो और अपने चरित्र से हर बुराई को जड़ से उखाड़ के फैंक दो और संसार के हर एक प्राणी से निस्वार्थ प्रेम करो पराई स्त्री को अपनी माता सामान समझो और अपनी धर्मपत्नी से सच्चा प्रेम करो परमात्मा हमेशा अपने जीवों को प्यार करता है हमें भी इस प्रकार सभी जीवों से प्यार करना है आतमहत्या का विचार भी मन मे लाना महा पाप है मेरा निवेदन है की इस सामाजिक बुराई को सत्यमेव जयते के माध्यम से अंधकार में ज़ीने वाले जीवों को ज्ञान का उजाले से ज्ञात किया जाना चाहिए समर्पित सत्यमेव जयते टीम /

के द्वारा:

हिंगलिश के लिए धन्यवाद , मैं खुद depression , अन्क्सिटी , इनसोमनिया जैसे समस्या से जूझ रहा हूँ वो १० सालों से ... मेने कई बार आत्महत्या के बारे मैं सोंन्चा ... फिर मुझे और मेरे पिता कुछ लगा ये कोई मानसिक दुविधा मैं है ... मेरे पिता ने पूरे समस्या को सुना उसको समझा ..ओन्होने ने हे मुझे मानसिक रोग विशेश्याग को दिखाया ..! और उन्होंने मुझे बताया के आप पागल नहीं हैं आप को एक तराह की मानसिक समस्या है बस...! लेकिन हर कोई डोक्टर के पास इस लिए नहीं जाता . की " सब मुझे पागल कहेंगे " हमें सबको पहले ये समझाना होगा की हेर मानसिक समस्या पागलपन नहीं होती....ये its a just state of mind ..जो हेर वक़्त बदलता रहता है . हर कोई जीना चाहता है ... मैं १० साल से अपना इलाज़ करा रहा हूँ ... शादी भी की है वो प्रेम विवाह ,वो भी समाज से लड़ कर! मेरे पत्नी केरल की है भाषा का अंतर + खानपान का अंतर + छेत्र का अंतर + जेवान्शैली से लेकर मोस्सम का अंतर + हिन्दू , क्रिस्चन का अंतर .... नोकरी की समस्या + ६ महीने के पुत्री .......लेकिन कुझे पता है ...जब मैं ज्यादा परेशां होता हूँ तो मैं अपने अप्प को समझाता हूँ " की ये सिर्फ और सिर्फ एक मानसिक अवस्था है जो थोड़ी समय के बाद बदल जायेगी . मैं परेशां भी होता हूँ . लेकिन फिर समस्या को सुलझाने से पाहे सौता हूँ . फिर शांत मन से फैसले लेता हूँ .जैसे शादी से पहले कए प्रक्रियां के जरुरत हमारा समाज समझता है वैसे ही .शादी करने से पहले लड़के और लडकी की psychological counseling भी अनिवार्य करानी चहिए.. ऐसे कई गलत फैसले , कम होंगे ... सही मायने में हम अपनी वाह वाह सुनने के लिए हम बोहोत बड़े गलती कर बैठते हैं हमार समाज जीतना ही . साछर होता जा रहा है , उतना ही वो , तार्किक रूप से कमजोर होता जा रहा है . उनको शायद ये नहीं पता की " बड़ी बड़ी मिसालों से कहावतो से इंसान को म्हणता का एहसास तो होता है पर उससे जींगे मैं सफलता मिले ये जरुरी नहीं है शेष प्रातक्रिया बाद मैं करूँगा .... सभी समानित को मेरी तरफ से नमस्कार . "अनूप "

के द्वारा: juliyen juliyen

हां ! यह एक दम सच है की परिवार वाले ही मजबूर करते हैं आतम-हत्या के लिए , यह गुज़रे ज़माने की बातें हैं या सिर्फ किताबी बातें हैं की परिवार नाम की सामाजिक संस्था इसीलिए बनाई गई की उसमें व्यक्ति को मनसिक,शरीरिक ,आर्थिक और भावनात्मक सरंक्षण मिल सके , आजकल यह सब झूठ है स्वार्थ भरी दुनिया में ऐसी उम्मीद करना भी बेवकूफी है , यह मेरे जीवन का अनुभव है की परिवार वाले ही सबसे पहले हमारे आत्मविश्वास पर हमला करते हैं ,स्वाभिमान को ललकारते हैं वोह सब सिर्फ इसिलिय की हम इनके हाथों की कठपुतली नहीं बन सकते , हम झुक नहीं सकते ,टूट जाएँ बेशक , तो परिवार ही कहता है '' टूट जायो फिर '' '',तुम तू बोझ हो हम पर,इस धरती पर '' तो ज़ाहिर सी बात है की वोह मजबूर,बेबस ,आहत व्यक्ति ऐसे में अतम हत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा.

के द्वारा: anusetia anusetia

Pankaj kumar employee of wipro , his emp id is 233368 and working as Tech lead. I want to disclose his cheapness, actually what he did in his life for his sexual satisfaction and for his own benefits. he was involved with many girls and did so many wrong things like sexual and physical, and mental harsh with them. he used them beyond the limit for his sex satisfactions. its not enough for him ..during this he recorded so many phone calls, videos and saved photos with each and every girls at their sexual activities..just because of his safety. By his soft speaking habits and behaviour , person cant think he may b this much worst, but internally he is really one of the worst. he played with girls emotions and showed them they only did wrong with him. but in his full life he only use all girls .. now even he is not good at his work place also.Before wipro he was in robert bosch, and he terminated from his job in robert bosch . he joined wipro in last year sep 2011, but till now without completion he released from more than 3 or 4 project due to his carelessness in his job .. he is staying at his home and making fools to girls and his seniors in his company also.he is having black family background , from starting he was like this but nobody object from his family. by which he is feeling proud for list of girls in his life.now in his thinking what ever he did he is not wrong, if girls did this with him then she is not good at all, he did all this cheap activities with all girls in cybercafe, restaurant, hotel and at his home also in bangalore.so many girls hurt ed by this all things, they requested , cried but this worst person never thought abut others feelings.

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आत्महत्या एक सामजिक तथ्य है और यह सामान्य सी बात है कि जब भी एक समाज में रहने वाले लोग समाज से अपने को ज्यादा सम्बंधित समझने लगते है और उसके अनुरूप या तो खुद को नही पाते या फिर फिर समाज को नही पाते है तो उनके सामने यही विकल्प होता है कि वह अपना जीवन समाप्त कर ले | पर जहा तक परिवार का प्रश्न है तो वह भी यह बात स्पष्ट है कि एक व्यक्ति जब अपने परिवार को अपनी शादी , नौकरी , बीमारी से परेशान पाता है या फिर परिवार के कारण अपने को परेशान पता है और उसका कोई उपाए न पाने की स्थिति में आत्महत्या कर लेता है , इस लिए जब तक इस तथ्य का अध्धयन न कर लिया जाये की कोई ने आत्महत्या क्यों की है यह कहा नही जा सकता है कि किसी ने आत्महत्या परिवार के कारण कि है | हो सकता है कि आत्महत्या उसने इस लिए की है क्योकि वह अपने कारण परिवार को परेशान नही देख पा रहा है | डॉ आलोक चान्त्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

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क्या आप अपने कीमती आभूषणो ,नकदी ,या अन्य कीमती सामान को खुलेआम लेकर चलते है ,जबकि बाजार में सिर्फ कुछ लोग ही आपराधिक प्रवृति के होते है ,यदि हमारा यह कीमती सामान चोरी हो जाये तो दुबारा प्राप्त किया जा सकता है लेकिन फिर भी हम इसकी बेहद हिफाजत करते है| ये कैसे संभव हो सकता है कि आग के पास ज्वलनशील पदार्थ रखे जाए और कभी भी कोई हादसा न हो | क्या आज़ादी के नाम पर सब कुछ किया जा सकता है ,शायद नहीं हमारे समाज ने बेहतर जीवन जीने के लिए जो उसूल बनाये है उनका पालन तो हमे करना चाहिए | पुलिस की तफ्तीश एक नहीं वरन हजारों केसों पर आधारित होती है प्रशासन और समाज एक दुसरे पर निर्भर करते है | यदि समाज चाहे तो मानव जीवन में एक बहुत अच्छी/बुरी क्रांति ला सकता है |नारी स्वतंत्रता का यह मतलब तो नहीं कि इस तरह के वस्त्र पहने जाये जो कि पुरषों की काम -वासना को प्रभावित करे,न कि ऐसे माहोल को पैदा किया जाये/रहा जाये जो कि उनके लिए बेहतर न हो |

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के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

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बहुत ही विचारनीय लेख है . पढ़कर अंतरात्मा से बेटी होने का एक नारी होने के मर्म को हरा कर गया. सच में जब जन्म देने वाले माता पिता ही भेदभाव रखते हो तो दूसरों से बेटियां क्या अपेक्षा रखें. बात बात पर रोक टोक ऐसा नहीं करो? ऐसे मत रहो ? ज्यादा हंसो मत ? एक लरकी हो लरकी की ही तरह सलीके से रहो ....इत्यादि शब्द ख़ास कर यह सुनना की परायी हो . अपने अस्तित्व पर लगे प्रश्न चिन्ह का उत्तर जन्म से मृत्यु तक ढूंढती रह जाती हैं हम बेटियां . परन्तु उत्तर नहीं मिलता. बचपन में पिता के नाम से पहचाना जाना . शादी के उपरांत पति के नाम से पहचाना जाना,फिर अपने बेटे के नाम से पहचाना जाना. शायद यही नियति है हम बेटियों की.

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दिल्ली विकास प्राधिकरण विकास सदन मुखालय रात रात भर खोलना कहाँ तक सही आदरणीय जागरण जुन्क्तिओन फोरुम, जन जन से जुडी दस्ता कोलुमं में में बताना चाहता हूँ की दिल्ली विकास प्राधिकरण का मुखालय विकास सदन रात भर खुलता है यहाँ पर तृतीय ताल आवास विभाग में कुछ कर्मचारी ऐसे है जो रात में ६ से ७ बजे के बिच पीते हैं देखिये जागरण प्रेस रेपोर्तेर्स आप हर मुद्दे को उठाते है तो कृपया आप कभी दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुख्यालय रात में ६ से ७ बजे के बाद जाकर तृतीय ताल आवास विभाग में देखे की कैसे कर्मचारी वहां पर ६से ७ बजे के बिच पीते हैं आशा है की आप इस मुद्दे पर करवाई करंगे सुचना देने वाले का नाम गुप्त रखा जाये

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महिला पर बात करने से पहले हमें यह नही भूलना चाहिए कि पुरुष को किस तरह की संस्कृति से पोषित किया जाता है .....पुरुष का जन्म खुद महिला के लिए गौरव का प्रतीक होता है और इस गौरव को पुरुष के लालन पालन में भी देखा जा सकता है ..पियाजे के नैतिकता के सिद्धांत के अनुसार बच्चा ५ वर्ष की उम्र तक जो भी देखता या सुनता है .वो प्रभाव उसके जीवन पर्यंत बना रहता है ...अब जब एक पुरुष ने जन्म से ही माँ को अपने लिए तुलनात्मक पाया है ........और उसे बहन से ज्यादा अवसर और प्राथमिकता दी गई है तो वो कैसे समझ पाए कि माँ बहन जैसे रिश्तो में सर्वोच्चता पाने वाले को अपने महिला बॉस को अपने से बड़ा समझना चाहिए .और यही कारण है कि पुरुष महिला को स्वीकार नही कर पते ..पर यह सिर्फ एक और सबसे महत्व पूर्ण कारक हो सकता है ...इसके अलावा यह कहावत आम है कि औरतो कि अक्ल घुटनों में होती है ...और उसके हर कार्य में यह मुहावरा जरुर धयान में रखा जाता है .................इस के अलावा औरत को सिर्फ घर में रखने की परंपरा ने भी पुरुषो में यह पूर्वाग्रह भर दिया कि औरत घर के बाहर का काम कर ही नही सकती ..........इन सब से इतर आनुवंसिक कारणों को भी उपेक्षित नही किया जाना चाहिए .......पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्राणियो में नर को ज्यादा शक्ति प्राप्त है और वह शक्ति के द्वारा मादा पर कब्ज़ा करता है ...संस्कृति बन जाने के बाद नर द्वारा शक्ति का माध्यम बदल गया और पुरुष अपनी योग्यता से मादा को दबाना चाहता है और इसी लिए यह युद्ध बराबर चलता रहता है कि श्रेष्ठ कौन है ......शायद यही वह कारण है जिसके कारण पुरुष एक महिला को अपना बॉस नही मान पता ..............एक बहुत ही हास्यास्पद बात भी प्रचलित है कि प्रजनन के लिए महिला को पुरुष नीचे रहती है इस लिए हर जगह महिला को पुरुष के नीचे ही रहना चाहिए .यही नही समाज में औरत के नीचे काम करने वाले को कम आँका जाता है .उसे मेहरा जैसे शब्द सुन ने पड़ते है .इन सब कारणों से भी पुरुष महिला को बॉस नही मान पता ...अखिल भारतीय अधिकार संगठन इस तथ्य को जानता है पन्नो पर महिला और यथार्थ में महिला दोनों पूरब पश्चिम की तरह है और अखिल भारतीय अधिकार संगठन इस गलत धर्नाओ को बदलने के लिए कटि बद्ध है ....डॉ आलोक चान्टिया

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[ठीक नहीं है मायके का दखल] परिवर्तन महिला सेवा संस्थान के निदेशक शिवबीर सिंह कहते हैं, ''वर्ष 2008 में हमारे पास तलाक की घटनाओं के 152 मामले आये थे, जिनमें अधिकतर मामले ऐसे थे, जो छोटी-छोटी गलत फहमियों से शुरू हुये और नतीजा तलाक तक पहुंचा। इन सब के पीछे मूल कारण जो प्रकाश में आया वह था लड़की के मायके का इनके शुरुआती मतभेदों में अत्यधिक दखल। लड़की वालों की परेशानी यह है कि वे बात-बात पर दखल करने लगते हैं और हर घरेलू परेशानी को लड़की की प्रताड़ना से जोड़ते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे में लड़के का पक्ष इसे सम्मान से जोड़ने लगता है। यही शुरुआती विवाद का कारण बनता है। बेहतर हो कि लड़की वाले किसी भी प्रारंभिक शिकायत को यह सोचकर नजरअंदाज करें कि यह उसकी व्यक्तिगत समस्या है। पति-पत्नी की थोड़ी सी नाराजगी को मायके वाले दहेज और बड़े विवाद के रूप में देखते हैं, जो तलाक का कारण बनता है।

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मैंने अपने ३८ साल की सीनियर नौकरी मैं अनेकों पुरुषों व महिलाओं के साथ काम किया है . आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व जब चौधरी चरण सिंह , जो उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्या मंत्री थे, महिला आईएस अफसर न देने की मांग की थी तो उन्हें यह भान भी न था की किसी दिन उस उत्तर प्रदेश की मुख्या मंत्री दो बार महिला होगी. इस लिए बात काबलियत की नहीं है .परन्तु उप्लाभ्दियों की है . पुरुषों व महिलाओं का अंतर पचास साल मैं डोक्टोरी मैं देखा जा सकता है या दरजी या डांस या किसी अन्य ऐसे पेशे मैं ले लें जिस मैं बहूत महिलाएं होती हों .  महिलाओं की विशिष्ट उपलब्धि नगण्य होती है . वो काम चला तो लेती हैं पर किसी पेशे मैं उच्च उपलब्धि नहीं पा पाती हैं .  मेरे से आज कोई पूछे की किसी नए काम के लिए क्या मैं सीनियर महिला कर्मी चाहूँगा मेरा तुरंत उत्तर होगा नहीं .  यह किसी पूर्वाग्रह से पीड़ित हो कर नहीं होगा. किन्तु जब प्रतिस्पर्धा कठिन हो तो जीतने वाले घोड़े पर ही बैठा जाता है . अधिकाँश महिलाओं की जीतने की शक्ति कम होती है. कुछ झाँसी की रानियाँ इसका अपवाद अवश्य होती हैं .किन्तु वे नारी रूप मैं पुरुष होती हैं . राजीव  उपाध्याय

के द्वारा: rajivupadhyay rajivupadhyay

ऐसा क्यों होता है की हर जगह हिन्दू धर्मो को ही निशाना बनाया जाता है इसका मुख्या कारन ये है की हिन्दू अपने धर्मं के प्रति ही jagruk नहीं है , वह केवल अपने में ही मस्त रहता है, वास्तव में हिन्दुओ में अपने धर्म के प्रति एक गैर जिमेदाराना नजरिया है , के जो हो रहा है होनेदो उसका क्या बिगड़ता है , इस गैर्जिमेदाराना हरकतों के कारन ही हिन्दुओं के धर्म का अपमान हर जगह होता है , चाहे वह मकबूल फ़िदा हुसैन की बनाई हुई नग्न देविओं की पेंटिंग्स हो या दुनिया के देशो में हिन्दू देवो-देविओ के नाम और फोटोस का अंडर गारमेंट्स और फूत्वेअर पर इस्तेमाल होना है. वास्तव में जब तक एक आम हिन्दू अपने धर्मं को गंभीरता से नहीं लेगा तब तक हिन्दू धर्मं ग्रंथो का इस्सी तरह अपमान होता रहेगा.

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ये सच है कि भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी महिलाएं शोषण का शिकार होती रही है और होती रहेंगी लेकिन शिक्षा से उसकी विचारधारा और खुद के प्रति अधिकारों से अवगत होना जरूरी है. वह अवगत हो रही है और अपने खिलाफ हो रहे व्यवहार का वह विरोध भी कर रही है. घर टूट रहे हें , विवाह और परिवार संस्था के अस्तित्व पर संकट गहराने लगा है और इसके लिए जब वर्णन किया जाता है तो औरत ही दोषी दिखलाई देती है लेकिन नहीं उसके द्वारा ली गयी शिक्षा उसे परिपक्व और सहनशील भी बना रही है. शिक्षा सिर्फ एक औरत की नहीं बल्कि शिक्षा हमारी सोच को भी मिलनी चाहिए जो परिवार के हर सदस्य के लिए होगी कि महिला भी इंसान है और उसके अधिकारों और दायित्वों में जब संतुलन होगा तभी सबकी शिक्षा सार्थक होगी.

के द्वारा:

बिल्कुल तथ्यपरक लेख है लेकिन क्या ऐसा होना कभी समाप्त हो पाएगा,शायद नहीं क्योंंकि शायद कई समास्यायों का समाधान एक साथ चाहा जा रहा है ।औरत ईश्वर की एक बेहतर संरचना है,इस कारण उसकी तरफ़ आकर्षित होना स्वाभाविक है ।इसी प्रकार नियोजन में किसी से पीछे न रहना या फिर दूसरे से आगे बढ़ना और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार होना भी स्वाभाविक है ।इसे केवल दोनो स्तरों पर सुधार करने से ही सुधारा जा सकता है ।शैक्षिक स्तर में सुधार होने से आधा सुधार हो जाएगा लेकिन पीछे न रहने या फिर आगे बढ़ ने की ईच्छा को कभी रोका नहीं जा सकेगा और ऐसी स्थिति में और विशेष रूप से इस उद्देश्य से दी जाने वाली स्वीकार्यता की स्थिति में आधा शोषण तो होता ही रहेगा ।क्या ऐसे आधे शोषण के सम्बन्ध में विचार किया जाना या फिर चिन्ता किया जाना अवशेष नहीं रह जाएगा,फिर क्या तब भी पुरूष समाज दोषी कहा जाएगा ।मेरे विचार से यह संक्रमण काल चल रहा है,थोडंे दिन में सब ठीक हो जाएगा । विश्लेषक

के द्वारा: vishleshak vishleshak

बहुत ही अच्छा प्रस्तुत किया गया है।केवल सुख संशाधन की उपलब्धता से औरतों के साथ हो रहा अन्याय नहीं रूकेगा ।जब तक समाज के सारे लोग समान ढ़ग से सुशिक्षित नहीं हो जाएंगे साथ ही साथ उन सभी में समान जीवन। मूल्य भी नहीं होंगे तब तक शायद ही न केवल औरतों के साथ बल्कि ग़रीबों और मज़दूरों के साथ अन्याय रूक नहीं सकता ।अतः आवश्यकता है सभी लोगों को एक साथ समान रूप से सही मकानों में शिक्षित करने की ।यह तभी और केवल तभी हो सकता हैै जब न केवल सरकार गम्भीरता से सभी को शिक्षित करने को संकल्पित हो,जो शायद है नहीं,औरत जब समाज के भी सभी लोग अच्छा बनना चाहें ।सच्चाई तो यह है कि हम सभी लोग अलग अलग समय और मौकों पर अलग अलग व्यवहार करते हैं और दूसरे से हर समय अच्छा करते रहने की उम्मीद करते हैं । विश्लेषक

के द्वारा: vishleshak vishleshak

यह परिस्थितियां केवल भारत जैसे भावना और संबंध प्रधान देश में ही देखी जा सकती हैं. पाश्चात्य देश जो भोग-विलास और भौतिकवाद से पूरी तरह ग्रस्त हो चुके हैं, वहां जीवन भर और हर परिस्थिति में अपने जीवन साथी से प्रतिबद्धिता और समर्पित प्रेम संबंध निभाने जैसी चीज कोई मायने नहीं रखती. पाश्चात्य देशो में संस्कृति नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह गयी है वहा रहना ऐसा मानों जैसे कि मरने के बाद नरक मिलना, ऐसे वहा जीने पर यह हाल है ! वह तो ये भी नहीं देखते कि कौन माँ है और कौन बहिन है उनके लिए तो बस सब भोग बिलास है, में तो बस भगवान् से बस ये ही प्रार्थना करूँगा कि हे प्रभु पाश्चात्य देशो कि संस्कृति मेरे देश को प्रभवित न करे ....यह देश हमेशा अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है और हमेसा ही जाना जायेगा..

के द्वारा:

इसमे बुरे क्या है. भारतीय समाज हमेशा बदलता रहा है. पहले खुलापण था. कामसूत्र और कह्जुराहो भारत की ही दें है. मुग़ल काल मैं पर्दा प्रथा आया. पहले नगरवधू भी हुआ करती थी. मुजे नहीं लगता की बिग्ग बॉस कार्यक्रम मैं कुछ गलत है. यह दस बजे बाद आता है. आपको देखना है थो देखो नहीं थो सो जाओ. रही ब्लू फिल्म की बात थो व्हो भी भारत मैं आसानी से उपलब्ध है और आप सब ने देखा होगा. झूट मूठ का सम्माज और संस्कृति के नाम पे बखेड़ा खड़ा करने की जरूरत नहीं है. कोई प्रोग्राम और कोई किरदार किसी का आदर्श नहीं बना सकता. हर दसक मैं संस्कृती बदलती है. हर काल मैं युवा वर्घ को दोष दिया जाता है. आज जो बुजुर्ग हैं वो युवा थे और उनके समय मैं भी युवा और संस्कृति के नाम के आरोप लगते थे. पहले ३० वर्ष पूर्व हेलेन के डांस को गन्दा कहा जाता था और आज वो क्लास्सिक legend .

के द्वारा: rudra rudra

वर्तमान समय में अधिकतर पुरुषो की यही धारणा होती है की उनकी होने वाली भावी पत्नी पूर्ण रूप से उन्ही के लिए समर्पित हो या उसके पहले कोई अफयेर न रहे हो, तलाकशुदा और विधवा होने की स्तिथि में पहले किसी अन्य पुरुष के साथ सम्बन्ध होने के कारण कही न कही असुरक्षा की भावना के कारण पुरुष उन्हें स्वीकार करने में असमंजस की स्थिति में रहते है. महिलाओ और पुरुषो के रहन सहन और चरित्र को लेकर भी पुरुष की डबल थिंकिंग के कारण वह महिलाओ की स्वतंत्रता को लेकर तरह तरह के प्रश्न उठाता रहता है. इस समस्या के निदान हेतु पुरुषो को पुरानी धारणाओ को तोड़कर एक नयी सोच का विकास करना होगा. तब कही जाकर पुरुष और महिलाओ के मध्य टकराव की स्थिति को रोका जा सकता है. http://singh.jagranjunction.com

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

कुदरत ने हर प्राणी मे नारी जाती को नर के मुकबले शारिरीक रूप से कमजोर बनाया है । ईस मे कुदरत का एक ही स्वार्थ था, प्राणी की जनरेशन आगे बढती रहे । ईसके लिये नारी नरके काबू मे जल्दी आ जाए । आदमी को भी कुदरत ने प्राणी ही बनाया है । सब नियम वही है । प्रारम्भ मे पाशाण युग मे आदमी कुदरत के यही नियम से जीता था । समय जाते आदमी अपनी बुध्धीबल पर सुधरता गया । अपने जीनेके नियम सेट करता गया जो आज हमारे समने रीती रीवाज या धर्म के रूप मे है । अपने आप को दुसरे प्राणी से अलग कर लिया । रीती रीवाज का विरोध याने फिरसे पाशाण युग का जीवन जेनेकी तैयारी । पढ लेने से या पैसे कमानेसे नारी बलवान नही बन जाती । अभीमानी बनती है । कन्धे कन्धा मिलाने की बात करने वली नारी एक बलात्कारी का समना नही कर सकती । सच और आदर्शवाद तो ये केहता है के कोइ व्यक्ती दसरी व्यक्ती के आधीन क्यो ? शादी का बन्धन क्यो ? कोइ भी बन्धन व्य्क्ती के स्वातन्त्र पर नियन्त्रण है । मुल सच और जीवन का सच अलग होता है । जीवन का सच ये ह की आदमी को शादी करनी पडती है और अपनी आजादी छोडनी पडती है । नाम मे क्या रख्खा है । नाम बदल जाये तो किसी की भावना को ठेस पहुन्चती हो वो आज जाना । शादी तन, मन और धन के साथ होती है । तन दे दिया , रीवाज हो तो धन भी दे दिया लेकिन मन नही दिया तो ऐसी शादी कबतक चलेगी । आत्मसम्मान की बातो मे अभिमान झलकता है । जब की शादी मे पूरे समर्पन की भावना होती है । लडकी का बाप खूद कहता है उसे अपने बाप का घर ,मा-बाप सब कुछ भुलना है ताकी वो अपने ससुराल मे बराबर सेट हो जाए । नाम तो एक छोटी सी चीज है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

डियर आपका लेख वाकई बहुत अच्छा है लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे की महिलाओं को जब भी स्वतंत्र छोड़ा गया है उनका सिर्फ शोषण ही हुआ है. वैदिक काल में सती अनुसुइया,गार्गी आदि तमाम विदुषी स्त्रियाँ हुई थी जो बड़े बड़े ऋषियों के साथ राज दरबार में बैठ कर शास्त्रार्थ किया करती थीं.लेकिन कालांतर में कही न कही उनका यौन शोषण ही हुआ है . जिसका खामियाजा उन्होंने भुगता है.कई तरह के एमएमएस स्कैंडल्स बात के गवाह हैं. शायद इसी सब को ध्यान में रख कर मध्य काल में जब इस्लाम का उदय हुआ तो महिलाओं को परदे के पीछे रखा गया ताकि उनपर किसी की बुरी नज़र ना पड़ने पाए. ये अलग बात है की इस्लाम के कुछ सिद्धांतो का लोगों ने अपने स्वार्थों के लिए भी इस्तेमाल किया है. कहा जाता है की इतिहास स्वयं को दोहराता है शायद उसी की वजह से पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करते हुए महिलाओं को पुनः सशक्त किया जा रहा और जिसके कुछ गंभीर परिणाम अक्सर सामने आते ही रहते हैं जिनमें यौन शोषण प्रमुख है यदि ऐसा न होता तो सरकार को The Protection of Women Against Sexual Harassment at Work Place Bill, 2010 पास करने की कोई ज़रुरत न पड़ती. रही बात बाल विवाह की तो पहले लड़कियां और लड़के जवान होते ही अपने जीवनसाथी के साथ हो जाते थे जिससे लड़के और लडकियों दोनों के चरित्रहीन होने की संभावना कम से कम होती थी. सरकार ने बाल विवाह पर रोक तो लगा दिया है लेकिन वो रोक कितनी कारगर साबित हो रही क्या ये किसी ने सोचा है. लड़कियां कालेज पढने जाती है वहां के शिक्षकों के साथ यौन सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ अच्छे नम्बरों के लिए, कार्य स्थल पर प्रमोशन पाने के लिए स्थापित कर लेती हैं . क्या ये बाल विवाह पर रोक का परिणाम नहीं कहा जा सकता इससे तो कही अच्छा होता की उस लड़की की शादी करा दी जाती कम से कम उसके पति पति को एक कुंवारी लड़की तो मिलती.खैर,यही हाल लडको का भी है उनका भी एक से पेट थोड़े न भरता है एक एक लड़के के पास कई कई गर्ल फ्रेंड होती है. बाल विवाह के होने से कम से कम ये सब तो न होता.अभी कुछ दिन पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा था आज के शिक्षित युवाओं को पत्नी के रूप में कुंवारी लड़की की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. अगर ऐसा ही है तो क्यों न हर युवा एक वेश्या से विवाह कर ले कम से कम उसके दिल में ये उलझन तो नहीं रहेगी की कही उसकी वो पत्नी जिसे वो इतना प्यार करता है चरित्रहीन ना हो. रही बात इतिहास दोहराने की तो जब मनुष्य आदि मानव का जीवन बिता रहा था तब वो वस्त्र विहीन था,आज के समाज में लड़कियां कैपरी जींस बिकनी पहन रही हैं हो सकता है की निकट भविष्य में ये फिर से आदि मानव की तरह नंगे ही रहने लगे. सवाल सरनेम बदलने का है तो ये बात भी स्वीकारने योग्य है की कई घरों में महिलाओं का उत्पीडन किया जाता है, उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है साड़ी सुविधाएं ऐसी महिलायों को दिया जाना चाहिये ना की अपने शौक पूरे करने वाली महिलाओं को क्योंकि आज के शहरी समाज में कई ऐसी महिलाएं है जो पति के आफिस जाते ही अपने किसी आशिक को घर में बुला के मौज मस्ती करती हैं चाहे उनके बच्चे कितने ही बड़े क्यों ना हों.इस श्रेणी की महिलाओं में कुछ डाक्टरों की पत्नियाँ,कुछ नेता प्रकार की महिलाएं आदि शामिल हैं. क्या वो कभी ये बात सोच पाती है की उनके बारे में सब कुछ जानता हुआ पति उन्हें कभी कुछ क्यों नहीं कहता क्योंकि वो जानता है किसी से अपनी पत्नी की बात कहने पर उसका मजाक ही बनेगा और कुछ हासिल नहीं होगा. फिर वक़्त के साथ वो पति शराब में डूबने लग जाता है तो वही पत्नियाँ उनपे शराबी होने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकती.

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एक बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि परिवर्तन एकांगी ना होकर बहुस्तरीय हों और व्यवस्थागत खामियां दूर करने के साथ व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर व्याप्त बुराइयों पर भी लगाम लगाने की कवायद हो. नैतिक शिक्षा को दृढ़ता से लागू किया जाए ताकि बचपन से ही बुराइयों लड़ने की प्रेरणा मिल सके. विषय व्यापक है इसलिए उपचार भी व्यापक होना चाहिए जिससे इंसानी मन को ही बुरी प्रवृत्तियों में संलग्न होने से बचाया जा सके. आपके अंतिम पाराग्राफ में ही उत्तर है, अगर द्रीढ़ इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी संभव है. पर यह विरोधभास क्यों? संसाधन कम हैं, महत्वाकांक्षाएं असीमित तो स्वाभाविक है कि सबकी सारी ख्वाहिशें पूरी नहीं हो सकतीं. भारतीय विचारधारा संतोष और धैर्य को प्रश्रय देती है लेकिन आज की पीढ़ी सब कुछ एक झटके में पा लेना चाहती है. परिणामस्वरूप अनैतिक रास्तों को अपनाना वक्ती जरूरत बन गया है. अनैतिक रास्तों से ख्वाहिशें पूरी करना वक्ता की जरूरत नहीं हो सकती. यह मृग मरीचिका जरूर बन सकती है. संतोषम परम सुखम हमारे आदर्श होने चाहिए.

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बहुत सही विषय पर विस्तारपूर्वक चर्चा … बधाई । विज्ञापनों में दोअर्थी सम्वाद या दृश्य जबतक साधारण माँडलों द्वारा दिखाया जाता था, तब तक तो फ़िर भी लगता था कि पेशेवर हैं, इन्हें करना ही पड़ता है । लेकिन जब कैटरीना जैसी हिट स्टार्स ऐसे दृश्य देना मंज़ूर कर लेती हैं, तो समाज पर सचमुच असर पड़ता है । एक मैंगो ड्रिंक के विज्ञापन में गाढ़े रस की बूंद जिस तरह कैटरीना के होठों के ठीक बीच में टपकती है, और नेपथ्य से जैसे कामुक गीत की आवाज़ आती है, वह युवाओं के लिये अत्यन्त भटकाव पैदा करने वाली है । फ़िर भी यही कहा जा सकता है कि जब फ़िल्में ही ऐसे दृश्यों से भरी हुई हैं, तो ये तो मात्र एक विज्ञापन है ।

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पहले जी के घर मी पड़ी लिखी बहु आती थी उसका सम्मान होता था पैर उसको ससुराल मी आकर घर घरास्थी का काम देखना पड़ता द्क्य्नुशी सास सुसर बहु की padai लिखी को नान्दाज़ kardey ठे और कहते को उसको उलहना देदिय kya हमने ज़म्नाही देखा पैर आज जब बहु आती सास सुसर उसको अपनी बेटी का दर्जा दिया उनको maano सब कुछ मिलगया बहु का आदर करने वालो जीवन भर का सुख मिल जाता है महंगाई के इस समय मी बहु को बेटी समझा जो गया वोही बहु अपने पति का कदम कदम मिला कर हात बट्टा रही सास सुसर को माँ-बाप का जो दर्जा दिया इंडो बातो को मिल कर घर स्वर्ग बन्न गया और घर ही मंदिर बाण गया यह आज padey लिखे vichronki deyn है- जब से पडे ल्किही बहु मिली है उसने नौकरी के साथ घ्रास्थी काम संभल लिया घर मी कलह का नाम नहीं अब उनके सास ससुअर के मनन मी बहु के परती कोई गलत बात बोले उसको नकार देते हैं यह पडे ल्किहेय घ्रस्थ चानले आचे विचोर्ण के सास सुसर हैं जो समाज मी एशिया कर के अपना अपने बहु बेटे का सुखी संसार बनना कर आचे गुरु बन्न गए एशिया नहीं है बहु यह सोचे की मी पड़ी लिखी हूँ अब मेरे सम्मन होगा नहीं उसकी पड़ी लिखी baaton के कारन उसके ससुअल मी कोई भी दिकत/कानूनी अड़चन किसी बात पैर तब उसकी समझदारी से सब सम्सयें हल हो सकती हैं इस लिए आज के ज़माने मी कुछ ही परिवारों को अलग कर दिया जाए जो दहेज़ के लोभी हैं पदिलिखी बहु को बेटी का दर्ज़ा दिया यह एक सुखद परम्परा है. परन्तु कुछ जयादा उच्च सिक्षा पेयी हुयी लड़कियां अपने स्वर्ग जैसे घर को नरक भी बनना देती यह उनके आस-पड़ोस की लगयुई आग है इस्सलिये उनको सोच समझ कर कदम उठाना चहिये मनन के अन्दर अगर कोई कुंठा है तब उससे दूर्कार्लेयेंसमाज मी बदला हुआ ही परवर्तन आज एक अच विचार ही अपने घर हो स्वर्ग बनना सकता है कल की बात है बहु जिसका विवाह हुए करीं दोसाल भी नहीं हुए घर मी पति की अचानक देअथ से उसका घर दुखोंओ मी आया और उस पड़ी लिखी नारी ने अपने पति आखरी सलामी देकर अपनी नौकरी का kartvye पुराकिया और फिर एक पत्नी बन्न के अपने सास सुसर के साथ अपने उपर पडे कष्ट ओ संभला पूरे समाज meay एक misaal कायम कर्दियेह आज की भृत्य नारी असी नारी/बहु/बेटी बन्न कर देश और समज का नाम ऊँचा करती जो नारी हो आदर्श पासे करे उनकी बात ही आलग है हम सब को चहिये बहु का सम्मान करें तब ही वोह भी हमारे साथ समय कत्पएगी गलत रास्ते पैर जाती बहु को सम्ह्जा जाये बेटी की तरह उसको मार्गदर्शन दिया जाये यही आज समाज का बोल-बाला हईस्सेय आज का समाज एक उच्च आदर्श पैदा करता है वकुत के साथ पलटना होगा समाज मी फलिगालत कुरार्तियों को दूर करना होगा एक लम्भी बहस अक्रनी होगी बहु और बेटियों का अंतर भी समाजह meay dikhna होगा इस बहस को सब के साथ बेत्थ करन ही ज़रूरी hai

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issbarey meie zayada kya kahoon kyunki lekhak ne itna kah diya hai ki unke shaan meie zayada khana sahi nahi yeh puri duniya ki mahilon ki kahani iss say mahilaion ki kis parkar bachna ek bahut hi badi baat hai unke jeevan ka marik karya hai asia karney wale yeh nahi sochtey jo kaam woh kar rahe dusre sthan unki maa/bahan or wife ke saath dura koi bhi kar sakta hai aur jab baat khuleygi tabhi unko ahish hoga, kanoon ko bhi skhat hona padega, issko lageney ka main udeshy to surkasha hai per ab issko sex ke liye isteymaal karna ek bahut hi ghighona karya hai per hotelon ke baath room ke main gate aur room ke gate ke pass hi lagya jaye aur baki hissey meie sound proof mike laga kar unki baaton ki security bator upyog karajaye aur yeh to ladie hi vastav meie honey pahaley jaha woh susaan room meie ain charon taraf nighein karkake apni jaanmaal ki saftey karskati hain agar koi shaque hai tab turant police ko bulayien aur unko badnam karney ale ko kanoon ke hawlaey karvayen darey nahi agar darr gayi tab asia karney wale unki sharaft ka phayda utha kar unko badnam karsaktey aur ek baar badnami ka daag lagyaphir kitna chikho koi apko sahi nahi maaneyga issliye apne jeevan per koi daag na lagey himmat se soch samjh kar dushman se muqbla karey jeet sachai ki hogi hogiेab samay khul kar muqabale ka modern yug ko warning dena hi zaroori hai tab hi sex ke bhookey bhaidyon ko saza dilwa sakti hain govt.ko bhi asia karney walo ko sakhat saza ka kanoon asia banna chaiye ki 2/3months meie saza miley tab hi doshi galat kaam karney se rook payeyngey vanra hidden kamera chalta rahega aur mahilon ki asmat se yeh kheltey rheyngey aur inka runka na zaroori hai hoshiri se iko pakdo kyunki yeh log zurm karney se pahale bachney ka rasta banna leyety hain usko govt.ko rokna zaroori haoga tabhi mahilo ki izaat bach sakti hai

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भारत एक ऐसा देश है जहा पैसा कमाने के लिए कोई कुछ भी कर सकता है और प्रेम में किसी को अपने जाल मॆ6 फंसा कर तो आप पैसा और मजा दोनों लूट सकते है,, यही गंदा काम कुछ असामाजिक तत्व करते है और प्यार को बदनाम करते है. नकली एमएमएस और फोटो बना कर जब भी बलैकमेलिंग की जाती है तो लडकियां पहले तो कुछ बोलती नही और अगर मामला सामने आता हओ तो समाज की गंदी और प्र्श्न पुछती निगाहें उन्हें जीने नही देती. महिलाओ6 और लडकियों को समझना होगा कि इज्जत के खातिर चुप रहना समझदारी नही बल्कि दब्बुपना है और नारी अगर प्रेम की देवी है तो भारत में काली का रुप भी नारी ही है. आखिर चाहे हमारा सिस्टम कितना ही भ्रष्ट हो लेकिन वह भी एक जगह आकर अपनी औकात में आ ही जाता है. सिस्टम को ब्दलने के कई तरीके है मीडिया उनमें से एक है.

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khel,khiladi aur sex, yeh kaisa sanyog ki sex ko kewal khelo se joda jata sex ki baatein har jagah surru ho jati issmey yeh kahana bhi syad galat na hoga kuch participairn apne ko sab se aagey janney ke liye sab kuch aaj ke zamaney meie bhul jati hain per kabhi kisi ko shaque ho jata hai baat khul jaatiphir iss per rajniti chalu ho jaati hockey meie isslliey yah baat kuch khas yunhi hai ki issmeie ladkiyan jayada bhag leyti hain per kochvan sex ko aagey ragey rakhkar kisi ladki ko yonn shoshan karta hai bahut hi galat hai ladkiyon ka aur kochvan ka jabki guru chela, baap beti ka rishta hota hai agar woh iss thereyy ki koi harqut karta hai vastab meie hi zalalt bhara kaam karta hai aur jab uski iss adat ka govt.ko pata chaley enquiry baad meie ho pahaley ussko iss jagh se nikaldeyna chiye ki uski iss harqat se jo khel premiyon ka dil tutey kisi ki zindagi barbad ho ussey gandey kaam karney wale ko saza milni chhaiye na ki govt.enquiry karkeney ka vachan dey kar apna pichha chudey jab ek baar asia ho jaye tab kisi ki himmat na padey per zamana platchuka hai kisi ko kuch kahney se pahley bahut si aisi baateiney hoti hain jinper dhayan dena zaroori hota haimann ki bhavnaeiey koi kisi nahin rok pata ladka ladki ho tab premvivaha meie plat jata hai per agar yahi baat guru karey tab kis per vishwas karey sochna padta hai kasia zamana aagya per ab rajniti meie aajata hai tab aisa honey lagata hai ab sachai ammney aani muskil jis per doshi ko nahi blki bugbogi ko ki saza miljati jismey samaj bhi kabhi kabhi usko hi doshi banna deyta hai jo ki galat hai khelon ke anadr sex jasey aarop ko badotri miley yeh sahi nahi hai issmey guru chela ke rishtey per jo kalnk lagta hai woh sahi mayno meie sharmnak baat hai

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प्रिय भाई,बहुत अच्छा लिखा आपने,लेकिन समाज उस लड़की को ही गुनाहगार मानता है इसलिए सामाजिक सोच बदलने की जरूरत है,बलात्कारी के लिए फांसी की सजा होनी चाहिए चूँकि सजा के दो पहलु हैं deterrence और गुनाह के बराबर सजा,फांसी की सजा भले ही अफजल गुरु और कसाब जैसी हो एक deterrence तो है ही, चूँकि पीडिता की जिन्दगी नरक से बदतर हो जाती है,उसकी जिन्दगी मौत से बदतर हो जाती है सामाजिक और व्यक्तिगत तौर पर,और तीसरी बात की आप हरेक कमजोर की रक्षा नहीं कर सकते उसकी रक्षा का सबसे अच्छा तरीका है उसे मजबूत बना दो वो अपनी रक्षा अपने-आप कर लेगा,आप हरेक मेमने की रक्षा भेडियों से नहीं कर सकते तो सारे मेमनों को शेर बना दो ना, लेकिन ये काम सामाजिक स्तर पर प्रयास करने और दवाब बनाने से होंगे,सरकार को इस पर प्राथमिकता से काम करने का दवाब,

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आज ये ब्लोग पर मनोज जी द्वारा पहुंची हुं। देर से आने कि माफ़ी चाहती हुं। सामाजीक विषय पर लिखा जानेवाला ये शायद सब से अच्छा ब्लोग है मेरी नज़र में। मेरा वास्ता तो होस्पीटल से ही है इस लिये मुझे पता होता है कि एक इज़्जत लुटी लडकी कौन कौन सी परेशानीयों से गुज़रती है। समाज कि तेज आँख़ों से, रिश्तेदारों के टोकने से, हर तरहाँ से तन और मन से अपने आपको ख़ो चुकी होती है वो। आपके लेख में ऐसी बहोत सी बातों को इस विषय के हर पहलु पर जाकर समज़ाया है वो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ है। आपने सही कहा है कि बलात्कारी को समाज के सामने लाना चाहिए और इंसाफ की आवाज को बुलंद करना चाहिए. समाज को पीड़िता के प्रति उदार रवैया अपनाना चाहिए क्योंकि भावनात्मक सहानुभूति किसी की जिंदगी बना सकती है. लडकीयों में महिलाओं में जागरुक्ता सब से पहले लानी होगी। मेरा तो यह कहना मुझे व्याजबी लगता है कि आपकी इस पोस्ट द्वारा सही कदम उठाये जा सकते हैं। इस पोस्ट के आर्टिकल को समाजसेवी संस्थाओं द्वारा जरुर पब्लिश करना चाहिये।

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आज ये ब्लोग पर मनोज जी द्वारा पहुंची हुं। देर से आने कि माफ़ी चाहती हुं। सामाजीक विषय पर लिखा जानेवाला ये शायद सब से अच्छा ब्लोग है मेरी नज़र में। मेरा वास्ता तो होस्पीटल से ही है इस लिये मुझे पता होता है कि एक इज़्जत लुटी लडकी कौन कौन सी परेशानीयों से गुज़रती है। समाज कि तेज आँख़ों से, रिश्तेदारों के टोकने से, हर तरहाँ से तन और मन से अपने आपको ख़ो चुकी होती है वो। आपके लेख में ऐसी बहोत सी बातों को इस विषय के हर पहलु पर जाकर समज़ाया है वो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ है। आपने सही कहा है कि बलात्कारी को समाज के सामने लाना चाहिए और इंसाफ की आवाज को बुलंद करना चाहिए. समाज को पीड़िता के प्रति उदार रवैया अपनाना चाहिए क्योंकि भावनात्मक सहानुभूति किसी की जिंदगी बना सकती है. लडकीयों में महिलाओं में जागरुक्ता सब से पहले लानी होगी। मेरा तो यह कहना मुझे व्याजबी लगता है कि आपकी इस पोस्ट द्वारा सही कदम उठाये जा सकते हैं। इस पोस्ट के आर्टिकल को समाजसेवी संस्थाओं द्वारा जरुर पब्लिश करना चाहिये।

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सर जी आपने एक ऐसे मुद़दे पर बहस शुरू की है जिस पर बहस को आगे बढाया जाना चाहिए। बलात्‍कार के बाद समाज का व्‍यवहार ही पीडित महिला का मानसिंक उत्‍पीडन करता है। आखिर उस महिला का क्‍या दोष है जिसके साथ बलात्‍कार हुआ दोष तो उस पुरूष का है जिसने बलात्‍कार किया फिर समाज सजा उस पुरूष को देने के बजाय पीडित महिला को क्‍यों देता है। यह सही है कि समाज मे पुरूषों को वह स्‍थान प्राप्‍त है जो उसे पीडित महिला से श्रेष्‍ठ बनाता है परिणाम स्‍वरूप पुरूष दोषी होने के वावजूद समाज से सजा नही पाता और महिला पीडित होने के वावजूद समाज से तिरस्‍कार पाती है। समाज को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। रही बात जांच की तो आज डी0एन0ए0 फिंगर पिन्टिंग की ऐसी विधि उपलब्‍ध है जिसके द्वारा अपराधी का सौ प्रतिशत सही सही पता लगाया जा सकता है। आवश्‍यकता है इस तकनीकी के प्रयोग की। न्‍यायालयों को इन नवीनतम विधियों का प्रयोग कर अपराधियों को कानून के सिंकंजे से बच निकलने की राह को बन्‍द कर देना चाहिए। डी0एन0ए0 फिंगर पिन्टिंग की ऐसी विधि है जिसमे व्‍यभिचारी के शरीर की कोशिका से डी0एन0ए0 लेकर उसे पीडित के शरीर पर पाये गये बाल;नाखून मे पाये गये खाल या शरीर के अन्‍दर पाये गये पदार्थ के डी0एन0ए0 से मिलाते है और इस विधि से अपराधी का सौ प्रतशित सही सही पहचान की जा सकती है। पैटरनिटी टेस्‍ट के लिये इस विधि का लम्‍बे समय से प्रयोग होता आ रहा है। जरूरत है इसे न्‍यायालय मे साक्ष्‍य के तौर पर प्रयोग करने की अनुमति देने की है। इस विधि से अपराधियों के बचने के रास्‍ते भी बन्‍द हो जायेगें और पीडिता भी जांच के समय होने वाले मां‍सिक उत्‍पीडन से बच सकेगी। महिलाओं को भी पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता के अंधे अनुकरण से बचना होगा। रही बात जनजागरूकता पैदा करने की तो यह कार्य हो रहा है इसमे समय लगेगा व्‍यक्ति की मानसिंकता बदलने मे एक पूरी पीढी लगती है। इस बदलाव मे भी समय लगेगा।

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ज़िन्दगी में अब सुख के liyejagh जगह धन के लालच mei कुछ भी खरीदो कुछ भी बेचो इस तरफ देखने की किसी को फुरसत कहांबस जिंदगी को चैन चहिये विशय्वर्ती को कुछ लोग सुख का साधन मानते और वैश्य वेरती करनेवाले उनका यह रोज़गार है जब किसी लड़की को इस देल्देल में dalal aजाता है जब उसको जहाना रखा जाता है वहां और लड़कियां उसको यह कहती रोनाधोना बेकार हैअब चुपचाप इनका कहा मानो तब hi zipaogi thakharkar woh apni aansu pounch kar ज़िन्दगी का zina इस cchakle को salam karti है ,pahale यह dhandha ek parkar के kotho के roop में tha per अब जब se govt.ne unko band kardiya तब यह colony में rahney की जगह milney lagi किसी को khabar nahi lagi kaun kya kis को फुरसत है जब asiney meiaag lagi तब sab को zankari mili dhirey dhirey इस का vistar hota gaya अब जब chhaon jahan chao dil को behla lo behaleny wali mil hi jayegi koi sharm ligah nahin govt.को malum sub है per kya kare hamre desh court se govt.को कहा है uss sya को govt.jhulta nahin sakti per inko कुछ sharm है maa bahen का sodda rkey per rock nahi paa rahe sub khula khel है kaun issko rokega यह sochney wali baat है koi batey

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रपे एक ऐसा swad hai जो बछा भी सुनता तब वोह माँ बाप से पूछता है क्या है rape कोई इस्सका ज़बाब दे पयेगा जो इस गन्दी हरक़त से एक नारी की भावनाओ को ख़तम करके उसको समाज में कहीं का नहीं रखते उप्पेर से कानून की किताबों में नारी से जब उसे पुचा जाता तुम्हरे सात कब कहा कैसे हुआ भरी अदलत में एक बार फिर उसका rape होरहा है उस समय सोचने वाली बात होती कैसे इसके सात किसने इजात उत्तरी और इनको क्या हके परन्तु कानून कहता है जब तक पत्ता नहीं चलेगा तब तक दोषी सजा कैसे पायेगा गुंडे खुलेबज़र में रिपे करते सब देखते डर के मारे गवाही नहीं कोई देता और कानून को गवाही चहिये यह कैसा न्याय है अब समय आगया कानून को बदलना चहिये नारी को अब अबला नहीं दुर्गा का रूप धारण करना होगा जब वोह हिम्मत करके अत्याचारी से मुकुबाला कर्गेई तब उसका साथ सब नहीं तब भवन का कोई बन्द्दा साथ देगा हमे गंदे अपराध करने वालो को इस हालत में करदेना होगा सब देखे और फिर कोई दूसरा ऐसा न कर पाए नारी हेर घर मी सब की इजात एक बर्बर होती इस्सकी लाज को बछना हम सब का फ़र्ज़ hai

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मैं एक समलिंगी नहीं हूँ, मगर आपके लेख से ज़रा भी सहमत नहीं| यह विकृत सोच या मानसिकता नहीं है| इस दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो विपरीत लिंग से ज़रा भी आकर्षित नहीं होते| अगर यह एक विपरीत सोच या बीमारी होती, तो आज दुनिया के बड़े से बड़े रिसर्च सेंटेर में इस "बीमारी" या "विकृत सोच" पर अनुसंधान हो रहे होते|  मेरे एक सहेली है, वह जेंटिक्स में ओस्लो से अनुसंधान कर रही है| वह एक पारंपरिक भारतीय लड़की है| मेरे उससे इस मामले में बात हुयी| उसने साफ कहा की यह एक मानसिक अवस्था है, जिसमें किसी व्यक्ति को अपने ही लिंग के व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाने में संतुष्टी मिलती है| कृपया अपने लेख में, "मेरे अनुसार" पदबंध जोड़ना न भूलें|  

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बिलकुल सही कहा समलैंगिकता एक बिमारी नही है बस विकृत सोच के उपज है ..इस विषय में यह नजरिया समाज को ध्यान में रखकर दिया गया है. इस लेख ने यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या स्वंतत्रता के अलावा भी इसे कानूनी पजामा पहनाने की कुछ वजह है. यह सबसे आम हिअ जब भी हम कही ऐसे समाज को दुषित करने वाली बातों के बार में सोचते है तो सरकार और न्यायालय को समाज के बारे में भी सोचना चाहिए. वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता को जब भी कानूनी मान्यता देने की बात होती है तो इसके पीछे व्यापारियों की मंशा हमेशा नजर नही आती . पहले बात करते है वेश्यावृत्ति के बारे में इसको अगर कानूनी मान्यता मिलती है तो हर गली में एक दूकान होगी जहां वासना पूर्ति का समान मिलेगा और ऐसे में क्या हमारे संस्कार बच पाएंगे. इससे फायदा होगा उन व्यापारियों का जो इस धंधे को अपने हाथों से चलएंगे . सरकार के कुछ नेता और कुछ लोग अपनी जेब भरने के लिए इसकी मांग तो कर रहे है लेकिन जब खुद उनकी मां बहन इस अधंधे में आएंगी तब उन्हें पता चलेगा. समलैंगिकता का बाजार दूनिया में कितना फैल चुका है आप सोच भी नही सकते . समलैंगिको की मांग और उनका मूल्य तो वेश्याओं से भी ज्यादा होता है ऐसे में अगर यह भारत में भी गैर कानूनी नही रहा तो हो सकता है भारत का यूवा वर्ग जो पहले से ही बेरोजगार है उसे इस धंधे में लिप्त होने में देर न ल्गे . ऐसे में मै तो चाहुंगा कि किसी भी सूरत में इसे मान्यता नही मिलनी चाहिए. जागरण जंक्शन के इस प्लेटफार्म से पाठको को बहुत फायदा हो रहा हहै .

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पोलियो, लकवा, गंभीर पागलपन या दिमाग का बिलकुल काम नहीं करना (न बोल पाना, न सुन पाना, न समझ पाना) आदि बिमारियों से ग्रस्त लोगो की जिंदगी नरक से भी बदतर होती है | उसे देख देखकर उसके माँ-बाप तथा परिवार के अन्य लोग भी घुटते और तड़पते रहते हैं | पूरे घर का सुख-चैन नष्ट हो जाता है | ऐसे कई विकलांग बच्चों को मैंने देखा है तथा बहुतों के बारे में सुना है | इन बच्चो और इनके माँ-बाप की स्थिति दयनीय होती है | इनके माँ-बाप भी मन ही मन उस बच्चे से छुटकारा पाना चाहते हैं, पर पाप-पुण्य के अपराधबोध से ग्रस्त होकर तथा लोक निंदा के भय से सच बोलने या स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते | ऐसे विकलांग बहुत कम मामलों में ही ठीक हो पाते है और दस पंद्रह सालों में घुट घुट कर मर जाते हैं | ऐसे बच्चों का मर जाना ही खुद उसके तथा उसके परिवार के लिए राहत और शांति की बात होगी | पर पाप-पुण्य का विचार कर ऐसी कठोर किन्तु व्यवहारिक सोच व्यक्त करने वाले लोग दुनियां में बहुत कम हैं | अजन्मे बच्चों के साथ सिर्फ माँ का ही या थोडा-बहुत पिता का भावनात्मक लगाव होता है | अतः किसी अजन्मे बच्चे की मानसिक या शारीरिक विकलांगता गंभीर, असाध्य और पक्की (confirm) हो तो गर्भपात ही समझदारी है | यह उस अजन्मे बच्चे तथा उसके पूरे परिवार के हक़ में हैं | यहाँ उसकी आत्मा, जिंदगी, मानवाधिकार आदि का हवाला देकर उसे जन्म देना और तिल-तिल मरने देना एक कोरी भावुकता, गंभीर गलती और उस बच्चे व उसके माँ-बाप को अकारण (विकलांगता की यातना सहने का) कठोर दंड और अभिशाप देने के समान अपराध है | एक साल से कम आयु के बच्चों के साथ भी माँ-बाप तथा परिवार के लोग ज्यादा भावुकता के साथ जुड़े नहीं होते हैं | इनकी मौत के गम और शोक को लोग जल्द भुला देते हैं | अतः ऐसे बच्चे यदि असाध्य और गंभीर विकलांगता (पोलियो के कारण चलने या हाथ हिलाने में बिलकुल असमर्थ या बिलकुल दिमागहीन-गूँगा-बहरा) के शिकार हों, तो भी जहरीला इन्जेशन या नींद की गोली का ओवरडोज या अन्य कष्टरहित तरीके से उन्हें उनके अतिकष्टपूर्ण जीवन से मुक्ति दे देने में ही भलाई है | उसे जीवनमुक्त यानि कष्टमुक्त कर देना पाप नहीं, बलिक उस बच्चे को गंभीर विकलांगता के अभिशाप से मुक्त करने का महापुण्य होगा | आखिर उस जीवन को ढोने का क्या मतलब, जिसमें वह हर पल दुःख ही दुःख भोगेगा, पूरे परिवार को अपने दुःख से दुखी करता रहेगा और अंततः मर जायगा | अधिक आयु के बच्चे या बड़ों के साथ परिवारजनों तथा अन्य लोगों का भावनात्मक रिश्ता गहराता जाता है, अतः वे कितने ही विकलांग क्यों न हो जाएँ, परिवार, रिश्तेदार, मित्र आदि उन्हें खोने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं | अतः जिनके साथ भावनात्मक रिश्ता गहरा हो चुका है, उनकी विकलांगता को सहन करना, हर संभव इलाज करना और उनकी जीवनपर्यंत सेवा ही मानवता है |

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साबुन को हमारे साफ सुथरे कपडों की सबसे बडी जरुरत है हम कभी उसको वह मह्त्व नही देते ..वजह वह हमारी गंदगी दूर करता है और इसी तरह झाडू को भी घर के बाहर या कोने में ही रखते है. वेश्याओं के मामलें भी ही मानव यही करता है, वेश्या जहां वासना के भोखों की भूख मिटाकर समाज में गंध फैलने से रोकती है वही लोग क्या करते है... उसे अपमानित करते  है. बाहर सब गाली देते है पर मौका लगता है तो अपनी वासना मिटाते समय ध्यान नही देते. आज के समाज मे6 इस वर्ग को जरुर सामने लाना होगा तभी जाकर रेप और बलात्कार जैसे काण्ड रुकेंगे. वरना देश में हवशियों की तादाद बढती जाएगी. खेर इस बारें में सरकार को आज और आनेवाले कल दोनों को मिलाकर सोचने की जरुरत है.

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